परायी नहीं बेटियां

Updated at : 22 Apr 2016 6:10 AM (IST)
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परायी नहीं बेटियां

देश में 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या करीब 10 करोड़ है. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से लगभग आधे बुजुर्ग गरीबी रेखा से नीचे हैं यानी उन्हें कायदे से दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है. हर आठ में से एक बुजुर्ग को लगता है […]

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देश में 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या करीब 10 करोड़ है. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से लगभग आधे बुजुर्ग गरीबी रेखा से नीचे हैं यानी उन्हें कायदे से दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है.
हर आठ में से एक बुजुर्ग को लगता है कि उसके होने या न होने से अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. तकरीबन ढाई करोड़ बुजुर्ग अपने परिवार, खासकर बेटे और बहू या पोते-पोतियों के हाथो उपेक्षा और प्रताड़ना के शिकार होते हैं. वृद्धाश्रम की जिंदगी भी उनके लिए कुछ खास सहायक नहीं है. एक सर्वे के मुताबिक, 85 प्रतिशत बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में रहना अच्छा नहीं लगता, उन्हें अकेलापन सताता है. ऐसे में बुजुर्ग सम्मानपूर्वक जीवन की इच्छा को लेकर किसका दरवाजा खटखटायें? कानून तो हैं, पर कानून का सहारा परिवार के सहारे की बराबरी नहीं कर सकता.
और एक सच यह भी है कि इसी महीने देश की सबसे बड़ी अदालत को सरकार से पूछना पड़ा कि बुजुर्ग, अशक्त और बीमार लोगों के अधिकार क्योंकर लागू नहीं हुए. सम्मानपूर्वक जीवन जीने की उम्मीद में कुछ बुजुर्ग एक युक्ति का इस्तेमाल करते हैं. वे अपने हाव-भाव, बात-विचार से जताते हैं कि उनके नाम पर जो भी संपत्ति है, उस व्यक्ति को देंगे, जो जीवन की आखिरी घड़ी तक उनकी देखभाल करेगा.
लेकिन समाज के सोच में गहरे तक पैठी पितृसत्तात्मक समझ उनके साथ दगा कर सकती है जैसा कि पश्चिम बंगाल कोआॅपरेटिव सोसायटी से जुड़े एक मामले में हुआ है. सोसायटी ने पिता की मृत्यु के बाद फ्लैट का मालिकाना हक शादीशुदा बेटी के नाम करने से मना कर दिया, जबकि अपनी पत्नी और बेटे के हाथों उपेक्षा का शिकार हुए पिता की जरूरी देखभाल उनके अंतिम वर्षों में शादीशुदा बेटी ने ही की थी. सोसायटी ने उस बेटी को मृतक (पिता) के परिवार का स्वाभाविक हिस्सा मानने से इनकार कर दिया.
अब मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा बेटी परिवार का हिस्सा हो सकती है और संपत्ति उसके नाम भी की जा सकती है. इस फैसले ने समाज में सदियों से व्याप्त उस भ्रांत धारणा पर जरूरी चोट की है, जो बेटी को पराया धन करार देती है.
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