माताओं की फिक्र कहां!

Updated at : 21 Sep 2016 12:35 AM (IST)
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माताओं की फिक्र कहां!

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली झेलने के लिए लोग इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि यह मुद्दा अब किसी को आंदोलित नहीं करता. जब देश के किसी कोने में कोई दाना माझी अपने कंधे पर पत्नी की लाश लेकर मीलों का सफर तय करता है, या सत्ता की नाक के नीचे राजधानी में […]

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भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली झेलने के लिए लोग इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि यह मुद्दा अब किसी को आंदोलित नहीं करता. जब देश के किसी कोने में कोई दाना माझी अपने कंधे पर पत्नी की लाश लेकर मीलों का सफर तय करता है, या सत्ता की नाक के नीचे राजधानी में भी लोग डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों से बेमौत मरने लगते हैं, तब यह बदहाली भले सुर्खियों और चर्चा का विषय बनती हो, कुछ ही दिनों में बात फिर आयी-गयी हो जाती है.

दुर्भाग्य से, सार्वजनिक स्वास्थ्य की आजादी के बाद से ही जारी इस उपेक्षा की देश ने अब तक भारी कीमत चुकायी है. इसी कड़ी में लांसेंट की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2015 में पूरी दुनिया में गर्भावस्था या प्रसव के दौरान हुई माताओं की मृत्यु में से एक तिहाई सिर्फ दो देशों- भारत (करीब 45,000) और नाइजीरिया (करीब 58,000)- में हुई हैं. संयुक्त राष्ट्र आम सभा से पहले तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि पिछले वर्षों में मातृ मृत्यु दर में दुनिया भर में कमी आयी है, लेकिन भारत सहित कुछ देशों में सुधार की रफ्तार काफी धीमी है.

रिपोर्ट में इसका कारण भी बताया गया है- देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी अधिकतर प्रसव अप्रशिक्षित दाई के भरोसे होता है और आपात स्थिति में जान बचाने के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं. गांवों में साफ पानी और बिजली की पर्याप्त उपलब्धता न होना समस्या को और गंभीर बना रहा है. यही कारण है कि शिशु मृत्यु दर में भी भारत दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को छोड़ कर अन्य देशों के मुकाबले पीछे है.

इस चिंताजनक स्थिति के बावजूद भारत स्वास्थ्य के मद में जीडीपी का पांच फीसदी से भी कम खर्च करता है और इस मामले में ब्रिक्स समूह के देशों में सबसे पीछे है. दूसरी ओर ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्थाएं जीडीपी का करीब 9 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं. पिछले साल आयी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अगले बीस सालों में 30 लाख डॉक्टर, 60 लाख नर्स और 36 लाख नये हास्पिटल बेड्स की जरूरत होगी, जिसके लिए कम-से-कम 245 अरब डॉलर का निवेश जरूरी होगा. फिलहाल सरकारी क्षेत्र में डॉक्टर, नर्स और अस्पतालों की कमी तथा निजी क्षेत्र में महंगे उपचार के बीच आम भारतीयों के लिए बीमारियों से लड़ने के विकल्प बहुत सीमित हैं. कहने की जरूरत नहीं कि इसका निदान सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा कर ही हो सकता है.

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