संवेदनहीन राजनेता
Updated at : 20 Apr 2016 5:55 AM (IST)
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अकाल का अनुभव इस देश के लिए नया नहीं है. अगर कुछ नया है, तो शासक-वर्ग की हृदयहीनता. दस से ज्यादा राज्य किसी-न-किसी रूप में पानी के लिए तरस रहे हैं. पानी के लिए मचे हाहाकार के लिए ग्लोबल वार्मिंग, अल नीनो का असर, वर्षा-चक्र में अकस्मात बदलाव, व्यावसायिक खेती के लिए भूजल का अत्यधिक […]
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अकाल का अनुभव इस देश के लिए नया नहीं है. अगर कुछ नया है, तो शासक-वर्ग की हृदयहीनता. दस से ज्यादा राज्य किसी-न-किसी रूप में पानी के लिए तरस रहे हैं. पानी के लिए मचे हाहाकार के लिए ग्लोबल वार्मिंग, अल नीनो का असर, वर्षा-चक्र में अकस्मात बदलाव, व्यावसायिक खेती के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन, पानी सरीखे संसाधन के लोगों के बीच समतामूलक बंटवारे के बारे में किसी ठोस नीति का अभाव, आपदा-प्रबंधन के मामले में आग लगने पर कूआं खोदने जैसी हड़बड़ाहट का प्रदर्शन जैसे दसियों कारण गिनाये जा सकते हैं.
और यह पूछा जा सकता है कि अगर इस देश में संविधान ने लोगों को गरिमापूर्वक जीवन जीने का अधिकार दिया है, तो फिर देश का शासक वर्ग इस अधिकार को मुहैया कराने के मामले में क्योंकर इस तरह असफल रहा कि दस से ज्यादा राज्यों के कुछेक इलाकों में लोगों के खेत और कंठ पानी के लिए तरस रहे हैं?
लेकिन यह सवाल कैसे पूछा जाये और किसके पूछा जाये? असल दुख यही है कि दुखियारी जनता इधर अपना दुखड़ा सुनाने चलती है, उधर शासक-वर्ग अपनी अदाओं से जनता-जनार्दन के दुख का उपहास उड़ाता जान पड़ता है.
अगर ऐसा ना होता तो महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाके के दौरे को आत्मतोष की मुस्कुराहट से भरी सेल्फी खींचने के अवसर में तब्दील करने से पहले महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे हजार बार सोचतीं कि दुर्भिक्ष के दौरे पर जाकर लोगों को ढांढ़स बंधाने और पर्यटन और पिकनिक के ख्याल से कहीं जाने में अंतर होता है और जनसेवकों को इस अंतर का हर घड़ी ध्यान रखना पड़ता है. अगर इस अंतर का ख्याल होता, तो महाराष्ट्र के मंत्री एकनाथ खडसे पानी के लिए बेहाल लातूर जिले के गावों में पहुंचने के लिए 10 हजार लीटर पानी हैलीपैड बनवाने के नाम पर खर्च करने से पहले बार-बार सोचते. लोगों के कंठ और खेत के सूखे होने का दुख व्यापता, तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री के काफिले की राह से धूल-गर्द हटाने के लिए स्थानीय प्रशासन कई टैंकर पानी सड़क पर ना पटाता.
हृदयहीनता को जाहिर करते इन बरतावों के बीच लोगों को बहुत याद आयेंगे गांधी, जिन्होंने एक वस्त्र में रहने को मजबूर किसी स्त्री की गरीबी को देखा और फिर आजीवन एक ही वस्त्र में रहे. बहुत याद आयेंगे लाल बहादुर शास्त्री, क्योंकि वे अनाज की कमी झेल रहे देश में लोगों के दुख से एकाकार होने के लिए खुद उपवास कर सकते थे. इस देश के लोगों को अकाल का अनुभव याद है, काश नेताओं को भी गांधी की नजीर याद होती!
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