शहादत और सियासत

Updated at : 04 Nov 2016 6:17 AM (IST)
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शहादत और सियासत

वन रैंक, वन पेंशन की मांग कर रहे एक पूर्व सैनिक की बुधवार को आत्महत्या के बाद से दिल्ली में सियासी घमासान मचा है. इसमें विपक्षी नेताओं की अचानक सामने आयी राजनीतिक सक्रियता और उनसे निपटने में केंद्र सरकार के अधीन काम करनेवाली दिल्ली पुलिस की मनमानी कार्रवाई पर उठते सवालों को सिरे से खारिज […]

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वन रैंक, वन पेंशन की मांग कर रहे एक पूर्व सैनिक की बुधवार को आत्महत्या के बाद से दिल्ली में सियासी घमासान मचा है. इसमें विपक्षी नेताओं की अचानक सामने आयी राजनीतिक सक्रियता और उनसे निपटने में केंद्र सरकार के अधीन काम करनेवाली दिल्ली पुलिस की मनमानी कार्रवाई पर उठते सवालों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. देश की सुरक्षा, सेना और सैनिकों के प्रति सम्मान से जुड़े मसलों का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए नहीं होना चाहिए.
पर, साल के शुरू में हुए पठानकोट हमले और पूर्व सैनिकों के प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस की हिंसक कार्रवाई से लेकर नियंत्रण रेखा के पार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और फिल्म में पाक कलाकारों को मौका देनेवाले निर्माताओं से सेना के कोष में जबरिया दान दिलाने की कोशिश तक सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सियासी आरोप-प्रत्यारोपों का एक सिलसिला चल रहा है. पूर्व सूबेदार राम किशन ग्रेवाल की मौत उनके परिजनों ही नहीं, सेवारत और सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों तथापूरे देश के लिए बहुत दुखद है. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद ओआरओपी पर गंभीर चर्चा ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
पूर्व सैनिक इसके लिए वर्षों से संघर्षरत हैं. भाजपा का यह एक प्रमुख चुनावी वादा भी था. लेकिन, कांग्रेस की पूर्व सरकारों ने भी इसके लिए समुचित कदम नहीं उठाये थे. अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी हों, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह जैसे केंद्रीय मंत्री- नेताओं को अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गैरजिम्मेवाराना तेवर या बयानबाजी से परहेज करना चाहिए. हर मुद्दे पर सड़क पर उतरने की रणनीति उचित नहीं. विपक्ष कई अन्य तरीकों से भी सरकार पर दबाव बना सकता है.
दूसरी ओर, विरोध के ऐसे मौकों से निपटने में सत्ता पक्ष को भी जरूरी संयम और सूझबूझ का परिचय देना चाहिए. ग्रेवाल के शोक-संतप्त परिजनों, देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के उपाध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री को हिरासत में लेने के दिल्ली पुलिस के तौर-तरीकों पर सवाल उठना गैरवाजिब नहीं है. देश की राजधानी में पुलिस की कार्रवाई का राजनीति प्रेरित प्रतीत होना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे मौकों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस को अधिक संवेदनशील और जिम्मेवार बनाने की जरूरत है.
इसी दिल्ली में पिछले साल एक किसान द्वारा आत्महत्या के बाद बड़ी संख्या में भाजपा, कांग्रेस और आप के नेता अस्पताल पहुंचे थे. तब दिल्ली पुलिस ने न तो किसी को रोका था और न ही हिरासत में लिया था. उम्मीद है कि एक पूर्व सैनिक की शहादत का सम्मान करते हुए, सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेता सतही राजनीति त्याग कर, वन रैंक वन पेंशन पर एक संतोषजनक समाधान का मार्ग प्रशस्त करने में सहभागी बनेंगे.
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