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प्रदूषण के खतरे

Updated at : 22 Sep 2020 5:14 AM (IST)
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प्रदूषण के खतरे

कोरोना काल में प्रदूषण की समस्या के समाधान के उपायों को प्राथमिकता देने की जरूरत है. प्रदूषण स्वास्थ्य और प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है.

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कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन के दौरान वाहनों, उद्योगों और निर्माण गतिविधियों के साथ लगभग सारे कामकाज ठप थे. इस कारण हमारे देश समेत दुनिया के बड़े हिस्से में वायु प्रदूषण में बड़ी गिरावट दर्ज की गयी थी. ऐसा माना जा रहा था कि कुछ समय के लिए इस समस्या की गंभीरता कम हो जायेगी, लेकिन लॉकडाउन के हटते ही प्रदूषण सूचकांक फिर से खतरे की ओर बढ़ रहे हैं. चूंकि भारत उन देशों की सूची में है, जो वायु प्रदूषण के अलावा जल और भूमि के प्रदूषण से भी सर्वाधिक ग्रस्त हैं.

ऐसे में कोरोना महामारी पर काबू पाने की कोशिशों में इस समस्या के समाधान के उपायों को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है. प्रदूषण स्वास्थ्य और प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. यदि इसकी रोकथाम के लिए हम प्रयासरत रहते हैं, तो इस संक्रमण के साथ अन्य कई बीमारियों से लड़ने में बड़ी मदद मिलेगी.

हम जानते हैं कि कोरोना वायरस सांस लेने की प्रक्रिया को बाधित करता है और गले व फेफड़े को मुख्य रूप से निशाना बनाता है. लेकिन यह भी एक भयावह तथ्य है कि 2019 में वायु प्रदूषण के कारण लगभग दो लाख लोगों की जान गयी थी. इस वजह से स्थायी बीमारियों का शिकार बने लोगों की संख्या करोड़ों में हैं. अब जब प्रदूषण का स्तर फिर से बढ़ने लगा है, तो कोविड संक्रमितों की संख्या में और बढ़ोतरी होने की चिंता भी बढ़ रही है. आगामी महीनों में ठंड के कारण कोहरे और खेती के लिए पराली जलाने की स्थिति भी सामने आयेगी.

ठंड के मौसम में आम तौर पर प्रदूषण में वृद्धि हो जाती है. उत्तर भारत में हवा में खतरनाक रसायनों और धूल की मात्रा सबसे अधिक है. कुछ इलाके तो ऐसे हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं. इसी क्षेत्र में ठंड का प्रकोप भी अपेक्षाकृत अधिक होता है. आज जब हम कोरोना से जूझ रहे हैं, तो हमें इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए, अन्यथा स्थिति बिगड़ने की आशंका है. कोरोना का संकट आने से पहले केंद्र और राज्य सरकारें प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की कोशिशें कर रही थीं, लेकिन महामारी से बचने के लिए प्लास्टिक से बनी चीजों का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ गया है.

हमें रोजाना करीब 25 लाख पीपीई किट की ही जरूरत है. इसके अलावा भारी मात्रा में मेडिकल मास्क, दास्तानों, चश्मों, पैकिंग आदि की भी दरकार है. इस तरह से देशभर में जमा हो रहे प्लास्टिक कचरे के निपटारे की चुनौती भी है. पहले से ही प्लास्टिक को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाने में भारत का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं है. साथ ही, एक बड़ी मुश्किल यह भी है कि स्वास्थ्य कारणों से मेडिकल कचरे के रिसाइक्लिंग करने से परहेज किया जाता है. हमें कोरोना संकट को प्रदूषण नियंत्रण के उपायों में व्यापक सुधार के लिए भी एक अवसर के रूप में देखना चाहिए.

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