छद्म समाजवाद का टूटता मिथक

Updated at : 27 Oct 2016 6:36 AM (IST)
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छद्म समाजवाद का टूटता मिथक

अनुपम त्रिवेदी राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज यादव परिवार में पिछले दिनों जिस तरह से सरेआम सिर-फुटौवल हुआ, उसने मौकापरस्त नेताओं के ‘छद्म समाजवाद’ को नंगा कर दिया. अपने आप को समाजवादी कहनेवालों ने जग-जाहिर कर दिया कि समाजवाद से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. सारा खेल परिवार और सत्ता का […]

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अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज यादव परिवार में पिछले दिनों जिस तरह से सरेआम सिर-फुटौवल हुआ, उसने मौकापरस्त नेताओं के ‘छद्म समाजवाद’ को नंगा कर दिया. अपने आप को समाजवादी कहनेवालों ने जग-जाहिर कर दिया कि समाजवाद से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. सारा खेल परिवार और सत्ता का है. 20 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश की समूची राजनीति मुलायम के 20-सदस्यीय राजनीतिक परिवार तक सिमट गयी है.
दरअसल, बीते 25 वर्ष में खुद को खांटी समाजवादी और लोहिया का शिष्य बतानेवाले मुलायम सिंह ने समाजवाद के नाम पर परिवारवाद और जातिवाद के जाल में उत्तर प्रदेश को ऐसा उलझाया कि समाजवादी चिंतक ही नहीं, उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हतप्रभ रह गये.
गरीबी, बेरोजगारी व बढ़ते अपराध से कराहते प्रदेश में ‘समाजवादी’ झुनझुना पकड़ा कर चुनाव-दर-चुनाव वे मतदाताओं को बहलाने में सफल रहे. पर, इटावा-मैनपुरी-कन्नौज के बरमूडा ट्राएंगल और उसके केंद्र सैफई में आचार्य नरेंद्र देव और डाॅ राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आदर्श कब दफन हो गये, किसी को पता ही नहीं चला.
ब्रिटिश राजनीतिक विज्ञानी हैरॉल्ड लॉस्की ने समाजवाद को एक ऐसी टोपी कहा था, जिसे कोई भी अपने अनुसार पहन लेता है. भारत के और खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं ने इस कथन को बार-बार साबित किया है. पहले लोहिया और फिर जेपी नारायण के नाम पर न जाने कितनी समाजवादी टोपियां पिछले चार दशकों से इन दोनों प्रदेशों में पहनी व पहनायी गयी हैं.
पर, असल समाजवाद क्या है और उसके आदर्श एवं सिद्धांत क्या हैं, शायद अब किसी को पता नहीं है. भारत में समाजवाद के मुख्य प्रणेता माने जानेवाले डाॅ राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर आयोजित एक समारोह में मुलायम सिंह ने कहा था कि सपा कार्यकर्ताओं में समाजवादी सिद्धांतों की मूल जानकारी की कमी है. उन्होंने कहा कि लोहिया के साहित्य को न तो कोई खरीदता है और न पढ़ता है. उन्होंने कार्यकर्ताओं को समझाया कि समाजवाद के मूल तत्व को समझ कर उसे अपने जीवन में उतारना बेहद जरूरी है. पर, खुद मुलायम और उनके परिवार ने इस पर कितना अमल किया, यह जग-जाहिर है.
यह दुर्भाग्य है कि जिन डॉ लोहिया का नाम ले-लेकर ये तथाकथित समाजवादी राजनीति करते हैं, उनकी महानता का इनको लेश-मात्र भी अनुमान नहीं है. डाॅ लोहिया का नाम उन महान भारतीयों नेताओं में अग्रणी है, जिन्होंने समाज में फैली विकृतियों के विरुद्ध बहुआयामी संघर्ष किया. अमेरिका में जाकर रंग-भेद के खिलाफ सत्याग्रह से लेकर ‘अंगरेजों-भारत-छोड़ो आंदोलन’ की अगुआई और गोवा मुक्ति-संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेनेवाले डाॅ लोहिया एक विलक्षण राजनेता थे. उन्होंने जन-जन को अपने मूल अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया और देश में सामाजिक-आर्थिक विषमताओं तथा धार्मिक विकृतियों के खिलाफ कई अभियानों का सूत्रपात किया. उन्होंने विकेंद्रीकरण और विकासोन्मुख गांधीवाद की अवधारणा दी.
