संकटों के राजनीतिक निहितार्थ
Updated at : 27 May 2016 6:25 AM (IST)
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डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया मेक्सिकन मूल के कवि एवं कार्यकर्ता एम्मानुएल ओर्तीज ने युद्ध और नरसंहार के अंतरराष्ट्रीय साजिशों का प्रतिरोध करते हुए एक कविता लिखी- ‘अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन/तो रोक दो तेल के पंप/ बंद कर दो इंजन और टेलीविजन/ डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज/ […]
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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
मेक्सिकन मूल के कवि एवं कार्यकर्ता एम्मानुएल ओर्तीज ने युद्ध और नरसंहार के अंतरराष्ट्रीय साजिशों का प्रतिरोध करते हुए एक कविता लिखी- ‘अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन/तो रोक दो तेल के पंप/ बंद कर दो इंजन और टेलीविजन/ डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज/ फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट/ बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां/ डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज/ उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट/ अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बेल की खिड़की पर ईंट मारो/ और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो.’
ओर्तीज की यह कविता विकास विरोधी नहीं, बल्कि युद्ध विरोधी है. युद्ध और नरसंहार साम्राज्यवादी ताकतों की साजिशों के परिणाम होते हैं, जो अपना हित साधने के लिए सभ्यता, लोकतंत्र या आतंक के नाम पर किसी के ऊपर भी हमला करते हैं और उसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उपनिवेश बनाते हैं. सूचना तंत्र पर एकाधिकार की बदौलत वे मनमाने तरीके से चीजों को परिभाषित कर दुनिया को भ्रमित करते हैं. यह कविता मूलत: राजनीतिक है, लेकिन यह इसके अलावे अन्य सूत्रों को भी खोलती है, जिसका संबंध आज की कथित सभ्यता से है.
आज ग्लोबल वार्मिंग ने जीवन चक्र को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है. पर्यावरण विशेषज्ञों की राय पर दुनियाभर में पर्यावरण सुरक्षा के लिए अभियान चलाये जा रहे हैं. इन सबके बावजूद जिस बात पर चुप्पी है वह है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थनीति पर. इस बात पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थनीति का संबंध अभिन्न रूप से पर्यावरण संकट से है. ओर्तीज की कविता इस संदर्भ में भी अपना अर्थ प्रकट करती है. जब वे ‘रोक दो तेल के पंप’ या ‘टैको बेल की खिड़की पर ईंट मारो’ कहते हैं, तो इसी राजनीति और अर्थनीति का प्रतिरोध करते हैं. दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस पूंजी पर आधारित है, उसके लिए बाजारों की अनिवार्यता है. अधिकतम लाभ तभी संभव है, जब अधिकतम बाजार हों. उस बाजार का स्वरूप उन्मुक्त हो और उस पर एकाधिकार हो.
फलत: पूरी दुनिया को बाजार में बदल देने की जो कवायद शुरू हुई, उसने अनावश्यक वस्तुओं को भी विज्ञापनों की चमक-दमक से जीवनोपयोगी बताना शुरू किया और जो वस्तुएं सही मायने में जीवनोपयोगी थीं, वे विज्ञापनों की भीड़ में दब गयी. बैरो डैनहोम अपनी किताब ‘मनुष्य बनाम मिथक’ में लिखते हैं कि ‘वस्तुओं का उत्पादन तभी होता है या तभी हो सकता है, जब इससे मुनाफा कमाना संभव हो.’
