गांधी-स्थलों की दुर्दशा!

Updated at : 21 Apr 2016 6:21 AM (IST)
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गांधी-स्थलों की दुर्दशा!

डॉ वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ स्तंभकार गांधीजी ने अब से ठीक 99 साल पहले चंपारण में सत्याग्रह की शुरुआत की थी. इस चंपारण ने ही गांधी को गांधी बनाया. उनके हाथ में अहिंसक सत्याग्रह का ब्रह्मास्त्र थमाया. नील उगानेवाले किसानों और मजदूरों को अंगरेजों के चंगुल से छुड़ाने में गांधी ने यहां जो सफलता पायी, उसी […]

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डॉ वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ स्तंभकार

गांधीजी ने अब से ठीक 99 साल पहले चंपारण में सत्याग्रह की शुरुआत की थी. इस चंपारण ने ही गांधी को गांधी बनाया. उनके हाथ में अहिंसक सत्याग्रह का ब्रह्मास्त्र थमाया. नील उगानेवाले किसानों और मजदूरों को अंगरेजों के चंगुल से छुड़ाने में गांधी ने यहां जो सफलता पायी, उसी ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सफलता की नींव रखी.भारत में गांधीजी की प्रथम सत्याग्रह-स्थली चंपारण की यात्रा पूरी करके अब हम दिल्ली लौट रहे हैं.

तीन दिन के इस प्रवास में गांधीजी द्वारा स्थापित कई पाठशालाओं, खादी संस्थाओं और उनके स्मारकों को देखने का मौका मिला. मुझे तो चंपारण में पांव रखते ही अपूर्व स्फुरण हुआ. यह मुझे तीर्थों का तीर्थ लगा. अब से लगभग 60 साल पहले मैंने सत्याग्रह किया था और जेल काटी थी. उस हिंदी-सत्याग्रह की प्रेरणा मुझे महर्षि दयानंद से मिली थी या महात्मा गांधी से, मैं कह नहीं सकता. क्योंकि उस समय मेरी उम्र 13 साल की भी नहीं थी. उसके बाद अपने छात्र-काल में कई बार मैंने अनशन किये और जेल काटी.

मुझे गांधी का सत्याग्रह का रास्ता तब भी सही लगता था और अब भी सही लगता है. यह बात दूसरी है कि आजकल देश की राजनीति सत्याग्रह की बजाय वोटाग्रह और नोटाग्रह पर चल रही है. भारत इतनी जल्दी गांधी को भूल जायेगा, मुझे इसका अंदाज नहीं था. मैंने सोचा था कि चंपारण और बिहार में तो गांधी दनदना रहे होंगे. चलके वहीं देखा जाये.

पटना, रांची और भागलपुर तो मैं दर्जनों बार आया, लेकिन हमेशा कुछेक घंटों के लिए ही. इस बात बिहार देखने को मिला. बिहारी लोगों की गर्मजोशी, सादगी और भक्तिभाव ने अभिभूत कर दिया. लेकिन चंपारण में गांधी-स्थलों की दुर्दशा देख कर बहुत पीड़ा हुई. सबसे पहले हम बेतिया के वृंदावन कुमारबाग आश्रम गयेे. इसे 3 मई, 1939 में गांधीजी ने स्थापित किया था.

उसमें अब 600 बच्चे पढ़ते हैं. 2001 तक यह खंडहर बन गया था. 2002-03 में इसे ‘गांधी स्मृति’ ने फिर से जीवित कर दिया. चलते वक्त इसके शिक्षक-शिक्षिकाओं ने हाथ जोड़ कर बड़े संकोच के साथ कहा कि ‘चार माह से हमें तनख्वाह नहीं मिली है. आप कुछ कृपा करवाइए न!’ आप जानते हैं कि इनकी तनख्वाह कितनी है? सिर्फ डेढ़ सौ रुपये रोज!

यही हाल मोतिहारी के ‘मधुबन खादी आश्रम’ का था. भयंकर गर्मी में पंखा भी नहीं. सारा कुर्ता पसीने में तर हो गया. जब चलने लगे तो खादी कातनेवाली महिलाओं ने कहा कि हमें 30 रुपये रोज से 70-80 रुपये रोज की कमाई होती है. पेट भी नहीं भरता. हमारी ‘मजूरी’ बढ़वा दीजिए. सिरसिया के बुनियादी विद्यालय का भी यही हाल है. शिक्षक स्वयंसेवकों को नियमित वेतन नहीं मिल रहा है.

सभी स्थान बदरंग, टूटे-फूटे और कचरों के ढेर से पटे पड़े हैं. सिर्फ गांधी संग्रहालय ठीक-ठाक लगा. बाबू ब्रजकिशोर सिंह के सौजन्य से जल-पुरुष राजेंद्र सिंह ने यहीं से जल-सत्याग्रह की घोषणा की. मैंने स्वभाषा में हस्ताक्षर अभियान की घोषणा की. हमने प्रभात झा (फिल्मकार प्रकाश झा के भाई) के घर विश्वजीत मुखर्जी की फिल्म भी देखी.

चंपारण के गांधी-स्थलों की दुर्दशा देख कर दिल बैठ गया. छात्रों और अध्यापकों को गांधीजी का पूरा नाम भी नहीं पता. चित्र देख कर देश के महान नेताओं की वे पहचान नहीं कर सकते थे.

गांधीजी को चंपारण ले जानेवाले राजकुमार शुक्ल के परिवार के किसी सदस्य से नहीं मिल सके, लेकिन बत्तख मियां के एक वंशज से मिले. बत्तख मियां उस अंगरेज अफसर के रसोइये थे, जिसने गांधीजी को जहर पिलाने का आदेश दिया था. बत्तख मियां ने आदेश का उल्लंघन किया था. प्रभात झा ने निमंत्रण दिया है कि उनकी जमीन पर हम नया आश्रम कायम करें.

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