पहले भारत की आजादी और फिर आजादी के बाद एक समता-मूलक समाज की स्थापना के लिए वे जीवन पर्यंत लड़े. वे एक मौलिक आर्थिक व सामाजिक चिंतक थे. वे कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं करते थे. 1954 में केरल में उन्होंने अपनी ही सरकार गिरा दी, किंतु सैद्धांतिक शुचिता को बनाये रखा. उत्तर प्रदेश के आज के अांबेडकर नगर में जन्मे डाॅ लोहिया के बारे में कहा जाता था कि वे कुटी में जन्मे और बिना कुटीरके फकीर के रूप में मानवता की सेवा करते हुए महाप्रयाण कर गये. अपने और अपने परिवार के लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं जोड़ा.
अब जरा तुलना कीजिये इस विलक्षण नेता को अपना गुरु माननेवाले आज के नेताओं की. उन्होंने वह सब किया, जिसका लोहिया जीवन-पर्यंत विरोध करते रहे. जातिवाद, परिवारवाद व असमानता के धुर-विरोधी लोहिया के चेलों की पूरी राजनीति ही जातिवाद और परिवारवाद पर टिक गयी. सत्ता के लिए हर हद तक जाकर समझौते किये गये. गुंडे सफेद खादी पहन कर समाजवादी हो गये. कहना मुश्किल हो गया कि समाजवाद का लंपटीकरण हुआ या लंपटों का समाजीकरण. फक्कड़ लोहिया के जमीनी समाजवाद को इन छद्म समाजवादियों के राजसी ठाट-बाट ने शर्मसार कर दिया. जिस प्रदेश में किसान आत्महत्या कर रहे थे और बेरोजगार अपराध को उन्मुख हो रहे थे, वहां मुलायम के अपने गांव सैफई में रंगीनियां बरस रही थीं. अपने 75वें जन्मदिन पर विक्टोरियन बग्घी में बैठ कर रामपुर की सड़कों पर राजसी सवारी में निकलते मुलायम ने लोहिया की स्मृति को सिरे से मिटा दिया.
समाजवाद का ऐसा विद्रूप चेहरा अगर लोहिया देखते, तो शायद जी ही नहीं पाते. मुलायम की घोर-विरोधी मायावती ने एक प्रेस काॅन्फ्रेंस में कहा कि लोहिया अाज जीवित होते, तो मुलायम सिंह को सपा से निकाल देते.
मुलायम हों या मायावती, बातें सब समाज और सर्वजन की करते हैं, पर यह सब कुछ छद्म से ज्यादा नहीं है. असली उद्देश्य ‘स्व’ और ‘स्वजन’ हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि जहां मुलायम का समाजवाद विक्टोरियन बग्घी पर घूमता है, वहीं मायावती का दलित-उत्थान के नाम पर लाल-पत्थर के हाथियों की सवारी करता है. दोनों का काम सिर्फ जनता को लूटना है. लेकिन, ‘समाजवाद’ का यह छद्म अब टूट रहा है. और इसके सूत्रधार और कोई नहीं, बल्कि ‘समाजवाद’ के ये ठेकेदार ही हैं.
पिछले दिनों जो हुआ, उससे जाहिर तौर पर भले ही नुकसान सपा को हुआ हो, जो उत्तर प्रदेश में तेजी से अपना रुतबा और हैसियत खो रही है, पर असली नुकसान ‘समाजवाद’ की उस अवधारणा को हुआ है, जिसमें गरीब, पिछड़े जन का हित सर्वोपरि था. नुकसान उस शासन-व्यवस्था और ताने-बाने को भी हुआ है, जिसे हमारे नीति-नियंताओं ने बड़े परिश्रम से खड़ा किया था. यह ताना-बाना टूट रहा है. अब हर भ्रष्ट मंत्री बन सकता है और हर ईमानदार अफसर सजा का हकदार.
अगले सप्ताह सपा के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं. अच्छा होगा यदि यह पार्टी अब छद्म समाजवाद को छोड़ कर लोहिया के समाजवादी दर्शन और समाजवादी आचरण को आत्मसात करे. शायद इससे ही लोहिया की आत्मा को कुछ शांति मिले!
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