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मिट्टी को स्वस्थ बनाने पर हो जोर

मिट्टी हमारे जीवन से जुड़ी हुई है. इसके स्वास्थ्य की गुणवत्ता से ही हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं. यदि यह बिगड़ा तो समझ लें कि मानव सभ्यता पर संकट छा जायेगा.

By अशोक भगत
Updated Date
Emphasis should be on making the soil healthy
Emphasis should be on making the soil healthy
प्रभात खबर.

पद्मश्री अशोक भगत, सचिव, विकास भारती बिशुनपुर

vikasbharti1983@gmail.com

इन दिनों योगी जग्गी वासुदेव मिट्टी बचाने की मुहिम में लगे हैं. इसके लिए वे लंदन से 100 दिनों की यात्रा करेंगे. प्रश्न है कि सद्गुरु को मिट्टी बचाने के लिए वैश्विक मुहिम की आवश्यकता क्यों पड़ी? कारण जान कर आप स्तब्ध रह जायेंगे. हमारे सकल घरेलू उत्पाद में खेती करीब 1/6वां योगदान करती है. भारत की जनसंख्या में लगभग 70 प्रतिशत लोग आजीविका के लिए इस पर निर्भर हैं. बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए अनाज उत्पादन को बढ़ाना जरूरी था, जिसके लिए कुछ राज्यों में अंधाधुंध रासायनिक खादों, कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशी रसायनों का उपयोग किया गया. इससे उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन मृदा का स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया.

भारत के कुछ हिस्सों की मिट्टी तो अब खेती लायक भी नहीं बची है. यह हाल तमाम विकसित देशों का भी हो गया है, जहां आधुनिकता की तूती बोलती है. मृदा स्वास्थ्य की समस्या वैश्विक है और यही कारण है कि जग्गी वासुदेव को मुहिम के लिए बाध्य होना पड़ा? दरअसल, मिट्टी में अंधाधुंध रसायनों (उर्वरक, कीटनाशी, रोगनाशी एवं खरपतवारनाशी) का उपयोग किये जाने के कारण मिट्टी की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक संरचना प्रभावित हुई है.

देश की कृषि योग्य भूमि लगातार कम होने के साथ-साथ इसकी उर्वरता भी कम हो रही है. बढ़ती जनसंख्या के साथ खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना एवं कम लागत में अधिकतम उत्पादन कर किसानों की आमदनी बढ़ाना बेहद जरूरी है. मिट्टी पर ही किसानों की उन्नति निर्भर करती है. ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’ कहावत प्रचलित है. देश के कृषि विशेषज्ञों ने यह पाया कि किसानों में जानकारी के अभाव के कारण खेती में रासायनिक उर्वरकों और कृषि रसायनों का असंतुलित मात्रा में प्रयोग किया जा रहा है. इससे मिट्टी की सेहत बिगड़ती जा रही है एवं किसानों के फसल उत्पादन तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इसी सोच को लेकर भारत सरकार ने किसानों के कल्याण एवं फसल की उच्च उत्पादकता तथा गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित कर फरवरी 2015 में ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ (सॉयल हेल्थ कार्ड) योजना प्रारंभ की.

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का मुख्य उद्देश्य मिट्टी परीक्षण के आधार पर मिट्टी के संतुलन तथा उसकी उर्वरकता को बढ़ावा देना है. जिससे किसानों को कम कीमत में अधिक पैदावार मिल सके. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत अब तक पूरे भारत में लगभग 11,24,46,907 किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया गया है. इसी क्रम में झारखंड में भी वर्ष 2014-15 से अब तक 13,79,309 किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जा चुका है. इस योजना के अंतर्गत किसानों को एक मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिया जाता है, जिसमें खेत की मिट्टी की गुणवत्ता एवं उपज शक्ति के बारे में जानकारी दी जाती है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड हर तीन साल में प्रदान किया जाता है. इसके कारण किसानों को अपनी मिट्टी के बदलाव के बारे में भी पता चलता है. इस योजना के तहत किसानों को अच्छी फसल उगाने में मदद मिल रही है.

सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना को जन अभियान बनाने के लिए हर किसान को आगे आना होगा. खेत की मिट्टी की जांच करानी होगी. उर्वरक के प्रयोग का प्रबंधन करना होगा. तब जाकर मिट्टी की उर्वरता बरकरार रह पायेगी. सरकार ने ऐसी योजना की शुरुआत की है, जिसके तहत सभी किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिशन से जोड़ा जायेगा. कार्ड में खेतों के लिए अपेक्षित पोषण एवं उर्वरकों के बारे में फसलवार सिफारिशें की जाती हैं, जिससे कि किसान उपयुक्त फसलें चुन कर उत्पादकता में सुधार कर सकें. भारत सरकार ने इस क्षेत्र में विशेषज्ञों को भी लगाया है. किसानों को यदि कुछ सुझाव की जरूरत हो, तो वह भी उपलब्ध है.

किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करने के वास्ते मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को सहायता मुहैया करा रही है. राज्य सरकारें मृदा स्वास्थ्य कार्ड को जारी करने के वास्ते गांवों की औसत मृदा सेहत का निर्धारण करने के लिए नवीन पद्धतियां अपना रही हैं, जिनमें मृदा परीक्षण के लिए कृषि विद्यार्थियों, गैर सरकारी संगठनों तथा निजी सेक्टर की सेवा शामिल है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड स्कीम किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद है. भारत में ऐसे बहुत से अशिक्षित किसान हैं, जो यह नहीं जानते कि फसलों से अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए किस तरह प्रबंधन किया जाता है.

मूल रूप से, वे मिट्टी के गुण और उसके प्रकार नहीं जानते हैं, केवल धरती को माता मान कर उसमें फसलों को लगाते हैं. वे अपने अनुभव से फसलों का बढ़ना और उनका असफल होना जान सकते है, किंतु वे यह नहीं जानते कि मिट्टी की हालत को कैसे सुधारा जा सकता है. झारखंड राज्य के किसान इस मामले में धनी हैं कि वे अपनी धरती माता को प्रदूषित एवं उनका स्वास्थ्य खराब होने से बचा कर रखे हुए हैं.

मिट्टी हमारे जीवन से जुड़ी हुई है. इसके स्वास्थ्य की गुणवत्ता से ही हम अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं. यदि यह बिगड़ा तो समझ लें कि मानव सभ्यता पर संकट छा जायेगा. इस संकट का एक मात्र समाधान मिट्टी की गुणवत्ता की सुरक्षा है. यह तभी संभव है जब हम खेती के पूरे तंत्र का परंपरा के साथ वैज्ञानिक प्रबंधन करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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