न हन्यते हन्यमाने शरीरे

Published at :07 Dec 2013 4:18 AM (IST)
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न हन्यते हन्यमाने शरीरे

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) दिल्ली के मंगलापुरी शवदाह गृह में उस दिन एक बेहद तकलीफदेह अनुभव से गुजरा, जब मेरे समधी की चिता जल रही थी और एक राजनीतिक दल के उत्साही कार्यकर्ता चुनाव-प्रचार करते-करते श्मशान के आहाते में घुस गये. नहीं, उन्होंने कोई शोरगुल नहीं किया, वे भद्रजन की भांति मेरे बिल्कुल […]

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।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

दिल्ली के मंगलापुरी शवदाह गृह में उस दिन एक बेहद तकलीफदेह अनुभव से गुजरा, जब मेरे समधी की चिता जल रही थी और एक राजनीतिक दल के उत्साही कार्यकर्ता चुनाव-प्रचार करते-करते श्मशान के आहाते में घुस गये. नहीं, उन्होंने कोई शोरगुल नहीं किया, वे भद्रजन की भांति मेरे बिल्कुल पास आकर बैठ गये और गंभीर मुद्रा में दो मिनट दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देते हुए बोले-मुङो बहुत खेद है कि आपको अपने प्रियजन का वियोग ङोलना पड़ रहा है. मैं इस अप्रत्याशित सहानुभूति-प्रदर्शन के लिए मन से तैयार नहीं था.

इसलिए बिना कोई जवाब दिये उस बड़े आदमी के बारे में सोचता रहा, जिसने लड़की वालों की ओर से भारी राशि तिलक-दहेज के रूप में प्रस्तावित करने पर उस पुलिस अधिकारी को डांट कर घर से भगा दिया, जबकि वे खुद पुलिस संवर्ग के थे और इंटेलिजेंस ब्यूरो में उपनिदेशक पद पर कार्यरत थे. उनके गुस्से का कारण यह था कि यह शख्स पुलिस की नौकरी से इतना कैसे कमा लिया कि दहेज दे रहा है. जरूर इसके पास गलत पैसा है. इसके बाद वे सीधे मेरे घर बेटी मांगने आ गये. बोले कि मेरे घर एक बेटी कभी आयी थी, जो शादी के बाद ससुराल चली गयी. मेरा एक ही बेटा है. आप अपनी बेटी मुङो दे दीजिए. उन्होंने मुङो सोचने का मौका भी नहीं दिया और मेरी मंझली पुत्री को आशीर्वाद के रूप में आभूषण पहना कर उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया.

मैं चकित था कि उनके साथ कैसे निभेगी, क्योंकि वे आइबी के कड़े अधिकारी माने जाते थे. मैं ठहरा संवेदनशील कवि. कह रहीम कैसे निभे केर-बेर को संग! लेकिन बाद में पता चला कि उनके पास वत्सलता और स्नेह से भरा एक मुलायम मन था. पर्व-त्योहारों पर उनके एसएमएस अत्यंत भाव-प्रवण और आलंकारिक होते थे. बातचीत में भी वे मुझसे अधिक साहित्यिक होते थे. जब मैं एक बार उनके गांव गया तो हर व्यक्ति से मेरा ऐसा परिचय कराते कि मैं शर्म से पानी-पानी हो जाता. कितना गर्व था उन्हें मुझ पर! उस बलिया गांव में शिव के भैरव रूप की काले पत्थर की आदमकद प्राचीन प्रतिमा है, जिसका तांत्रिक महत्त्व है. मंदिर के परिसर में एक विशाल वृक्ष के नीचे बैठ कर जब वे अपने गांव की विशेषताओं को बताने लगे, तो एक पुस्तक भर सामग्री उड़ेल गये, जो उन्होंने बचपन में वाचिक परंपरा से प्राप्त किया था और जीवन के उत्तरार्ध तक उसे अपने मन-मस्तिष्क में संजो कर रखा था. मिथिला के इतिहास से लेकर कर्मकांड तक का विशद ज्ञान उन्हें था. कई बार मैंने सोचा कि उनकी बातचीत को नोट कर लूं, मगर नहीं हो सका. अगहन में हर साल वे सपत्नीक गांव जाते थे, धान की फसल कटवाने. गांव और ससुराल के सारे खेत उन्होंने कुछ विश्वास-पात्र श्रमिकों को बटाई पर दे रखे थे. धान की फसल अगहन में कटनी शुरू होती है, गेहूं की चैत में. इसलिए इन दो मासों में वे पति-पत्नी गांव आ जाते थे. चैत के बाद तो आम भी पकने लगता है. सो दिल्ली की सड़ी गर्मी से जान बचाने के लिए वे दोनों बैसाख-जेठ मास गांव में ही बिताते थे. लौटते समय बोरों में भर कर आम ऐसे लाते थे, जैसे मंगल ग्रह से मीथेन उठा लाये हों. वे चाहते थे कि बच्चे भी इसी तरह गांव के आत्मीय उजास से जुड़ें, जिसके लिए वे कभी-कभी अत्यंत आद्र होकर बच्चों के सामने अरदास भी करते थे.

