आदिवासियों का भोलापन

Updated at : 29 Jun 2016 6:08 AM (IST)
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आदिवासियों का भोलापन

पिछले दिनों गुमला जिले के कई गांवों में जाने का मौका मिला. वहां आदिवासी भाई-बहनों और प्यारे बच्चों से मिली. कई महिलाएं हड़िया बेचती सड़क किनारे मिलीं. उनकी तसवीरें खींचीं और जिज्ञासावश पूछ लिया कि हड़िया कैसे बनाती हैं? जवाब था- माड़ निकाले बिना चावल सिझाते हैं, फिर उसे किसी बरतन में पसरा देते हैं. […]

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पिछले दिनों गुमला जिले के कई गांवों में जाने का मौका मिला. वहां आदिवासी भाई-बहनों और प्यारे बच्चों से मिली. कई महिलाएं हड़िया बेचती सड़क किनारे मिलीं. उनकी तसवीरें खींचीं और जिज्ञासावश पूछ लिया कि हड़िया कैसे बनाती हैं? जवाब था- माड़ निकाले बिना चावल सिझाते हैं, फिर उसे किसी बरतन में पसरा देते हैं. जब ठंडा हो जाता है, तो घड़े में भर कर उसमें रानो (जंगली जड़ी-बूटी) डाल कर बंद कर देते हैं.

तीन-चार रात तक रखते हैं. भात भीग जाता है. फिर सुबह गर्म पानी डालते हैं और छान कर दोपहर में ले आते हैं. बड़ी पतीली की हड़िया खत्म हुई, तो डेढ़ सौ रुपये तक मिल जाते हैं. मैंने कहा- आपको पता है न कि हड़िया नहीं पीनी चाहिए. उनमें से एक ने अनभिज्ञता से पूछा- हड़िया नहीं पीनी चाहिए? एक अन्य महिला ने कहा- तो का करेंगे? आदिवासी के सब परब में हड़िया जरूर होगा. सब देवता को हड़िया-दारू चढ़ता है. पूर्वज भी हड़िया पीते थे, तो हम काहे नहीं पियेंगे? अभी बुढ़िया करम आ रहा है, उसमें भी पियेंगे और देवता को भी चढ़ायेंगे.

मैंने समझाना चाहा- यह भी तो हो सकता है कि देवता को चढ़ाइये, पर खुद मत पीजिए. तो दूसरी ने कहा- दीदी जी, हमरे देवता नाराज हो जायेंगे. हम नहीं पियेंगे, नहीं चढ़ायेंगे, तो हमरे पुरखे हमारा बुरा करेंगे, हमको मार देंगे. जो-जो बूढ़ा-बूढ़ी मर गये हैं, उन्हीं को तो बैठाते हैं परब में, उनको तो हड़िया-दारू देना ही है. नहीं देंगे तो हमको दुख देगा. फिर कहीं दिखायेंगे, तो कहेगा कि तुम ऐसा नहीं कर रहे हो, इसीलिए हम दुख दे रहे हैं. जैसे पहले का आदमी किया, वैसे ही न करना पड़ता है.

मेरा अगला सवाल था- यह परब क्यों मनाते हैं? उनका सीधा-सा जवाब था- अपने-अपने घर के देवता, माता-पिता और जो बूढ़ा-बूढ़ी मर गये हैं, उनको पूजते हैं. नहीं पूजेंगे तो वो हमको दुख देगा.

मैं समझ नहीं पा रही थी कि उनकी इस मासूमियत और भोलेपन पर दुखी होऊं या आश्चर्य व्यक्त करूं. अक्सर मासूमियत पर प्यार आता है. उनकी सोच में कोई बनावटीपन न था. वे महिलाएं इस बात पर जोर दे रही थीं कि अगर हड़िया नहीं चढ़ायी, तो पूर्वज दुख देंगे. उनके हालात आज भी चिंतनीय हैं. हमारे देश-प्रदेश ने भले ही बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहनेवाले इन आदिवासियों के हालात में बड़े परिवर्तन की दरकार अब भी है.

एक और गांव गयी. वहां कुछ महिलाओं ने बताया कि ‘बुढ़िया करम’ बरखा का त्योहार है. आदिवासी प्रकृति को पूजते हैं. त्योहार होगा तो बारिश होगी. अच्छी खेती होगी. हमरा खर्च अच्छे से चलेगा. इसे बच्चे नहीं मनाते. बुढ़िया करम की तैयारियों पर उन्होंने बताया- एक हफ्ते से तैयारी चल रही है. घर की सफाई हो रही है. शराब बन रहा है, माड़ी बन रहा है. नयी साड़ी पहनेंगे. सब अपने-अपने मेहमान को बुला रहे हैं. सुबह बिना कुछ खाये-पिये मांदर बजाते जल धरने जंगल जायेंगे. नदी पर नहा कर करम की तीन डाली तोड़ कर दोहरा में लायेंगे. नदी से जो जल लायेंगे, उसे मंदिर, जितिया, सरना और पांचों पंडा में ढालेंगे (चढ़ायेंगे). बैगा के घर पूजा होगी. आंगन में करम की डाली गाड़ कर चारों ओर बैठ कर महिलाएं पूजा करेंगी. पूजा करके मादर-नगाड़ा बजायेंगे, करमा पकड़के खूब खेलेंगे यानी नाचेंगे-गायेंगे. रोटी-मुर्गा देते हैं. घर लीप कर रोटी-पीठा पकाते हैं. खूब खुशी मनाते हैं. फिर शाम को करमा बहाने जायेंगे.

इसी कड़ी में कुछ और प्रश्नों के जो जवाब मिले, उनसे साफ लगा कि ये आदिवासी भले ही काफी कम पढ़े-लिखे, आर्थिक रूप से पिछड़े और समाज की मुख्यधारा से कटे हों, हड़िया पीते हों, लेकिन सोच में कहीं बहुत आगे हैं. उनकी बेटियों के सिर हमेशा खतरे की तलवार नहीं लटकती. पूरा गांव-टोला साथ बैठता है. बच्चे साथ में यहां-वहां खेलते मिल जायेंगे. न उनके माता-पिता को डर और न ही बच्चों को किसी से खतरा. हां, अजनबियों को देख कर कुछ बच्चे भाग जाते हैं. घरेलू हिंसा के मामले चाहे पति-पत्नी के बीच हों या घर की महिलाओं के बीच, इनमें नहीं के बराबर हैं. जो थोड़ा-बहुत झगड़ा होता है, वह पतियों के शराब पीने के बाद. ये आदिवासी अपनी बेटियों को गर्भ में नहीं मारते. बच्चों का होना ‘अंधियारी खेती’ बताते हैं. मतलब क्या फर्क है बेटा हो या बेटी. अभी भी वे बैगा, पुजार और पाहन की बातें आंख मूंद कर मानते हैं.

ये दो गांवों की बातें हैं. बुढ़िया करम को कुछ ने पुरखों के लिए बताया, तो कुछ ने अच्छी वर्षा के निहितार्थ, लेकिन दोनों का मकसद एक ही था- मिलजुल कर खुशी मनाना, नाच-गाने के साथ मनोरंजन. दूसरी ओर, हम गैरआदिवासियों ने प्रत्येक त्योहार का इतना बाजारीकरण कर दिया है कि उसकी चकाचौंध, अंधाधुंध होड़ में अनाप-शनाप खर्च करते हैं, फिर भी चेहरे पर वह चमक नहीं होती, जो उनके चेहरों पर थी.

वीना श्रीवास्तव

साहित्यकार एवं स्तंभकार

veena.rajshiv@gmail.com

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