जीवन दर्शन और अध्यात्म से ही होता है चरित्र का निर्माण

By Prabhat Khabar Digital Desk
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आज पांच नवंबर को कृष्णबिहारी मिश्र अपने जीवन के 85वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. गुरु आचार्य हजारी प्रसाद के शिष्य कृष्णबिहारीजी ने हिंदी जगत को अपनी रचनाधर्मिता से ऐसी चीजें दी हैं, जो अद्वितीय हैं. निजी लोकप्रियता के लिए बने-बनाये या समय के साथ बनते-विकसित होते पॉपुलर फ्रेम को छोड़, उन्होंने उन विषयों को अपनी रचना का विषय बनाया, जिनमें चुनौतियां ज्यादा थीं, कहीं कोई पगडंडी जैसी भी न थी कि उस पर चल सकें. वे ख्यातिप्राप्त ललित निबंधकार तो हैं ही, साथ ही आध्यात्मिक चिंतक भी हैं. हिंदी पत्रकारिता पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में उन्होंने जो शोध किया, वह अद्वितीय है.
परमहंस रामकृष्ण के जीवन पर उनकी किताब ‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ अविस्मरणीय रचना है. हिंदी साहित्य की दुनिया में गंवई चेतना को एक उभार देनेवाले वे अद्भुत चितेरे हैं. हिंदी इलाके के समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, परिवारशास्त्र, संस्कृतिशास्त्र सबका अध्ययन वे गहराई से करते रहे हैं और इन सबसे बढ़ कर वे उच्च कोटि के वक्ता हैं. कलकत्ते में आज एक बड़ा आयोजन हो रहा है. उनकी दो किताबों का लोकार्पण हो रहा है. प्रस्तुत है आज उनके 85वें जन्मदिन पर प्रभात खबर का विशेष संपादकीय आयोजन.
हिंदी के दुर्लभ साधक संत
हरिवंश
ती न दशक से ज्यादा हो गये, आदरणीय कृष्णबिहारीजी से आत्मीय रिश्ता बने. एक ऐसा रिश्ता, जिसे किसी एक फ्रेम में रख नहीं सकता. बस, इतना ही कहूंगा कि उनके प्रति गहरी श्रद्धा है मेरी, और अब के समय में किसी के प्रति श्रद्धा का भाव अगर है तो फिर उस व्यक्तित्व का असर और उससे लगाव-जुड़ाव को महसूसा जा सकता है. 1977-78 का साल था.
तब कृष्णबिहारीजी से मिला नहीं था, लेकिन उनसे मिले बिना उनके प्रति आत्मीयता का भाव पनपा था. उनके साहित्य को पढ़ कर भावात्मक रूप से, बहुत गहराई से उनसे जुड़ता गया. मैं मुंबई में टाइम्स आॅफ इंडिया ग्रुप में काम करता था. वहां मुंबई में एक कस्टम अधिकारी थे शैलेंद्र तिवारी. मेरे बहुत आत्मीय. उन जैसा उम्दा इनसान अब तक नहीं देखा. वे अब इस दुनिया में नहीं हैं. थे तो कस्टम अधिकारी, लेकिन बौद्धिक रूप से बहुत सजग.
अपने समय के मुद्दों की गहरी समझ रखते थे, उस पर बात करते थे. मुझे छोटे भाई का स्नेह देते थे. एक दिन उनके ही घर पर बात हो रही थी. हिंदी इलाके के मानस पर बात चल रही थी, तभी उन्होंने ‘बेहया के जंगल’ किताब की चर्चा की. यह कृष्णबिहारीजी की कालजयी रचना है. ललित निबंध संग्रह. इस किताब का इंतजाम किया. पढ़ना शुरू किया. पढ़ता ही चला गया. लगा जैसे कि मन में जो बेचैनी है, जो कहने की अकुलाहट है और उसे व्यक्त कर पाने की क्षमता अथवा सामर्थ्य नहीं है, उसे कृष्णबिहारीजी आसानी से, सहजता से, परपीड़ा को आत्मसात कर लिख रहे हैं. इस तरह मैं बिना मिले, सिर्फ कृतित्व से रू-ब-रू होकर कृष्णबिहारीजी के प्रति एक आत्मीयता और आदर का भाव मन में रखने लगा.
बाद में जब आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप में काम करने कोलकाता आया, तो वहां उनके बेटे कमलेशजी से भेंट होने लगी. एक दिन उनके साथ ही पहली बार घर गया. कृष्णबिहारीजी से पहली मुलाकात हुई. जब उनके सामने गया, काफी देर तक ढेरों बातें हुई, उसके बाद आत्मीयता, आदर का यह भाव श्रद्धा में बदल गया, जो अब भी उसी तरह से है. या यूं कहिए कि दिन-ब-दिन गहराता ही गया है.