इस बार भी वे गांव ही गये थे. एक दिन पत्नी को बस में बैठा कर सकरी से लौट रहे थे कि हाइवे पर बेतहाशा भागती सूमो की चपेट में उनका पुराना स्कूटर आ गया. उन्हें सकरी से दरभंगा, वहां से पटना लाया गया, एक प्राइवेट अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखा गया. एक सप्ताह के बाद भी जब कोई सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली लाया गया. वहां उपचार शुरू हुआ, मगर उन्हें बचाया नहीं जा सका. मृत्यु से ठीक एक दिन पहले उन्होंने फोन पर लंबी बातचीत में मनरेगा से लेकर सर्व शिक्षा अभियान तक की बखिया उधेड़ी थी. उन्होंने कहा था कि इतनी महंगी सब्जी होने के बावजूद गांव में खूब बिक रही है, क्योंकि मजदूरों के पास पर्याप्त पैसे हैं. यह मेरे लिए चौंकानेवाली बात थी, क्योंकि वे निम्नवर्ग के पक्षधर ही नहीं थे, उन पर ज्यादा विश्वास भी करते थे. उनके गांव में घर-गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी एक धनुकाइन संभालती है, जिसका नाम किसी को नहीं मालूम. लोग उसकी बेटी के नाम में मां जोड़ कर उसे पुकार लेते हैं.

वे लंबे समय तक दिल्ली में रहे थे. छोटा-सा परिवार, पति-पत्नी और एक पुत्र, एक पुत्री. तबादला होने पर सामान बांध कर चल देने में उन्हें चौबीस घंटे भी नहीं लगते थे. गांव में पैतृक संपत्ति तो थी ही, ससुराल में भी कोई उत्तराधिकारी नहीं था. सो, उधर की जिम्मेवारी भी उन्हीं के पास थी. आज वे अमुक झा से मिट्टी हो गये हैं. पड़ोसियों ने तो यही पूछा था-मिट्टी कब उठेगी? पञ्च महाभूतों का एक समुच्चय अग्निदेव को समर्पित कर दिया गया था, फिर से नयी सृष्टि के लिए. मेरा नन्हा-सा नाती विमर्श कहता है कि बाबा स्टार होकर ऊपर से हमें देखते रहने के लिए स्काई में चले गये. वह रात में दिल्ली के प्रदूषित आकाश में सितारों के बीच अपने बाबा को पहचानने की कोशिश भी करेगा. उसे बाबा का वियोग कभी नहीं सतायेगा, क्योंकि बाबा तो स्टार बन गये हैं.

मंगलापुरी शवदाह गृह में जलती चिता को एकटक देखते हुए मेरा ध्यान तब बंटा, जब उस कार्यकर्ता ने पूछा कि आपका घर किस कांस्टीचुएंसी में है. जब मैंने बताया कि हम द्वारका में रहते हैं, मगर श्रद्धकर्म करने गांव चले जायेंगे, इसलिए मतदान में शामिल नहीं हो सकेंगे, तब वह मुङो एक नागरिक के लिए मतदान कितना जरूरी है, इसका उपदेश देने लगा. अब मुङो पूरा विश्वास हो गया है कि जो काम भारतीय धर्मशास्त्र नहीं कर पाया, वह राजनीतिशास्त्र ने कर दिखाया. राजनीति ने आज अपनी बेहयाई से यह सिद्ध कर दिया कि श्मशान में भी वैराग्य नहीं उपजता और मरी हुई आत्मा के भी जीवित शरीर होते हैं. इन राजनेताओं की आत्मा ही हन्यमान है, शरीर तो अजर-अमर है. चाहे कितना भी कुकर्म करे, उसकी ‘मिट्टी’ तो तिरंगे से लिपटेगी ही.

श्मशान से घर लौटने पर सबसे पहले हमारा स्वागत फ्रेम में मढ़े हुए उस प्रशस्तिपत्र ने किया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था-’मैं भारत का राष्ट्रपति केआर नारायणन आपकी विशिष्ट सेवा को मान्यता देते हुए आपको राष्ट्रपति का विशिष्ट सेवा मेडल प्रदान करता हूं.’ यह जिन्हें दिया गया था, वे आसूचना ब्यूरो के उपनिदेशक विष्णुकांत झा कभी अखबार की सुर्खियों में नहीं आये, क्योंकि उनका काम ही सूचनाओं के साथ-साथ खुद को गुप्त रखना था. आज भी मैं उनका नाम उजागर करने का साहस इसलिए करता हूं कि वे मुङो टोकनेवाले नहीं हैं. वैसे भी वे मेरे हर भले-बुरे काम को बड़े करीने से अनदेखा कर जाते थे.

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