राजनीति नहीं, जमूरों का जमावड़ा

Published at :07 Aug 2015 11:57 PM (IST)
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राजनीति नहीं, जमूरों का जमावड़ा

चंचल सामाजिक कार्यकर्ता ए भाई! ये बिहार कहां है? लखन कहार का सवाल चौराहे की संसद को सन्नाटे में ला दिया. नवल उपाधिया की आंखें गोल हो गयीं- पटना सुने हो? उसे ही बिहार कहते हैं. लखन मुस्कुराये- तो चुनाव पटना में हो रहा है, बाकी आरा, मुंगेर, भागलपुर, मोतिहारी और औराही, हिंगना में नहीं? […]

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चंचल
सामाजिक कार्यकर्ता
ए भाई! ये बिहार कहां है? लखन कहार का सवाल चौराहे की संसद को सन्नाटे में ला दिया. नवल उपाधिया की आंखें गोल हो गयीं- पटना सुने हो? उसे ही बिहार कहते हैं. लखन मुस्कुराये- तो चुनाव पटना में हो रहा है, बाकी आरा, मुंगेर, भागलपुर, मोतिहारी और औराही, हिंगना में नहीं? नवल गच्चा खा गये.
गो कि नवल और लखन कलम एक से लेकर आठ तक एके साथ पढ़े रहे, बस इतना फरक आवा है कि लखन हर रोज अखबार बांचता है और नवल साइकिल उठाये गांव-गिरांव की खबर उठाते हैं और चौराहे पर लाकर कुरय देते हैं.
जनता दिन भर उसे धान की तरह कूटती-पछोरती रहती है. नवल बोले- तो एक बात बताओ लखन भाई! जब बिहार जानते रहे तो फिर काहे पूछे? लखन ने गौर से नवल को देखा और बोले- अखबार बताता है, हम नहीं कहते, पिछले कुछ दिनों से देश का इतिहास-भूगोल बदला जा रहा है. पिछली दफा कीन उपाधिया के नेता ने बिहार में तक्षशिला को ला दिया था. बोरिंग कैनाल रोड की खुदाई हो तो तक्षशिला साक्षात मिलेगी. मद्दू पत्रकार से नहीं रहा गया- इन्हें इतिहास और भूगोल दोनों ही बहुत सालता है.
जब भी इन्हें उछल-कूद करनी पड़ती है, तो उधर की तरफ भागते हैं. इन्होंने एक नयी परंपरा डाली है- प्रायोजित कार्यक्रम की. इसे ऐसे समझो. चुनाव लड़ने के लिए पहले सभा-जुलूस निकालना पड़ता है, कार्यकर्ताओं को लगना पड़ता था भीड़ जुटाने और पोस्टर-पर्चा बांटने के लिए, अब ऐसा कुछ नहीं है. अब देश-विदेश में नयी-नयी कंपनियां खुल गयी हैं, जो पैसा लेकर सारा काम कर देती हैं.
लाउस्पीकर, रोशनी, अखबार, डिब्बा, भीड़ सब. भीड़ का चरित्र कैसा हो, कितनी बुर्के वाली औरतें होनी चाहिए, कितने तहमत, कितनी टोपियां वगैरह सब का इंतजाम कंपनी करती है. यहां तक कि क्या बोलना है और किस जगह ताली बजाना है, सब प्रायोजित. इसे कहते हैं गुजरात मॉडल. सुना है यही मॉडल अब कई और लोग भी ला रहे हैं बिहार में..
इससे का होगा? कयूम ने सवाल पूछा.. इससे यह होगा कि एक बार फिर जनता झांसे में फंसेगी. कहते हुए मद्दू ने चिखुरी की ओर निहारा और फिर अपनी बात से मुकर गये- लेकिन बिहार में यह नहीं चल पायेगा. यह बिहार है, इसने बहुत कुछ देखा है बहुत कुछ दिखाया भी है.
अब चिखुरी की बारी थी- झूठ फरेब, छल प्रपंच एक ही बार चलता है. अब तो पूरा देश ही समझ गया है. जिन बातों को जोर देकर जनता को उकसाया और उसे मोह में फंसाया, उसी से पलटी मार रहा है.
कोई कहता है जुमला था, कोइ सफाई देता है हमने तो चुनाव में बोला था, सरकार में आने के बाद तो नहीं बोला! अब देखो संख्या की ताकत और सत्ता की ताकत. किसान की जमीन लेने के सवाल पर सरकार को झुकना पड़ा है. सांसदों को संसद से बाहर निकाल कर सरकार ने लोकतंत्र के पेट में चाकू भोंका है. इसका जवाब तो जनता मांगेगी न?
ईतो हम भूले ही गये थे कि कांग्रेस ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया रहा कि उसे संसद से बाहर निकाल दिया गया? और तो और ऐसे सांसद को भी बाहर निकाला गया, जो सदन में मौजूद भी नहीं था. इस बात को भाजपा नेता भी कह रहे हैं.
चिखुरी संजीदा हो गये- इस सरकार से सवाल मत पूछो. मध्य प्रदेश में व्यापमं घपला हुआ कई लाख करोड़ का. उसे छिपाने के लिए अब तक तकरीबन पचास लोग मारे जा चुके हैं.
भारत का वित्त मंत्रलय एक अपराधी को पकड़ने लिए वारंट जारी करता है, उसी सरकार का विदेश मंत्रलय उसे बचाता है. राजस्थान सरकार उस भगौड़े से लंबी रकम लेकर अपने निजी उद्योग में लगाती है. छत्तीसगढ़ सरकार गरीबों का चावल खा जाती है. यही सब तो पूछा था कांग्रेस ने, उसको निकाल कर बाहर कर दिया.
अब जब बिहार यह सवाल पूछेगा, तो कौन किसको निकालेगा यह देखना है.. जे बात है! लाल्साहेब ने अब समझा- लेकिन लखन ने क्यों पूछा बिहार कहां है? लाल्साहेब मद्दू पत्रकार की तरफ मुखातिब हुए. मद्दू ने बताया- यह सवाल उठाने का एक चोख तरीका है. एक किस्सा सुनो.
कभी-कभी भरी भीड़ में स्वर्गीय राज नारायण जी सवाल उठा दिये करते थे. उस परंपरा पर लालू यादव अकसर चल देते हैं. 1977 में देश की सरकार पलट गयी थी. कई हस्तियां कांग्रेस से निकल कर जनता पार्टी में शामिल हुई थीं.
उनमें से एक थे इंद्र कुमार गुजराल. जंतर मंतर में जनता पार्टी की बैठक चल रही थी. राज नारायण जी थोड़ा देर से पहुंचे. उस वक्त गुजराल साब कुछ बोल रहे थे. नारायण जी अंदर घुसते ही व्यवस्था का सवाल उठा दिये. चंद्रशेखर जी अध्यक्ष रहे.
नारायण जी उनसे मुखातिब हुए- ‘अध्यक्ष जी! ये कौन साहब बोल रहे हैं? पूरे हाल में सन्नाटा. गुजराल बैठ गये. अध्यक्ष जी समझ गये कि इस सवाल का अंदरूनी हिस्सा क्या है. मधु लिमये जी बोले- कोई नहीं बोल रहा है, अब आप बोलिए.. क्या समझे? नवल ने कहा- जी! बहुत समङो..
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