शरतचंद्र की 150वीं जयंती उन्हें याद करने का अवसर है. अनुवाद और रुपहले पर्दे ने बांग्ला के इस शीर्षस्थ लेखक को देशभर में लोकप्रिय बनाया. शरतचंद्र हाशिये के लोगों और स्त्रियों की पीड़ा को महत्व देते थे. उनकी सहानुभूति मूक पशुओं, गरीबों, बच्चों, बाल विधवाओं और वेश्याओं के प्रति थी. जो लोग समाज में घृणित माने जाते थे, ऐसे पात्रों को उन्होंने अपनी कृतियों में ऊंचा उठाया. कमजोरों के प्रति उनकी करुणा पाठकों को रुलाती है. उनका साहित्य समाज के विरुद्ध विद्रोह का साहित्य है. शरत साहित्य में नारी ही नायक हैं. उन्होंने स्त्रियों की पीड़ा के साथ उनकी आजाद सोच को भी वाणी दी. उनके उपन्यासों के नारी पात्र चाहे, राजलक्ष्मी हों या कमललता सावित्री हों या किरणमयी पार्वती हों या चंद्रमुखी या कमल, वे जितने प्रभावी हैं, उतने पुरुष पात्र नहीं हैं.शरतचंद्र का बचपन गरीबी में बीता. मेधावी होने के बावजूद वह पढ़ाई पूरी नहीं कर पाये. समाज के विभिन्न स्तर के लोगों के साथ कभी नौटंकी कंपनी में, कभी सपेरों के समूह में, तो कभी संन्यासियों के समूह में वह घूमते रहे. इन अनुभवों ने उनके साहित्य संसार को समृद्ध बनाया. आर्थिक जरूरतों के कारण उन्होंने गोड्डा में बनैली परिवार की जमींदारी में नौकरी की, फिर भाई-बहनों को पालने की जिम्मेदारी उन्हें कलकत्ता, फिर बर्मा (म्यांमार) ले गयी.वही शरतचंद्र बांग्ला के पहले लेखक भी बने, जिन्होंने अपनी रचनाओं के बूते शानदार घर बनाया तथा मोटरकार खरीदी. लेखन के बूते यह वैभव बंकिमचंद्र और रवींद्रनाथ को भी हासिल नहीं हुआ. हालांकि, यायावर व्यक्तित्व और जीवन के बारे में गढ़ी गयी कहानियों के कारण 150 वर्ष बाद भी शरतचंद्र के जीवन से जुड़ी धुंध पूरी तरह साफ नहीं हुई है. लोग शरत की रचनाओं में उन्हें ढूंढने, पहचानने की कोशिश करते हैं. कोई श्रीकांत को शरतचंद्र बताता है, कोई 'चरित्रहीन' के दिवाकर को, तो कोई देवदास को. यह वर्ष शरतचंद्र के उपन्यास, 'पथेर दाबी' का शताब्दी वर्ष भी है, जो बाद में हिंदी में 'पथ के दावेदार' नाम से प्रकाशित हुआ. यह ब्रिटिश शासित बर्मा के सव्यसाची मल्लिक की कहानी है, जो पथेर दाबी नाम से एक क्रांतिकारी संगठन चलाते हैं. अंग्रेज उन्हें ढूंढती है. अपूर्व, करुणामयी, भारती, रामदास तलवालकर तथा सुमित्रा (रोज दाउद) उपन्यास के अन्य चरित्र हैं. इसमें भारत के क्रांतिकारियों के देशप्रेम और बलिदान के साथ समाज के विभिन्न पहलुओं को दिखाया गया है.सामाजिक पहलुओं पर लिखने वाले शरतचंद्र ने क्रांतिकारियों पर उपन्यास क्यों लिखा? शरत दरअसल हावड़ा जिला कांग्रेस के प्रमुख और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी थे तथा महात्मा गांधी से पूरी सहमति न होने के बावजूद उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था. रूपनारायण के किनारे सामताबेड़ स्थित उनके घर में क्रांतिकारियों का आना-जाना लगा रहता था. उन्हीं मेल-मुलाकातों के आधार पर उन्होंने सव्यसाची जैसे नायक को केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा था.विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा' में लिखा है, 'क्रांतिकारी शरत साहित्य के प्रशंसक थे, विशेषकर पथेर दाबी के, और शरतचंद्र प्रशंसक थे उनकी निर्भीकता के... इसी स्वतंत्र चिंतन के कारण कांग्रेस में रहकर भी उन्होंने विप्लवियों से प्यार किया... उनके इसी विश्वास को रूप मिला पथेर दाबी में. तिल-तिल करके जैसे विधाता ने तिलोत्तमा की सृष्टि की थी, वैसे ही अपने संपर्क में आने वाले विप्लवियों के गुणों के पुंज सव्यसाची की उन्होंने सृष्टि की.' सर आशुतोष मुखोपाध्याय के बेटे की पत्रिका 'बंगबाणी' में यह उपन्यास 1922 से 1926 तक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ.बंगाल के क्रांतिकारी 'पथेर दाबी' की प्रतीक्षा करते थे. बंगवाणी प्रेस से ही यह पुस्तक रूप में 31 अगस्त, 1926 को छपी, पर घर-घर में लोकप्रिय होने के कारण तीन रुपये की किताब सौ रुपये तक में बिक गयी. क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने पर उनके पास से 'श्रीमद्भगवद्गीता' और 'पथेर दाबी' की एक-एक प्रति जरूर मिलती. जनवरी, 1927 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.दरअसल, यह उपन्यास जब धारावाहिक रूप में छप रहा था, तभी प्रशासन की नजर इस पर थी, लेकिन शरत की प्रसिद्धि और सर आशुतोष के रसूख के कारण कार्रवाई उपन्यास की जब्ती तक सीमित रही. शरतचंद्र की ज्यादातर कृतियों पर फिल्में बनी हैं, और कई भाषाओं में बनी हैं. 'पथेर दाबी' पर पहली फिल्म आजादी के तुरंत बाद इसी शीर्षक से और आखिरी फिल्म 1977 में 'सव्यसाची' नाम से बनी थी, जिसमें केंद्रीय भूमिका उत्तम कुमार ने निभायी थी.उनका भी यह जन्मशती वर्ष है. दूरदर्शन पर इस पर टेलीफिल्म आ चुकी है. अब सृजित मुखोपाध्याय 'पथेर दाबी' पर 'इंपेरर वर्सेज शरतचंद्र' फिल्म बना रहे हैं, जो अक्तूबर में रिलीज होने वाली है. अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और मनुष्यता का पाठ पढ़ाने के कारण शरतचंद्र की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)