घूसखोरी कब तक?
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Jul 2015 1:24 AM (IST)
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अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेजों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि एक अमेरिकी कंपनी ने गोवा और गुवाहाटी में परियोजनाओं के ठेके मिलने के एवज में भारतीय अधिकारियों को रिश्वत दी थी. घूस लेनेवालों में एक मंत्री का नाम भी है. भ्रष्टाचार हमारे देश के सार्वजनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुका […]
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अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेजों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि एक अमेरिकी कंपनी ने गोवा और गुवाहाटी में परियोजनाओं के ठेके मिलने के एवज में भारतीय अधिकारियों को रिश्वत दी थी. घूस लेनेवालों में एक मंत्री का नाम भी है.
भ्रष्टाचार हमारे देश के सार्वजनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. विदेशी कंपनियों से नेताओं और अधिकारियों द्वारा अवैध और अनैतिक रूप से धन उगाही के अनेक मामले पहले भी सामने आ चुके हैं.
इटली की कंपनी आगस्टा-वेस्टलैंड से हेलीकॉप्टरों की खरीद में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व वायुसेनाध्यक्ष पर घूस लेने के आरोपों की जांच चल रही है. वर्ष 2011 में सरकारी कंपनी भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड के शीर्ष अधिकारियों द्वारा घूस और दलाली लेकर लंदन के एक बिचौलिये से टाट्रा ट्रक के पूर्जे मंहगे दामों पर खरीदने का घोटाला प्रकाश में आया था. थेल्स से पनडुब्बी खरीद में रिश्वत लेने के मामले की भी जांच चल रही है.
1990 के दशक में महाराष्ट्र में बहुराष्ट्रीय कंपनी एनरॉन के बिजली संयत्र स्थापित करने की योजना में भी बड़े पैमाने पर घूस के लेन-देन का पर्दाफाश हुआ था. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रियों के साथ कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम भी शामिल थे. कई तरह के विवादों के कारण जब सरकार ने 2001 में इस कंपनी के साथ करार तोड़ा, तो एनरॉन हर्जाने के रूप में बड़ी रकम भी वसूलने में कामयाब रहा. वर्ष 2012 में वालमार्ट कंपनी की भारतीय इकाई द्वारा रिश्वत देने का मामला भी इसी कड़ी में है.
ये सारे प्रकरण बोफोर्स घोटाले के बाद के हैं. ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 175 देशों की वैश्विक भ्रष्टाचार सूची में भारत 85वें स्थान पर है. विदेशी कंपनियों से घूस खाने के मामलों के अलावा देश के भीतर हर स्तर पर व्याप्त रिश्वतखोरी और छोटे-बड़े घोटालों के अनेक मामले देश के विकास में खतरनाक अवरोध हैं. इनसे विदेशी निवेश और कारोबार पर नकारात्मक असर के साथ उनके लाभ भी अपेक्षा से कम होते हैं.
अब जब आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर सृजित करने के उद्देश्य से सरकार ‘मेक इन इंडिया’ जैसे महत्वाकांक्षी पहल से अंतरराष्ट्रीय पूंजी और उद्योग को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है, उसे भ्रष्टाचार पर कठोर नियंत्रण के लिए आवश्यक कदम उठाना होगा. कानूनों के समुचित पालन और निगरानी तंत्र को कारगर बना कर ही व्यापार और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण हो सकता है.
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