नीति-नियम और तर्कसंगत से परे

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।।रविभूषण।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

जीवंत समाज और लोकतंत्र की एक खासियत हर बड़े-छोटे सवालों से टकराने की है. अकसर हम ऐसे सवालों की अनदेखी करते हैं, जो हमें रास नहीं आते. नीति-नियमों का अनुपालन न करने और तर्क को किनारे रख कर काम करने के निजी लाभ हो सकते हैं, पर इससे होनेवाली बड़ी क्षतियों का हम अनुमान नहीं कर पाते हैं. कोयला ब्लॉक आबंटन का मामला कुछ समय से सुर्खियों में है. अभी सुप्रीम कोर्ट ने राडिया टेप में ‘गहरी साजिश’ देखी है, आनेवाले दिनों में कई नये और बड़े खुलासे होंगे. फिलहाल कोयला ब्लॉक आबंटन में सीबीआइ ने पूर्व कोयला सचिव प्रकाश चंद्र पारेख और आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला पर प्राथमिकी सूचना रिपोर्ट दर्ज की है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह 63 वर्षीय पीसी पारेख की भी छवि स्वच्छ और निष्कलंक रही है. आठ वर्ष पहले दिसंबर 2005 में सेवानिवृत्त हुए पारेख आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में रहते हैं. वे दो एनजीओ से जुड़े हैं और भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति के संरक्षक हैं. पारेख मार्च, 2004 से दिसंबर 2005 तक कोयला सचिव थे. कोयला मंत्रलय के सचिव बनने के तुरंत बाद पारेख ने कोयला ब्लॉक आबंटन में नीलामी की प्रक्रिया अपनाने का प्रस्ताव दिया था. उनके द्वारा दिये गये कैबिनेट नोट पर विचार नहीं किया गया. मनचाहे ढंग से कोयला ब्लॉक आबंटन में कोई नियम-कायदा नहीं था. ‘पहले आओ-पहले पाओ’ का ही ‘नियम’ था. खुली नीलामी की बात पारेख ने ही की थी, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों ने नहीं स्वीकारा.

10 जनवरी, 2005 को कोयला ब्लॉक आबंटन के लिए कोयला मंत्रलय की स्क्रीनिंग समिति की 25वीं बैठक हुई थी, जिसकी अध्यक्षता कोयला सचिव पारेख ने की थी. उस समय कोयला मंत्रलय का प्रभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था. इस जांच समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र को कोल ब्लॉक आबंटन की संस्तुति की थी. ओड़िशा के झारसुगड़ा जिला में तालाबीरा-2 और तालाबीरा-3 कोयला ब्लॉक नियमानुसार-निर्णयानुसार सार्वजनिक क्षेत्र को आबंटित किये जाने थे. ये सार्वजनिक क्षेत्र नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन और महानदी कोलफील्ड्स थे. कमेटी की सिफारिश इन दो कंपनियों के पक्ष में थी. सिफारिश मानना आवश्यक नहीं है, पर मुख्य प्रश्न समिति की सिफारिश और व्यक्ति-विशेष (मुख्यमंत्री, उद्योगपति, सांसद आदि) की सिफारिश का है. व्यक्ति-विशेष की सिफारिश की तुलना में समिति-विशेष की सिफारिश का अधिक महत्व है. 17 अगस्त, 2005 को ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘राज्यहित’ में पत्र लिखा, जो सिफारिशी था. यहां प्रश्न निजी क्षेत्र बनाम सार्वजनिक क्षेत्र का भी है. क्या यह स्वीकारना चाहिए कि ‘राज्यहित’ की चिंता अब केवल उद्योगपतियों को है और निजी क्षेत्र की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र गौण है?