जिन्हें भारत की आत्मा को समझना है, उन्हें कृष्णबिहारीजी को समझना होगा. कृष्णबिहारीजी जितनी ईमानदारी से, जितनी गहराई से गांवों की व्याख्या व्यापक फलक पर करते हैं, वैसा हिंदी साहित्य में दुर्लभ ही है. और यह तो सच है न कि गांव को समझे बिना हम भारत की समस्या, चुनौतियां और संभावनाएं, किसी को जमीनी स्तर पर नहीं समझ सकते. आज जिन गांवों को हम पिछड़ा मानते हैं, वहां की शिक्षा पर टिप्पणी करते हैं, उन गांवों का चरित्र नहीं जानते. कैसे रिश्ते होते थे गांव में. चाहे जितना बैर-भाव हो, जितनी लड़ाई हो लेकिन मुश्किल समय में साथ देने का रिवाज हर गांव में था. बेटी की शादी हो तो कोई बैरभाव नहीं रहता था.
किसी के घर मरनी-जियनी हो, सब दुश्मनागत को परे कर दिया जाता था. कोई बुजुर्ग हो, चाहे वह किसी जाति का हो, जो उम्र में छोटे होते थे, सम्मान का भाव रखते थे. उनका यह अधिकार होता था कि वे किसी के बच्चों को डांट सकते थे. सजा दे सकते थे. गांव की अनपढ़ औरतों का जीवन दर्शन प्रेरक था. अभाव में रहकर भी आत्मीयता-प्यार-दुलार बरसाना. गांव की इन सारी संस्कृतियों को कृष्णबिहारीजी ने करीब से समझा और उसे उतने ही सामर्थ्य के साथ शब्दों में पिरोया.
मैं मिलने गया तो मिलते ही कहा कि मैं आपको गुरु मानता हूं, अभिभावक भी. सिर्फ आपका प्रशंसक भर नहीं हूं. यह भाव कृष्णबिहारीजी के घर जाते ही, उनसे आमने-सामने की मुलाकात होते ही आया था. पहली बार लगा था कि कथनी और करनी को जीनेवाले लोगों में बिरले हैं ये. ये उन लोगों में से हैं, जो सिर्फ ज्ञान और शिक्षा नहीं देते, उसे अपने जीवन में जीते हैं, आचरण में उतारते और निभाते हैं.
कृष्णबिहारीजी उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के बलिहार गांव के एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखते हैं.
उनके दादा-पिताजी बड़े समृद्ध लोग रहे. बड़ा कारोबार था, लेकिन कृष्णबिहारीजी कोलकाता में एक छोटे-से कमरे में वर्षों से रहते हैं. कुटिया जैसा छोटा-सा कमरा और उसी में उनका पुस्तकालय. उस छोटे-से कमरे में जाने के बाद एक अलग अनुभूति होती है, अलग एहसास होता है, लगता है स्वत:स्फूर्त तरीके से ऊर्जा का संचरण हो रहा है. उस छोटी-सी कोठरी में आत्मीयता और स्नेह की बारिश होती है. वहां सामने एक चौकी पर बैठे-लेटे कृष्णबिहारीजी ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने होते हैं, जो एक साथ गांधी, लोहिया, तिलक, महर्षि अरविंद जैसे महापुरुषों के जीवन के तत्वों और सत्वों को जीते हैं.
इसलिए मैं कह रहा हूं कि ऐसे लोगोें पर सिर्फ बात भर नहीं करते कृष्णबिहारीजी, उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतार चुके हैं, इसलिए हिंदी पट्टी के बौद्धिकों में उनका कोई सानी नहीं. कलकत्ते में रहनेवाले अशोक सेकसरिया जैसे लोग, जो कि जल्दी किसी की तारीफ नहीं करते थे, कई कसौटियों पर कसने के बाद ही किसी के बारे में कुछ बोलते थे, वे कहते थे कि वे कृष्णबिहारीजी का आदर करते हैं. ऐसे कई लोग हैं, जो कृष्णबिहारीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रभावित होकर उनके प्रति गहरा आदर और सम्मान का भाव रखते हैं. मैं तो जब कोलकाता जाता हूं, उनसे मिलने-बोलने-बतियाने का मोह और लालच, दोनों रहता है.
अगर मैं कृष्णबिहारीजी के मुकाबले हिंदी पट्टी में किसी के सानी नहीं होने की बात कह रहा हूं तो इसका दायरा सिर्फ साहित्य तक संभव नहीं. मुझे साहित्य की गहरी समझ भी नहीं.
