महाराष्ट्र के ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी भाषा जरूरी किये जाने को लेकर विवाद उठना स्वाभाविक है. यह विवाद बांबे हाईकोर्ट में भी पहुंच गया है. महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को लागू करते हुए तर्क दिया है कि इससे यात्रियों और टैक्सी-ऑटो चालकों के बीच भरोसा बढ़ेगा तथा यात्रियों में सुरक्षा का भाव रहेगा. मोटे तौर पर सरकार की यह दलील बेहतर लगती है, पर जब राज्य की टैक्सियों और ऑटो की संख्या और उनके चालकों पर ध्यान देते हैं, तो यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं रह जाता, बल्कि उपराष्ट्रीयता के उभार और उसके बहाने राष्ट्रीयता के विचार को चुनौती का भी हो जाता है. इस सोच का सिरा आगे बढ़ते हुए हिंदी विरोध और प्रकारांतर से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के प्रवासियों की मुखालफत तक जा पहुंचता है. राष्ट्रीयता के पुरजोर पोषक हिंदी हृदय प्रदेशों को उपहास में कभी बीमारू कहा जाता था. इस सोच की प्रमुख वजह आर्थिक रूप से इन क्षेत्रों का अपेक्षाकृत उपराष्ट्रीयता वाले क्षेत्रों से पिछड़ा रहना है. इसी कारण रोजी-रोटी की खातिर महाराष्ट्र के टैक्सी और ऑटो चालकों में बड़ी संख्या बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि के प्रवासियों की है. जाहिर है कि मराठी का कामचलाऊ ज्ञान रखने के नियम का शिकार यही लोग ज्यादा हुए हैं. महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में 12 लाख, 96 हजार से ज्यादा ऑटो हैं, जबकि करीब पांच लाख टैक्सियां हैं. यहां के परिवहन विभाग के अनुसार, अकेले ग्रेटर मुंबई क्षेत्र में करीब पांच लाख टैक्सियां और ऑटो रिक्शा चल रहे हैं. इनमें लगभग 75 प्रतिशत ऑटो-टैक्सी चालक गैर-मराठी और हिंदीभाषी क्षेत्रों के ही हैं. राज्य के दूसरे क्षेत्रों में करीब आधे ऑटो-टैक्सी चालक हिंदीभाषी हैं. महाराष्ट्र ही क्यों, किसी भी राज्य के सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए. उनके रोजाना का काम स्थानीय भाषा के कामचलाऊ ज्ञान से चल सकता है. बड़ा प्रश्न यह है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान का पैमाना क्या हो, महाराष्ट्र सरकार का आदेश इस मसले में स्पष्ट नहीं है. सेवा क्षेत्र और रेहड़ी-पटरी लगाने वाले कामकाज करते-करते स्थानीय भाषा सीख ही लेते हैं. दिल्ली के कनॉट प्लेस में हथकरघा और दस्तकारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं कम शिक्षित हैं. पर वे हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भी धाराप्रवाह बोल लेती हैं. तमिलनाडु को लेकर धारणा है कि वहां घोर हिंदी विरोधी माहौल है. पर वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल महाबलीपुरम में भीख मांगने वाले भी बहुभाषी मिल जाते हैं. वहां घूम-घूमकर छोटे-मोटे सामान बेचने वाली लड़कियां भी तकरीबन अनपढ़ हैं, पर वे हिंदी, गुजराती, बांग्ला आदि बोल लेती हैं. कोलकाता की गलियों में दुकान लगाने वाले बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग अंग्रेजी तथा बांग्ला बोलते हैं, और इसका कारण रोजाना का संपर्क और जरूरत है. ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र के ऑटो-टैक्सी चालक मराठी का कामचलाऊ ज्ञान या समझ नहीं रखते. अपनी माटी से दूर जब कोई ऑटो या टैक्सी चलाने का काम चुनता है, तो वह तत्काल सड़क पर नहीं उतरता. वह पहले सड़कों को पहचानता है, उसकी भाषा समझने की कोशिश करता है. सदियों से लोग भारत के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक तीर्थयात्राएं करते रहे हैं. आज तो तकनीक का विस्तार हो गया है, संचार क्रांति हो चुकी है. जब ये सहूलियतें नहीं थीं, तब क्या तीर्थयात्राएं रुकीं. तब क्या भाषाएं बाधा बनीं. ऐसे में प्रश्न यह है कि फिर आज भाषा कैसे चुनौती बन सकती है. कम ही लोग स्वीकार करेंगे, पर राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाये गये फजलुर्रहमान आयोग की रिपोर्ट ही भाषायी उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली रही. आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की थी. इसी कारण भारतीय उपराष्ट्रीयताओं को अपनी भाषाओं के बहाने अपना वर्चस्व साबित करने का आधार मिल गया. इसी कारण आये दिन राज्यों में अपनी भाषाओं को लेकर अस्मिताबोध जागता रहता है. इस बोध के निशाने पर प्राय: हिंदीभाषी ही रहते हैं. महाराष्ट्र सरकार में शामिल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मूल में भी मराठी उपराष्ट्रीयता और अस्मिताबोध रहा है. इस अस्मिताबोध को शिवसेना संस्थापक बालासाहब ठाकरे ने पहली अभिव्यक्ति 1960 के दशक में मुंबई में मलयाली भाषा-भाषियों के खिलाफ आंदोलन के जरिये दी. बाद के दिनों में उनके भतीजे राज ठाकरे इस अस्मिताबोध के दबंग पैरोकार बनकर उभरे. इसका एक खतरा यह भी है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान की शर्त राज्य में दूसरे धंधे में काम कर रहे लोगों पर भी बाद में लागू हो सकती है. इससे निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदीभाषियों के लिए संकट पैदा होगा. इससे पलायन भी बढ़ सकता है, जिसकी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग को भी चुकानी पड़ सकती है. इसलिए जरूरी है कि इस मसले पर सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य रास्ता तलाशा जाये. आखिर में इस भाषा विवाद का एक सिरा देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक करियर से भी जुड़ता है. भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग उनमें राष्ट्रीय राजनीति की संभावना देखता है. महाराष्ट्र तक तो उनका मराठी अस्मिताबोध स्वीकार्य हो सकता है, पर जब वह राष्ट्रीय राजनीति में सफल होने की कोशिश करेंगे, तो अपनी भाषा बोध के बहाने हिंदीभाषियों का विरोध उनकी राह की बाधा बन सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)