पूंजी निर्देशित बाजार, बेलगाम उत्पादन एवं विवेकहीन उपभोग का प्रसार बिना राजनीतिक शक्ति के संभव नहीं है. यह राजनीतिक शक्ति बिना सैन्य शक्ति के संभव नहीं है. ये एक-दूसरे के पूरक हैं. चूंकि यह शक्ति मुट्ठीभर विकसित देशों ने हासिल कर लिया है, इसलिए अर्थनीति पर उनका ही एकाधिपत्य है. उपनिवेशवाद के शुरुआती दिनों में ‘सभ्यता’ के नाम पर, शीतयुद्ध के दिनों में कम्युनिज्म का भय दिखा कर और अब लोकतंत्र व आतंकवाद के नाम पर बाजार पर एकाधिकार की साजिश चल रही है. इसने ही हथियारों की होड़ को जन्म दिया है. अब देखते ही देखते पूरी दुनिया युद्ध के साये में आ गयी है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस एंड रिसर्च सेंटर ने दुनिया की दस सबसे बड़ी हथियार कंपनियों की सूची जारी की थी, जिसमें से सभी कंपनियां अमेरिकी और यूरोपीय थीं. अकेले छह कंपनियां अमेरिका की थीं. इस तरह की नीतियों का नाभिनालबद्ध संबंध युद्ध से है. एदुआर्दो गलियानो ने कहा भी था कि ‘युद्ध वैसे ही बेचे जाते हैं जैसे कारें, झूठ बोल कर’. हमें युद्ध की नीतियों, उसके उत्पादों और उसके लिए होनेवाली वैश्विक कूटनीति से पर्यावरण संकट के संबंध की गहन पड़ताल करनी चाहिए.
सन् 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित ‘पृथ्वी सम्मेलन’ में फिदेल कास्त्रो ने एक जरूरी बात कही थी कि ‘असमान व्यापार, संरक्षणवाद और विदेशी कर्ज पर्यावरण संतुलन पर घातक प्रभाव डालते हैं और उसके विनाश को बढ़ावा देते हैं. यदि हम मानवजाति को इस आत्मघात से बचाना चाहते हैं, तो पूरी पृथ्वी पर धन-दौलत और उपलब्ध तकनीक का बेहतर तरीके से वितरण करना होगा. कुछ देशों में एेशो-आराम और बरबादी में कटौती करने का मतलब होगा- अधिकांश विश्व में कम गरीबी और कम भुखमरी.’ फिदेल कास्त्रो पर्यावरण मंच से कोई राजनीतिक बात नहीं कर रहे थे, लेकिन उनकी बातों का राजनीतिक निहितार्थ अवश्य था. दुनिया में संसाधनों का असमान वितरण पर्यावरण संकट समाधान में सबसे बड़ा बाधक है. उच्च जीवन शैली वाले अपनी आदतों में बदलाव नहीं लाना चाहते, उलटे उन्हें और अधिक विलास चाहिए. वे अपने ‘विवेकहीन उपभोग’ को न केवल विज्ञापित करते हैं, बल्कि उसे संरक्षित करने के लिए राजनीतिक प्रभुता का इस्तेमाल करते हैं. मौजूदा दुनिया एक ओर भुखमरी की दुनिया है, तो दूसरी ओर अय्याशों की दुनिया है. हमें ऐसी विडंबनाओं के राजनीतिक निहितार्थ को समझना बहुत जरूरी है.
ग्रीन हाउस उत्सर्जन जैसी चीजें पर्यावरण के मुद्दे से जुड़ी हुई हैं ही, लेकिन इसके पीछे के नीतिगत मसलों को हल करना सबसे पहले जरूरी है. हमारी जीवन शैली में प्रभुतावादी चीजें नीतिगत रूप में बहुत गहरी घुसी हुई हैं. हमें पेड़ रोपने, पानी बचाने की आदर्श भरी बातें कही तो जाती हैं, लेकिन जंगलों, पहाड़ों, नदियों को नष्ट करने की नीतिगत बातें हमसे छुपा ली जाती हैं. और जब कोई इस तरह की नीतियों के विरुद्ध खड़ा होता है, तो वह अपराधी बना दिया जाता है.
आज हमारे देश में किसी भी संसदीय राजनीतिक दल के एजेंडे में पर्यावरण का मुद्दा नहीं है. गांधी का देश होने के बावजूद विचारों के धरातल पर हमारी संसदीय पार्टियां साम्राज्यवादी नीतियों की ही पिछलग्गू हैं.
उनके पास आमजन के लिए कोई विकल्प नहीं है, जबकि संसाधनों पर नियंत्रण की अंधी होड़ निकट भविष्य में आमजन के लिए सबसे बड़ी मुसीबत खड़ी करनेवाली है. ओर्तीज के शब्दों में तब शायद हमें ‘एक लम्हा मौन’ रखने के लिए अवसर भी नहीं मिलेगा.
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