जाति-आधारित जनगणना का सच
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :06 Aug 2015 11:44 PM (IST)
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उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार जुलाई के पहले सप्ताह में ‘सामाजिक, आर्थिक, जातिगत जनगणना’ (एसइसीसी) के कुछ चुनिंदा आर्थिक आंकड़े जारी किये गये. दिलचस्प बात कि इसमें जातियों की संख्या के आंकड़े नहीं थे. कुछ ही दिनों बाद देश के विभिन्न इलाकों में जाति-आधारित जनगणना के सारे आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग उठने लगी. पिछड़े वर्ग से […]
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उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
जुलाई के पहले सप्ताह में ‘सामाजिक, आर्थिक, जातिगत जनगणना’ (एसइसीसी) के कुछ चुनिंदा आर्थिक आंकड़े जारी किये गये. दिलचस्प बात कि इसमें जातियों की संख्या के आंकड़े नहीं थे.
कुछ ही दिनों बाद देश के विभिन्न इलाकों में जाति-आधारित जनगणना के सारे आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग उठने लगी. पिछड़े वर्ग से संबद्ध नेताओं और कई क्षेत्रीय दलों ने इस मांग को ज्यादा पुरजोर ढंग से उठाया. इनमें ज्यादातर नेताओं को लगा कि फरवरी, 2011 की राष्ट्रीय जनगणना में जाति-संबंधी गिनती भी पूरी हो चुकी है और सरकार जान-बूझ कर जातियों के आंकड़े को दबाये बैठी है.
नेताओं को यह भी लगा कि मंडल आयोग ने अब से 35 साल पहले भारत में पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के पूरी आबादी में 52 फीसदी होने का जो अनुमान लगाया था, वह आज और बढ़ गया होगा. अगर जाति-आधारित जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो जायें तो केंद्र और राज्यों की सरकारों पर पिछड़ी जातियों के लिए ज्यादा सहूलियतों का दबाव बनाया जा सकता है. जातियों की संख्या के बारे में इन नेताओं के अनुमान को मैं निराधार नहीं कह रहा हूं. पर असल सवाल है, जाति-आधारित सामाजिक-आर्थिक जनगणना के मुकम्मल आकड़े कहां हैं? कथित जाति-जनगणना की असलियत क्या है?
2008 से 2010 के बीच जातिगत जनगणना के बारे में देश में काफी चर्चा हुई थी. संसद और उसके बाहर देश में व्यापक सहमति थी कि इस बार जाति-आधारित जनगणना करायी जानी चाहिए.
जाति-आधारित जनगणना अब तक सिर्फ 1931 में हुई थी. सरकारी-गैरसरकारी दस्तावेजों या बहसों में जातियों की संख्या आदि को लेकर जब कभी कोई बात होती है, 1931 की जनगणना के आधार पर ही अनुमानित आंकड़े परोसे जाते हैं. 2008-09 के दौरान जब 2011 की भारतीय जनगणना की शासकीय तैयारी चल रही थी, यूपीए सरकार और तत्कालीन मुख्य विपक्षी पार्टी-भाजपा के कुछ बड़े नेता जातिगत जनगणना के पक्ष में नहीं थे. लेकिन संसद में बहुमत जातिगत जनगणना के पक्ष में था. दबाव में आकर सरकार ने मान लिया कि इस पर विचार किया जायेगा. लेकिन 2011 की जनगणना जाति के आधार पर नहीं हुई.
इस प्रकार की जनगणना सही ढंग से करानी होती, तो शासन ने राष्ट्रीय जनगणना-2011 के साथ ही जातियों की संख्या जानने का एजेंडा भी पूरा कर लिया होता. जनगणना के परिपत्र में बस एक और नया प्रकोष्ठ ही तो लगाना था. पर ओबीसी जातियों की वास्तविक संख्या जानने के लिए कोई नया प्रकोष्ठ नहीं जोड़ा गया. इसकी पुष्टि 2011 की जनगणना के गणना-परिपत्र या फार्म को देखने से भी होती है.
इससे यह साफ है कि भारत के जनगणना आयुक्त एवं रजिस्ट्रार-जनरल की देखरेख में हुई राष्ट्रीय जनगणना-2011 के दौरान जाति-गणना नहीं की गयी.
उक्त जनगणना के हो जाने के कुछ समय बाद सरकार ने सहयोगी दलों और कुछ विपक्षी दलों के दबाव में आकर सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के नाम पर एक और ‘सरकारी कर्मकांड’ शुरू कराया.
