अब मौसम की खुशियां कहां!

मुकुल श्रीवास्तव स्वतंत्र टिप्पणीकार इस बार गर्मियों में वह कशिश नहीं दिखती, जो हमारे बचपन में दिखती थी. न अब वैसी लू चलती है, न अब गर्मी आने की वैसी तैयारी होती है, जैसी हमारे जमाने में होती थी. गर्मी के आने से पहले सुराही या घड़ा खरीदा जाता था. हम पिताजी की उंगली पकड़ […]
मुकुल श्रीवास्तव
स्वतंत्र टिप्पणीकार
इस बार गर्मियों में वह कशिश नहीं दिखती, जो हमारे बचपन में दिखती थी. न अब वैसी लू चलती है, न अब गर्मी आने की वैसी तैयारी होती है, जैसी हमारे जमाने में होती थी. गर्मी के आने से पहले सुराही या घड़ा खरीदा जाता था. हम पिताजी की उंगली पकड़ के मंडी जाते थे, जहां पिताजी न जाने उन घड़ों में क्या परखते थे, यह हम आज तक नहीं समझ पाये.
तब कूलर विलासिता की चीज होते थे. एसी क्या होता है, लोग जानते भी नहीं थे, पर उन गर्मियों का इंतजार हम साल भर करते थे. शाम होते ही छत पर पहुंच जाना और उसे पानी डाल कर ठंडा करने की कोशिश करना, क्योंकि तब पूरा परिवार सारी रात उसी छत पर काटता था.
सुबह सत्तू (चने का आटा) का नाश्ता किसी मैगी या ब्रेड से ज्यादा लुभावना लगता था. हमारा शहर आज की तरह मेट्रो नहीं था. वह कुछ कस्बाई रंगत लिए हुए था. हमारे माता-पिता जो ठेठ गांव से निकले थे और हम जैसे लोग जो उस शहर में पैदा हुए थे, दोनों की दुनिया खुबसूरत थी. न उन्हें शहर की कमी खलती थी, न हमें गांव की.
अब हर घर में एसी है. सत्तू माॅल में बिकता है, पर मेरा बेटा उसे डाउन मार्केट खाना समझता है. उसे फास्ट फूड पसंद है, जो अपने स्मार्ट फोन से मंगाना अच्छा लगता है. तपती धूप में वह अपने पिता के साथ कुछ मीटर भी नहीं चल सकता, क्योंकि उसकी त्वचा खराब हो जायेगी.
जलेबी उसने देखी नहीं, क्योंकि वह मॉल में बिकती नहीं.
अनेकों फलों के लिए हम साल भर गर्मियों का इंतजार करते थे, लेकिन बेटे के लिए उनका कोई मतलब नहीं. वो चाहे अमरख हो या कैथा या फिर खट-मिट्ठा फालसा जैसे फल, जो हम जैसे गरीब परिवारों के लिए गर्मियों को उत्सव में बदल देते थे. उन दिनों हम यही फल पाकर अपने-आपको खुशनसीब समझते थे. तब सनस्क्रीन नहीं होती थी और गर्मी कितनी भी क्यों न हो, रात में घर की भीगी छत मस्त नींद सुला ही देती थी. अंबार और करौंदा के अचार खाने का जायका बना देते थे.
आज घर में एसी है. अंबार और करौंदा मॉल में नहीं मिलते. कैथा खाये हुए सदियां बीतीं. अब मौसम बदलना जश्न मनाने का मौका नहीं होते. सारा जोर मौसम के वेग को नियंत्रित करने पर होता है.
छतें गायब हो गयी हैं. आसमान में तारे गिने दशक बीत गये. अब मौसम बदलने का मतलब समझ ही नहीं आता. फ्रिज का ठंडा पानी और एसी की ठंडा हवा गर्मी को महसूस नहीं होने देती. शायद इसे ही मौसम का वैश्वीकरण कहते हैं, जब सारे मौसम एक जैसे लगते हैं. सुख तो बहुत है, पर अब बदलते मौसम वैसी खुशियां नहीं देते, जैसा हमारे जमाने में देते थे.
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