मंत्री का प्रलाप!

Updated at : 17 Nov 2015 5:40 AM (IST)
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मंत्री का प्रलाप!

लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं विचारों की स्वतंत्रता को व्यक्ति के बुनियादी अधिकार के रूप में स्वीकार करती हैं. वैचारिक असहमति की मौजूदगी और गुंजाइश से पता चलता है कि कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी जीवंत है. लेकिन, देश में जिम्मेवार पदों पर बैठे कुछ लोगों में सहिष्णुता इस हद तक कम हो गयी है कि असहमतियों का तर्कसंगत […]

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लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं विचारों की स्वतंत्रता को व्यक्ति के बुनियादी अधिकार के रूप में स्वीकार करती हैं. वैचारिक असहमति की मौजूदगी और गुंजाइश से पता चलता है कि कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी जीवंत है. लेकिन, देश में जिम्मेवार पदों पर बैठे कुछ लोगों में सहिष्णुता इस हद तक कम हो गयी है कि असहमतियों का तर्कसंगत जवाब देने की बजाय वे कहनेवाले व्यक्ति या संस्था की मंशा एवं ईमानदारी पर ही सवाल उठा रहे हैं.

इसी कड़ी में अब केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने तो यहां तक दावा किया है कि ‘भारत में असहिष्णुता पर बहस उन लोगों ने छेड़ी है, जिन्हें इस काम के लिए पैसे दिये दिये गये.’ लॉस एंजेल्स में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘असहिष्णुता पर बहस बेमानी है. यह बहुत सारा पैसा लेकर काल्पनिक दिमाग द्वारा खड़ा किया गया मुद्दा है.’ ध्यान रहे कि असहमतियों के स्वर को निशाना बनाने की प्रवृत्ति पर हमारे राष्ट्रपति तक चिंता जता चुके हैं और प्रधानमंत्री खुद महामहिम की बातों पर ध्यान देने की अपील कर चुके हैं. इतना ही नहीं, कोई केंद्रीय मंत्री देश से बाहर पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है, पर वीके सिंह ने यह ध्यान रखना भी जरूरी नहीं समझा कि कब, कहां और कैसे बयानों से देश की प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है. ऐसी ही गलती एक दिन पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान में भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करके की थी.

वीके सिंह ने यह कह कर भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये कि ‘मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता कि भारतीय मीडिया कैसे काम करता है.’ हकीकत यह है कि भारत की गिनती दुनिया के उन कुछेक देशों में होती है जहां मीडिया को काम करने की पर्याप्त आजादी है. बीते कुछ वर्षों से साहित्यकारों सहित विभिन्न समूहों के खिलाफ विवादित बयान दे रहे वीके सिंह पहले भी भारतीय मीडिया पर ‘हथियार लॉबी की शह पर काम करने’ का आरोप लगा चुके हैं.

होना तो यह चाहिए कि यदि उन्हें ऐसा लगता है, या मंत्री होने के नाते उनके पास ऐसी कोई जानकारी है कि कुछ लोग या समूह पैसे लेकर देश की छवि खराब कर रहे हैं, तो वे इसकी जांच कराते और पुख्ता सबूत देश के सामने रखते. मंत्री होने के नाते यह उनकी संवैधानिक जिम्मेवारी भी है कि किसी और के इशारे पर देशहित के खिलाफ काम कर रहे लोगों एवं समूहों को बेनकाब करें. लेकिन माफ करें, असहमतियों के शोर को उचित तर्क से शांत करने की बजाय ऐसे लोगों या समूहों को बिना किसी सबूत के बेईमान कहना बताता है कि आपकी आस्था न तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में है और न ही अभिव्यक्ति की आजादी में.

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