मैं तो अर्थशास्त्र का छात्र रहा. साहित्य में रुचि तो ऐसे ही लोगों को पढ़ने के कारण जगी और अब मानता हूं कि अगर जीवन में साहित्य के प्रति रुचि नहीं जगती, तो शायद समझ विकसित नहीं हो पाती. साहित्य से इतर कृष्णबिहारीजी की समझ कितनी गहरी थी, उस संदर्भ में कई प्रसंग हैं मेरे पास. एक बार मैं उनके पास बैठा था. देश के आर्थिक मॉडल पर बात चल रही थी. उन्होंने कहा कि आपने जेके मेहता की किताब पढ़ी है क्या? मैंने अनभिज्ञता जतायी तो उन्होंने अपनी कोठरी के पुस्तकालय से वह किताब निकालकर मुझे पढ़ने को दिया.
जेके मेहता इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. अर्थशास्त्र के गहरे अध्येता. साम्यवाद और पूंजीवाद के बीच गांधीवाद के आर्थिक रास्ते पर उनका गहरा शोध और अध्ययन था. मेहता की वह दुर्लभ और जरूरी किताब, जो अंगरेजी में थी, के बारे में हिंदी साहित्य के आदमी कृष्णबिहारीजी ने बताया, पढ़ाया. इसी तरह एक बार जेपी पर बात निकली तो कृष्णबिहारीजी ने पूछा कि जेपी की पुस्तिका ‘इंसेंटिव टू विटनेस’ पढ़े हैं? मैंने इस बार भी ना में जवाब दिया, तो उन्होंने फिर वह पुस्तिका भी दी.
जेपी के उस पुस्तिका की चर्चा कम होती है या न के बराबर, जबकि वह जेपी को समझने के लिए एक अद्भत पुस्तक है. 1952 के आसपास जेपी आॅल इंडिया पोस्टल इंप्लाईज एसोसिएशन के महासचिव थे. उसी दौरान उन्होंने यह पुस्तिका लिखी थी. कैसे अच्छा इनसान बना जाये, किताब का मूल वही है. तब जेपी का मार्क्सवाद से मोहभंग हो रहा था जबकि वे अमेरिका से मार्क्सवादी होकर ही लौटे थे.
कृष्णबिहारीजी ने सिर्फ पुस्तिका ही नहीं दी, फिर इसके गहरे मर्म को समझाया. न जाने कितने रेफरेंस देते हुए. हिंदी साहित्य में ऐसे लोग कम मिलेंगे. मैं जब भी उनके पास जाता हूं, एक-एक विषय पर वे तह तक जाकर समझाते हैं. और उनकी सबसे खास बात यह है कि वे कोई भी बात जब कहते हैं, तो उसका ​आधार कभी भी कहा-सुनी नहीं होता, रिकाॅर्डेड फैक्ट के आधार पर ही कुछ भी कहते हैं. इसी तरह उनका काम पत्रकारिता पर है. हिंदी पत्रकारिता पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में जो उन्होंने शोध किया, वह अद्वितीय है. हिंदी का कोई पत्रकार अपने ही पेशे पर ऐसा कालजयी काम अब तक नहीं कर सका. एक-एक पुराने पत्रकारों के बारे में इतनी गहराई से शोध करना, उनके नायकत्व को उभारकर सदा-सदा के लिए डॉक्यूमेंटेड कर देना, कोई साधारण काम नहीं.
आज भौतिकवादी युग में पत्रकारिता की दशा और दिशा चाहे जो हो गयी हो, लेकिन भविष्य में जब भी पत्रकारिता मूल में लौटेगी, कृष्णबिहारीजी का वह काम प्रेरणा, ऊर्जा और मार्गदर्शन का एक मजबूत आधार होगा. और इन सबसे अलग एक खास पहचान है उनकी गहरी आध्यात्मिक समझ की. वे पूजा-पाठ करनेवाले इनसान नहीं, लेकिन गहरे आध्यात्मिक चिंतक हैं. एक-एक मनीषियों पर गहरा अध्ययन है उनका. और सिर्फ वैसे मनीषियों के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं वे, उसे जीवन में जीते भी हैं.
त्याग, समर्पण, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता का एक आखिरी उदाहरण देना चाहूंगा. कृष्णबिहारीजी देश भर में विख्यात हुए. उन्हें देश भर से बेस्ट आॅफर आते रहे. बड़े से बड़े नामचीन संस्थान से जुड़ने का प्रस्ताव आता रहा, लेकिन वे कोलकाता के एक कॉलेज में जीवन भर अपनी सेवा देते रहे. कोलकाता जैसे महानगर में एक कुटिया बनाकर एक कोठरी में कर्मयोगी साधक की तरह निरंतर काम में लगे रहे. अपने स्वत्व को बचाकर. अपने गंवई ईमानदारी और निश्छलता को निष्कलुष रखकर.
(निराला से बातचीत पर आधारित)
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