सात जन्मों का बंधन

Updated at : 11 Jul 2016 12:52 AM (IST)
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सात जन्मों का बंधन

एकदम सुबह-सुबह श्रीबाबू आ धमके. वे बहुत ही गुस्से में भरे हुए फड़फड़ा रहे थे. सरकार यानी घरैतिन का हमला हुआ है. भीतर से गहरे घायल हैं. बंदे ने उन्हें प्यार से समझाने की कोशिश की. भगवान का दिया सब कुछ है. मकान-दुकान, फाइव फिगर आमदनी. बड़े ही लायक दो बच्चे, एक गुणसुंदरी पत्नी… बस-बस-बस… […]

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एकदम सुबह-सुबह श्रीबाबू आ धमके. वे बहुत ही गुस्से में भरे हुए फड़फड़ा रहे थे. सरकार यानी घरैतिन का हमला हुआ है. भीतर से गहरे घायल हैं. बंदे ने उन्हें प्यार से समझाने की कोशिश की. भगवान का दिया सब कुछ है. मकान-दुकान, फाइव फिगर आमदनी. बड़े ही लायक दो बच्चे, एक गुणसुंदरी पत्नी…

बस-बस-बस… बंदे की बात काटते हुए श्रीबाबू दहाड़ उठे. यही तो है असली परेशानी. निजाम बदला. छोटे-बड़े सबको ‘लिफ्ट’ किया, लेकिन हमारी ‘सरकार’ नहीं बदली. बड़ी हसरत से वोट किये थे कि निजाम बदलेगा, तो हमारी हुकूमत होगी. हमारी मौजूदा ताकतों में इजाफा होगा. सरकार को बर्खास्त करने की ताकत भी मिलेगी. मगर अफसोस कि सब जस-का-तस पहले जैसा ही है. सरकार की मर्जी का खाना और उन्हीं की मर्जी का उठना-बैठना भी. आने-जाने में पांच मिनट इधर-उधर हुए नहीं कि सवालों के गोले दगने शुरू. कहां ठहर गये थे? किसके घर चले गये थे? कौन थी वह, जिसे स्कूटर पर लिफ्ट देकर घर तक छोड़ा? सफाई देने का मौका तक नहीं दिया और फौरन ही सजा सुना दी. चौका-बर्तन करो.

अब कल रात का ही का मुद्दा लीजिये. मैंने एसी बंद कर दिया कि इससे जोड़ों में दर्द होगा. पंखा भी मोहन जोदड़ो के जमाने का खड़-खड़ करता हुआ. ऊपर से वोल्टेज डाउन. कसम से नर्क समझो. जब सुबह में मौसम ठंडा हो गया, तो नींद गहरी आ गयी. देर तक क्या सो लिये कि सरकार ने बाल्टी भर पानी झोंक दिया- पचास के होने को आये, अभी तक स्विट्जरलैंड के सपने देखते हो. शर्म करो…

अरे भाई, भला सपने भी कभी पूछ कर आते हैं क्या? और स्विट‍्जरलैंड चले भी गये, तो क्या गुनाह किया. वहां हमारा न कोई बैंक एकाउंट है और न कालाधन. मगर सरकार है कि मानती नहीं- कमाऊ डिपार्टमेंट में काम करते हो. सुना है कि वहां सभी रिश्वत लेते हैं. तुम भी जरूर लेते होगे. तभी तो स्विट्जरलैंड के सपने आते हैं…

सरकार ने आज नया फरमान जारी किया है कि इधर से नहीं उधर से जाया करो. इधर महिलाएं हर वक्त पंचायत लगाये खड़ी होती हैं… अरे भाई, इसमें हमारा क्या कसूर? उन महिलाओं को समझाओ न!

श्रीबाबू के सब्र का बांध टूट चला. कहने लगे कि जिंदा कौमें इंतजार नहीं कर सकतीं. आज ही प्रधानमंत्री जी को पत्नी पीड़ित संघ की ओर से इस बावत चिट्ठी ई-मेल करेंगे. अगर हमारी मांग पूरी नहीं हुई, तो अब आमरण अनशन शुरू समझिये.

इधर रसोई से बर्तन गिरा. मेमसाब की चेतावनी है यह. दफ्तर नहीं जाना क्या? मौके की नजाकत को भांपते हुए बंदे ने श्रीबाबू से अनुरोध किया कि बंधु इस पुराण पर कृपया यहीं क्रमशः लगायें.

श्रीबाबू बड़ी कसमसाहट से शाम को गतांक से आगे का वृत्तांत सुनाने का वादा लेकर टले. उनके जाते ही बंदा तुरंत स्नान-ध्यान कर ऑफिस के लिए निकला, तो श्रीबाबू की सरकार दिख गयीं. गोरे-गोरे मुखड़े पे काला-काला चश्मा. भीगे बिल्ले श्रीबाबू ने मुंह छुपाते हुए कार का पिछला दरवाजा खोला. सरकार ने श्रीबाबू को कर्ज खाये आदमी की समान घूरा और धम्म से बैठ गयीं. मोटे दहेज की एवज में बिके श्रीबाबू ने बाअदब हौले से दरवाजा बंद किया और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर सरकार के अगले हुक्म का इंतजार करने लगे. कहां चलें?

बंदा हौले से मुस्कुराया. सूबे और मुल्क के निजाम भले ही कितनी बार बदलें, पत्नी पीड़ितों के दिन न तो बदले हैं और न बदलेंगे. तेरी कहानी यही रहेगी. फिलहाल तो यह सात जन्मों का बंधन है प्यारे.

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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