ध्यान रखने की बात है कि यह गणना जनगणना अधिनियम के तहत नहीं हुई, लेकिन इस पर राष्ट्रीय जनगणना से भी ज्यादा धनराशि खर्च हुई. इसका नामकरण किया गया- ‘सामाजिक, आर्थिक, जाति जनगणना’ (एसइसीसी). यह राष्ट्रीय जनगणना आयुक्त एवं रजिस्ट्रार जनरल की देखरेख में न होकर, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय (एमआरडी) के नेतृत्व में कराने का फैसला हुआ. कुछ अन्य सरकारी एजेंसियों को भी इसमें लगाया गया.
राज्य सरकारों को भी शामिल करने की कोशिश हुई. लेकिन जनगणना जैसे काम में किसी तरह का अनुभव न रखनेवाले गैर-पेशेवर निकायों की देखरेख में भला जाति-आधारित सामाजिक, आर्थिक सर्वेक्षण सुसंगत और व्यवस्थित ढंग से कैसे होता! बताते हैं कि यह कथित जाति-आधारित जनगणना या सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण जून-2011 में शुरू हुआ. इसे दिसंबर, 2011 में पूरा हो जाना था. लेकिन सारी कार्रवाई 2013 में पूरी हुई बताते हैं.
सवाल है, तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस ‘जाति-आधारित सामाजिक आर्थिक जनगणना’ के आंकड़ों को क्यों नहीं जारी किया? मौजूदा एनडीए सरकार ने भी अब तक जाति के आंकड़े क्यों नहीं पेश किये? सरकार का कहना है कि उसमें हजारों त्रुटियां हैं. आखिर ये कैसी त्रुटियां हैं, जो बीते डेढ़-दो सालों के दौरान दुरुस्त नहीं की जा सकीं?
सच यह है कि इस कथित जनगणना के दौरान असंख्य लोगों से उनकी जाति नहीं पूछी गयी. स्वयं मैं अपने इलाके का उदाहरण दे सकता हूं. कुछ लोग कहते हैं कि सर्वेक्षण करनेवाले आये थे और सामाजिक-आर्थिक हैसियत पर कुछेक सवाल पूछ कर चले गये. कइयों के मुताबिक, उक्त सर्वेक्षण में जाति नहीं पूछी गयी. कुछ कहते हैं, पूछी गयी. तो फिर क्या ‘सलेक्टिव सैंपल-सर्वे’ हो रहा था? फिर आप उसे जातिगत जनगणना कैसे कह सकते हैं? दरअसल, इसे गैर-पेशेवर ढंग से कराया गया एक आधा-अधूरा सर्वेक्षण कहा जा सकता है.
बड़ा सवाल है, जिस जनगणना आयुक्त एवं रजिस्ट्रार-जनरल कार्यालय के पास इस काम की विशेषज्ञता है, उसे यह कार्यभार क्यों नहीं सौंपा गया? यह जिम्मेवारी उसे क्यों सौंपी गयी, जिसके पास जनगणना जैसे काम का कोई अनुभव नहीं था? ऐसे में इस कथित सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना की वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता क्या है?
ऐसा लग रहा है कि कथित जाति-आधारित जनगणना को लेकर देश में बहुत शोर मचेगा, तो शासन की तरफ से जाति-गणना के अंदाजिया ढंग से टेबल पर तैयार कुछ आधे-अधूरे आंकड़े पेश किये जा सकते हैं.
यह महज संयोग नहीं कि पिछड़े वर्ग के कुछ नेताओं और क्षेत्रीय दलों को पिछले दिनों शासन की तरफ से आश्वासन भी दे दिया गया कि निकट भविष्य में जाति-आधारित जनगणना के आंकड़े जुटा कर उन्हें प्रकाशित किया जायेगा. बताया गया कि उक्त आंकड़ों में बहुत सारी त्रुटियां पायी गयी हैं, इसलिए उन्हें दुरुस्त किया जा रहा है.
इसके लिए नवगठित नीति-आयोग के कुछ विशेषज्ञों को लेकर एक कमेटी बनायी गयी है. ऐसा लगता है कि जाति-आधारित जनगणना के आंकड़े ‘अमेरिका-प्रशिक्षित योग्य विशेषज्ञों’ की टेबलों पर तैयार किये जा रहे हैं.
हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल रहे हैं कि इस सर्वेक्षण के सारे आंकड़े और तथ्य गलत ही होंगे. पर वे सारे सही होंगे, इसकी गारंटी कैसे की जा सकती है? दिलचस्प है कि इस कथित जनगणना के सारे आंकड़े जनगणना कार्यालय नहीं, सरकार के मंत्री या अफसर जारी कर रहे हैं. फिर भी अनेकों लोग जातियों के आकड़े जानने को बेताब हैं!
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