जनसेवा गयी तेल लेने!

Updated at : 03 Oct 2016 4:56 AM (IST)
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जनसेवा गयी तेल लेने!

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार सुधार और विकास के वादों पर भक्तराज फिर से निर्वाचित हुए हैं. जनता को पूरी आशा है कि इस बार जरूर उखड़ी सड़क बनेगी. चोक सीवर खुलेंगे. जल-भराव से निजात मिलेगी. शुद्ध पानी मिलेगा. प्रॉपर्टी डीलिंग व अवैध कब्जों के धंधे को समर्पित भक्तराज को ऊपरवाले पर पूरा भरोसा है. उन्होंने […]

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वीर विनोद छाबड़ा
व्यंग्यकार
सुधार और विकास के वादों पर भक्तराज फिर से निर्वाचित हुए हैं. जनता को पूरी आशा है कि इस बार जरूर उखड़ी सड़क बनेगी. चोक सीवर खुलेंगे. जल-भराव से निजात मिलेगी. शुद्ध पानी मिलेगा. प्रॉपर्टी डीलिंग व अवैध कब्जों के धंधे को समर्पित भक्तराज को ऊपरवाले पर पूरा भरोसा है. उन्होंने अपनी जीत को अधर्म पर जीत के पर्व में मनाने की घोषणा की. उन्होंने बदहाल पार्क की घास कटवा कर वहीं फुंकवा दी. आसपास के तमाम घरों में धुआं घुस गया. लोग बेतरह खांसे. वृद्धजनों का तो दम घुटने लगा. दो अस्थमा पीड़ित मरणासन्न स्थिति में अस्पताल पहुंचाये गये.
भक्तराज बोले- ‘आप ही की गलती है. खिड़कियां बंद रखनी चाहिए. धर्म-कर्म का मामला है. थोड़ा-बहुत कष्ट तो सहना पड़ता है.’ धर्म-कर्म जैसी मिसाइल के सामने भला कौन बोले. मोहल्ला सुधार समिति के अध्यक्ष जी ने भी हां में हां मिलायी. शिकायतकर्ता ढेर हो गये.
संध्या में झमझमा भजन-कीर्तन हुआ. भक्तराज फिल्मी धुनों पर बने भजनों पर भौंडे तरीके से झूम-झूम नाचे. बजरंगबली के मेकअप में एक भक्त भी खूब नाचा. सौ-पचास के नोट लुटाये गये. मालूम नहीं कि धर्मग्रंथों में हनुमान जी के नृत्य का जिक्र है कि नहीं. लेकिन, इतने भौंडे तरीके से तो नहीं नाचे होंगे. इस कौतुक पर जनता धन्य हुई. जम कर नकद चढ़ावा आया. ईश्वर के नाम पर कम और भक्तराज के नाम पर ज्यादा जयकारे लगे. फिर सबने जम कर स्वादिष्ट भंडारा डकारा.
डकार इस सच का प्रतीक है कि निरीह जनता ने मान लिया है- ‘सड़क इस बार भी नहीं बनी, तो कोई बात नहीं. अगर नयी सीवर लाइन डाली गयी, तो मुसीबत ही आयेगी. अतिक्रमण कर बनाये हुए सबके गैराज, किचेन, गार्डन, दुकानें, चबूतरे आदि टूटेंगे.
पार्क का विकास होगा, तो फूल-पत्ती लगेगी. कोई फूल तोड़ेगा, कोई पौधे रौंदेगा. बेमतलब का झगड़ा-फसाद. झूला लगा तो पहले झूलने की मारा-मारी. फिर कोई झूले से गिरेगा. किसी का सिर फूटा, किसी का माथा. पुलिस में रिपोर्ट और फिर कोर्ट-कचेहरी. लड़ते रहिये उम्र भर! लेकिन, बच्चे क्रिकेट कहां खेलेंगे? बच्चे धोनी और विराट जैसे होनहार नहीं बनेंगे.
नल में शुद्ध पानी नहीं है, तो क्या हुआ? एक्वाॅगार्ड तो घर-घर है ही! भैया, जैसा है, चलने दो. सब रामभरोसे छोड़ दो. इतना बड़ा कथा-कीर्तन और भंडारा हुआ है. गगनभेदी जयकारे लगे हैं. ऊपर कुछ तो आवाज पहुंची ही होगी. कुछ तो कृपा बरसेगी. भाव-विभोर जनता-जनार्दन एकमत में बोली- सड़क, पार्क, पानी, सीवर को मारो गोली.
भक्तराज आश्वस्त हुए कि अगले पांच बरस शांति से कटेंगे. जनसेवा गयी तेल लेने. साल में एक दफे कीर्तन-भंडारे का झुनझुना बजाते रहो. जनता को न आश्वासन याद आयेगा और न विकास. भक्तराज की आंखों में कौंधती शैतानी चमक साफ बता रही थी- चुनाव जीतने का मंत्र हमसे सुनो. धर्म, जाति, सांप्रदायिकता, मौकापरस्ती, दबंगई, लालच के कार्ड अपने हाथ में रखो.
भक्तराज ठीक कहते हैं. जहां डीएनए में ही बदनीयती घुसी हो, वहां तो रामभरोसे ही सब कुछ चलना है. नास्तिकों को यकीन भी कराना है कि भगवान हैं. न होते तो इतना बड़ा मुल्क कैसे चल रहा होता!
कथा समाप्त होने से पहले जरूरी है कि यह खबर पढ़ लें. एक बड़े विदेशी पत्रकार ने ट्वीट किया. घनघोर नास्तिक होने के नाते मैं ईश्वर के अस्तित्व पर कभी यकीन नहीं करता था. परंतु, भारत में सारे सिस्टम को रामभरोसे चलते देख कर मुझे यकीन होने लगा है कि भगवान हैं.
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