दिखावे पर न जा, अपनी अक्ल लगा

Published at :18 Dec 2013 3:36 AM (IST)
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दिखावे पर न जा, अपनी अक्ल लगा

विरले ही ऐसे मिलते हैं, जो नाम और शोहरत के पीछे नहीं भागते. आज दुनिया का नियम है, ‘जो दिखता है वही बिकता है’. और यहीं से शुरू होती है दिखावे की जंग. भारत की जनता भोली है, उसे तहकीकात करने की फुरसत कहां! बाबाजी बोलते हैं प्राणायाम करो, हम करने लगते हैं. ज्योतिषी अंगूठी […]

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विरले ही ऐसे मिलते हैं, जो नाम और शोहरत के पीछे नहीं भागते. आज दुनिया का नियम है, ‘जो दिखता है वही बिकता है’. और यहीं से शुरू होती है दिखावे की जंग. भारत की जनता भोली है, उसे तहकीकात करने की फुरसत कहां! बाबाजी बोलते हैं प्राणायाम करो, हम करने लगते हैं. ज्योतिषी अंगूठी पहनने को बोलता है, पहन लेते हैं. निर्मल बाबा गरीबों को समोसा खिलाने को कहते हैं, खिला देते हैं.

आशाराम ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाते हैं, हम पढ़ लेते हैं. नेता वोट देने को बोलता है, दे देते हैं. पर हम कभी नहीं पूछते कि क्यों करें ये सब, ये उपाय किस ढंग से काम करेंगे, यह कहां तक उचित है? इसके नफा-नुकसान क्या हैं? जो दिखाता है, हम देखते जाते हैं और शामिल हो जाते हैं इसी दौड़ में. खाने को घर में दाना ना हो, पर मोबाइल का खर्च निकल जाता है. दो-चार सिगरेट दिन में ना फूंक लें, हमारी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती. जितना ज्यादा दिखावा, उतनी प्रतिष्ठा. पर नतीजा क्या? निर्मल बाबा लुटेरे निकलते हैं, तो ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाने वाले आशाराम बलात्कारी.

इधर नेता वोट लेकर अपना उल्लू सीधा कर लेता है, तो सिगरेट-शराब के रूप में कैंसर बेचने वाले ऐश की जिंदगी जीते हैं. मीडिया टीआरपी के लिए ऐसी खबरें दिखाती है जो वास्तविक भारत से परे है. जिसे चाहो हाइलाइट करो, जिसे चाहो गिरा दो. पर जो गरीबी है, भारत की प्रतिष्ठा है उसका क्या? सेंसर बोर्ड का सेंस खत्म हो गया है तो देश सेंसलेस होगा ही. सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा हमारी जनता नहीं जानती और ना ही सवाल करना. उसे तो विश्वासघात ङोलने की आदत है. पर जो विश्वासघात करते हैं, वे भूल जाते हैं कि रंगा सियार का रंग उतरना आम बात है, फिर चाहे वह नेता हो, संत हो या कोई और.
अभिषेक इंद्र गुरु, हजारीबाग

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