आस्था, आर्थिकी और राजनीति

Updated at : 18 Apr 2017 6:36 AM (IST)
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आस्था, आर्थिकी और राजनीति

रमेश नैयर वरिष्ठ पत्रकार गाय इन दिनों राजनीति और मीडिया की चर्चाओं में है. उत्तेजित जन-समूह बूचड़खानों को बंद कराने में जुटे हैं. ऐसे में वक्त का तकाजा है कि भारतीय समाज में गाय के प्रति आस्था के साथ ही उसके पूरे अर्थशास्त्र और सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ को भी समझा जाये. सर्वाधिक प्रचलित मिथक यह है […]

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रमेश नैयर
वरिष्ठ पत्रकार
गाय इन दिनों राजनीति और मीडिया की चर्चाओं में है. उत्तेजित जन-समूह बूचड़खानों को बंद कराने में जुटे हैं. ऐसे में वक्त का तकाजा है कि भारतीय समाज में गाय के प्रति आस्था के साथ ही उसके पूरे अर्थशास्त्र और सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ को भी समझा जाये.
सर्वाधिक प्रचलित मिथक यह है कि भारत में गौहत्या के जनक मुसलमान हैं. यह भी कि गौवंश के व्यापारी कत्ल के लिए बूचड़खाने मुसलिम शासनकाल में शुरू हुए. लेकिन, ऐतिहासिक सत्य यह है कि इस्ट इंडिया कंपनी ने अपने ब्रिटिश स्टाफ के लिए ‘बीफ’ की आपूर्ति के लिए भारत में गौवंश के बड़े पैमाने पर कत्ल की शुरुआत की. उसके लिए उन्होंने भारतीय मुसलिम कसाईयों को भर्ती किया. जैसे-जैसे इस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार होता गया, गायों के कत्ल का सिलसिला भी बढ़ता गया.
‘धर्म-निरपेक्षता’ की आधी-अधूरी समझ वाले विद्वान भी गौमांस को लेकर अर्द्धसत्य प्रचारित करते हैं. वे जोर देकर कहते हैं कि मुगल काल के दौरान भारत में गौमांस का भक्षण नहीं होता था. पूर्ण सत्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर और शाहजहां के शासनकाल में गाैहत्या शासकीय तौर पर प्रतिबंधित थी. भारत के मध्यकालीन इतिहास के विद्वान पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि मुगल सम्राटों ने भारत के बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं और कृषि में गौवंश की उपयोगिता देखते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध लगाये रखा था. जहांगीर के शासनकाल में स्थितियां बदल गयीं और खुद जहांगीर ने गाय की कुरबानी देकर खुतबः पढ़ा.
जहांगीर के शासनकाल में ही अंगरेजों का भारत में प्रवेश होने लगा था. उनका दखल राजदरबार में होने के ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हैं. जहांगीर से उन्हें व्यापार के लिए कुछ सुविधाएं भी मिल गयी थीं. उनकी संख्या जैसे-जैसे बढ़ती गयी, गौमांस की खपत भी बढ़ती चली गयी.
गौहत्याओं का विरोध ब्रिटिश राज में शुरू हुआ. पंजाब के मलेरकोटला के गांव जमालपुर के कूका सिखों ने गायों के काटे जाने का गुरु रामसिंह कूका के नेतृत्व में विरोध किया. ब्रिटिश सेना ने सबको हिरासत में लेकर क्षमायाचना के लिए दबाव बनाया, परंतु वे हिले नहीं. अंततः अंगरेज कलेक्टर कोवन ने 50 कूका सत्याग्रहियों को तोप से उड़वा दिया. उसका असर यह हुआ कि मलेरकोटला के सिख, हिंदू और मुसलिम ने एकजुट हो लंबे समय तक गौहत्या के विरोध में सत्याग्रह जारी रखा.
गौवंश किस प्रकार से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी है, उसे मानवशास्त्री मार्विन हेरिस ने अपनी पुस्तक ‘काउज, पिग्स, वार्स एंड पिचेज’ में लिखा है- भारत के गांवों में देसी गायें उनको पालनेवालों के लिए बहुत उपयोगी होती हैं. उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है, जिसके कारण उनके उपचार पर अधिक खर्च नहीं आते. वे रूखा-सूखा चारा और बचे भोजन और साग-भाजी खाकर पेट भर लेती हैं. बदले में थोड़ा-बहुत दूध दे देती हैं, जिससे परिवार के बच्चों का पोषण हो जाता है. गाय की सबसे बड़ी सौगात होती है बछड़ा, जो छोटी जोत के किसान के लिए ट्रैक्टर की भांति उपयोगी होता है.
वर्तमान भारत में ऐसे कुछ आदर्श गांव विकसित हुए हैं, जहां गाय की गोबर गैस से सबकी रसोई में खाना पकता है. रोशनी होती है. वहां सब्जियां और खाद्यान्न की फसल भी गोबर-खाद से उगायी जाती है. गोबर-गैस से यात्री बस चलाने का एक प्रयोग भी हुआ है. दावा है कि यह प्रदूषण रहित और सस्ता ईंधन है. इस दिशा में अभी अनुसंधान की जरूरत है.
गाय का राजनीतिक पक्ष है बहुसंख्यक वर्ग की जनसमूहों की भावनाओं के सम्मोहन का. उत्तर प्रदेश में ‘गौरक्षक’ और ‘गौभक्त’ के रूप में प्रचारित आदित्यनाथ योगी को भाजपा ने मुख्यमंत्री बना कर वोटों की राजनीति में नया प्रयोग किया है. इस प्रयोग की सफलता की संभावना को आजमाने के लिए गुजरात में विधानसभा चुनावों की आहटें सुनते हुए वहां की सरकार ने गौहत्या के लिए उम्रकैद तक की कठोर सजा का प्रावधान कर दिया है. गाय भारतीय, विशेषकर हिंदू मतदाताओं की भावनाओं को झंकृत करती है. फिर भी राष्ट्र केवल भावनाओं की झंकार से लंबे समय तक नहीं चलते. उसके लिए आवश्यकता होती है, व्यावहारिक आर्थिक दृष्टि एवं दिशा के साथ ही सामाजिक समरसता की.
सरकारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में भी विचार करना होता है. मांस निर्यात एक बड़ा व्यवसाय है, जिसमें काफी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होता है. गौवंश की रक्षा को जायज मानते हुए अन्य पशु-पक्षियों के मांस के क्रय-विक्रय को निर्बाध चलने देना चाहिए. उस बड़ी जनसंख्या का भी ध्यान रखना चाहिए, जो मांसभक्षी है. अवैध बूचड़खाने बंद करना ठीक है, परंतु जन उन्माद का नजला यदि सभी बूचड़खानों पर गिरने लगा, तो वह व्यापक राष्ट्रहित में नहीं होगा.
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