सीबीआइ का पारेख पर मुख्य आरोप यह है कि उन्होंने 25वीं स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश रद की. कमेटी की सिफारिश सरकारी कंपनियों के पक्ष में थी. कमेटी की सिफारिश मानना-स्वीकारना अनिवार्य नहीं है, पर कमेटी की सिफारिशों को न मान कर पारेख ने निजी क्षेत्र को कोल ब्लॉक आबंटित क्यों किया? कोयला खदानों की प्रस्तावित नीति किन कारणों से उलट दी गयी-यह एक मुख्य सवाल है. तालबीरा-2 की खदान का आबंटन पहले आदित्य बिड़ला ग्रुप को रद किया गया था. फिर किन कारणों से पारेख ने ‘यू टर्न’ लिया? सीबीआइ के अनुसार हिंडाल्को को यह खदान अवैध ढंग से आबंटित की गयी है. नाल्को ने भी तालबीरा-2 के लिए आवेदन दिया था, जो रद हुआ. 10 नवंबर, 2005 को तालबीरा-2 एनएलसी (नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन) को आबंटित हुई थी, पर कुमार मंगलम बिड़ला की कोल सचिव पारेख से हुई भेंट के बाद तालबीरा-2 कोयला ब्लॉक का आबंटन आदित्य बिड़ला ग्रुप को दिया गया. एक समय कंपनी का आवेदन खारिज करने और बाद में उसे ही कोल ब्लॉक आबंटित किये जाने के पीछे की सच्चइयां अभी परदे में छिपी हुई हैं. सामने केवल अटकलें और अनुमान हैं.

हिंडाल्को विश्व के सबसे बड़े अल्यूमिनियम उत्पादकों में है. सीबीआइ द्वारा आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख पर, कोयला खदान आबंटन के सिलसिले में दर्ज 14वीं एफआइआर इस कारण महत्वपूर्ण है कि इसकी लपेट में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आ सकते हैं. पारेख के अनुसार कोल ब्लॉक आबंटन में प्रधानमंत्री को भी आरोपी बनाया जाना चाहिए, क्योंकि उस समय वे कोयला मंत्री थे और आबंटन पर उनके हस्ताक्षर हैं. पारेख के तर्क सही हैं. अगर आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख पर आपराधिक और भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिकी दर्ज हो सकती है, तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर क्यों नहीं? नीति-नियम और तर्क बड़े से बड़े पद के लिए भी एक होते हैं, एक होने चाहिए. कोयला ब्लॉक आबंटन के समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और आबंटन उनके हस्ताक्षर से ही हुआ था. पारेख ने प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय द्वारा किसी भी प्रकार के दबाव की बात नहीं की है. उन्होंने सांसदों द्वारा की गयी पैरवी की बात कही है. मुसीबतें तब बढ़ती हैं, जब हम नीति-नियमों, कायदे-कानूनों को ताक पर रख कर निजी और स्वार्थ-संबंधों को महत्व देते हैं. भारतीय लोकतंत्र की रुग्णता का यह एक प्रमुख कारण है. प्रधानमंत्री की तरह उनका कार्यालय भी साफ-सुथरा है, इसे शायद ही स्वीकारा जाये. पारेख का यह तर्क सही है कि अगर कुमार मंगलम और वे साजिशकर्ता हो सकते हैं, तो अंतिम निर्णय लेनेवाला व्यक्ति साजिशकर्ता क्यों नहीं?

प्रश्न तर्क का है, जिस पर हम ध्यान नहीं देते. क्या उद्योगपतियों को उनके निवेशकर्ता होने के कारण नीति-नियमों का उल्लंघन करने दिया जाये? कॉरपोरेट मंत्री सचिन पायलट और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा की चिंता उद्योगपति हैं. पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली की चिंता यह है कि भारत कहीं रूस न बन जाये, जहां अरबपति सलाखों के भीतर हैं. उद्योगपति, उद्योगपति के साथ होंगे, नौकरशाह भी नौकरशाह के साथ होंगे. पूर्व कोयला सचिव इएएस शर्मा, पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम, पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन विट्ठल पारेख के साथ हैं. प्रश्न व्यक्तिगत ईमानदारी का नहीं है. प्रश्न है नीति-नियमों के पालन और तर्क -प्रतिष्ठा का. सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री फैसले के लिए किस तर्क से जिम्मेदार नहीं हैं? क्या वे स्वयं तर्क का सम्मान करेंगे?

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