हमारा ‘मन’ और ‘मन की बात’

Published at :20 Jul 2015 12:34 AM (IST)
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हमारा ‘मन’ और ‘मन की बात’

सामानों के असंख्य विज्ञापन हमारे मानस को निष्क्रिय कर हमारे चित्त को प्रभावित करते हैं. मार्केट इकोनॉमी ने ‘मार्केट कल्चर’ को जन्म दिया है. मन का दास होकर हम संकट-मुक्त नहीं हो सकते और न ‘मन की बात’ सुन कर विवेकवान हो सकते हैं. पिछले कुछ समय से, लगभग ढाई दशक से, नयी वैश्विक पूंजीवादी […]

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सामानों के असंख्य विज्ञापन हमारे मानस को निष्क्रिय कर हमारे चित्त को प्रभावित करते हैं. मार्केट इकोनॉमी ने ‘मार्केट कल्चर’ को जन्म दिया है. मन का दास होकर हम संकट-मुक्त नहीं हो सकते और न ‘मन की बात’ सुन कर विवेकवान हो सकते हैं.

पिछले कुछ समय से, लगभग ढाई दशक से, नयी वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से भारत के जुड़ने के बाद ‘शिक्षित-सुशिक्षित’ संपन्न परिवारों में बच्चों, युवाओं और अधेड़ों के यहां जिस एक शब्द का प्रयोग हमारा ध्यान आकर्षित करता है, वह है ‘मन.’ ‘मन’ शब्द का प्रयोग दैनिक जीवन में, पारिवारिक सदस्यों के बीच पहले इतना प्रमुख नहीं था. किसी भी शब्द विशेष का प्रयोग-बाहुल्य अकारण नहीं होता. इस शब्द विशेष, अंतरिन्द्रिय (मन) का प्रयोग जिस तरह किया जा रहा है, वह हमें बदली हुई सामाजार्थिकी पर भी सोचने को बाध्य करता है. सामान्य घरेलू, पारिवारिक और आत्मीय बातचीत तक में धड़ल्ले से प्रयुक्त होनेवाला यह शब्द बुद्धि-विवेक पर कैसे हावी हो गया? अस्थिर चित्त, चंचल मन को अस्थिर-चंचल पूंजी से जोड़ कर देखना क्या गलत है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी मनमौजी पूंजी के दौर में ‘मन की बात’ कर रहे हैं. बड़े-बुजुर्गो यह समझ नहीं आ रहा कि किन वजहों से हमारी संतानें, प्रिय-प्रियतर व्यक्ति भी आज मन से जितना चालित -संचालित है, उतना बुद्धि-विवेक से नहीं. क्या यह समय बुद्धि-विवेक के ह्रास और मन के विकास का है? यह अचानक हुआ या इसके कुछ ठोस कारण हैं?
भारत न ‘आधुनिक’ बना, न ‘उत्तर आधुनिक.’ वह एक अंधी सुरंग में फंस चुका है. कांट के यहां ‘तर्क’ सब कुछ था. ‘क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन’ में ‘आधुनिकता’ तर्क का आधार है. कांट के लिए ‘आधुनिकता’ ‘एक आलोचनात्मक प्रवृत्ति’ थी. स्वतंत्र भारत के उत्तर नेहरू -युग में यह आलोचनात्मक प्रवृत्ति कमतर होती गयी. आज रचनाकारों-आलोचकों को भी आलोचना बरदाश्त नहीं होती. आज की वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अमित भादुड़ी ‘एक अतार्किक व्यवस्था’ के रूप में देखते हैं.
अठारहवीं सदी में यूरोप ने जिन मूल्यों-विज्ञान, धर्मनिरपेक्षता, समता, बंधुत्व आदि का निर्माण किया था, वे दो सदियों के बाद लगभग बिखर गये. इसे बिखेरने का काम पूंजी और प्रोद्योगिकी के सहमेल से हुआ- मुख्यत: द्वितीय विश्ययुद्ध के बाद. होर्खेमर, एडोर्नो, जुरगेन हेबरमास जैसे विश्वविख्यात बौद्धिकों-विचारकों से सुपरिचित भारतीय बौद्धिकों-विचारकों का ध्यान इस ओर कम जाता है कि भारत ‘आधुनिक’ हुए बगैर किन स्थितियों में कैसे एक नयी पूंजीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था की चपेट में आ गया, जिसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणाम हमें कम दिखाई देते हैं.
पूंजी और टेक्नोलॉजी जब अपने सहमेल से समाज को प्रभावित करने लगती है, तब हमारा ‘मन’ प्रमुख होने लगता है. मनमौजी पूंजी हमारे मन को फुलाती है. पूंजी और टेक्नोलॉजी के सहमेल से जो बाजार निर्मित-विकसित होता है, जिस उपभोक्तावाद का जन्म होता है, वह हमारे पारस्परिक संवादों-बहसों के साथ हमारे तर्को-विचारों को अभिव्यक्त करने का कोई ‘स्पेस’ नहीं देता.
टेलीविजन की खूबी-खराबी यह है कि उसने हमें छवियों और वस्तुओं के संसार मं फेंक दिया. उससे जोड़ दिया. उसने हमारे भीतर एक तरह का नशा और उन्माद पैदा कर दिया. हम उन्मादी पूंजी को नशीली पूंजी भी कह सकते हैं. शेयर बाजार से जुड़े लोग इसे समझते हैं. टेलीविजन और उत्तर आधुनिकता का समय लगभग एक है- साठ का दशक. फ्रेडरिक जेमसन ने टेलीविजन को ‘उत्तर आधुनिकता’ की संस्कृति का सबसे बड़ा अस्त्र कहा है. इस टेलीविजन ने हमारे मानस को बदलने में एक बड़ी भूमिका अदा की है. इसने हमारी संतानें हमसे छीन ली है. मन को बढ़ाने और फुलाने में बाजार, मीडिया और विज्ञापन की बड़ी भूमिका है. हम अपने घर के कमरे में ही घेर लिये गये हैं. बाह्य जगत से हमारा संबंध-विच्छेद हो रहा है. मीडिया हमारे मनोजगत में प्रवेश कर चुका है. वह मनोजगत का निर्माण भी कर रहा है. मन और मनोजगत दोनों उसकी जद में आ चुके हैं.
वैश्विक पूंजी ने बाह्य संसार से हमें काट कर वस्तु-संसार में ढकेल दिया है. अब ज्ञान-संसार के स्थान पर वस्तु-संसार प्रमुख है. आधुनिकता के दौर में बुद्धि-विवेक, तर्क-बहस की प्रमुखता थी. उत्तर आधुनिक विचार-दर्शन ने इस प्रश्न खड़े कर दिये हैं. इस दौर में जो उपभोग भूल कर संस्कृति विकसित हुई है, उसे हमें सामाजिक, नागरिक होने के स्थान पर उपभोक्ता बना कर रख दिया है. बाजार हमारी आवश्यकताएं निर्धारित कर रहा है.
बाजार का मन से, इच्छा से संबंध है. ये इच्छाएं अनंत हैं. उपभोक्ता के यहां विवेक से प्रमुख ‘मन’ है. नयी आर्थिकी ने तार्किकी को क्षति पहुंचायी है. उपभोग के मानस को कुंद कर विचार का संहार किया है. अब संसद तक में बहसें कम होती है. जिस लोकवृत्ति या सार्वजनिक लीला-स्थल (पब्लिक स्फीयर) का प्रबोधन काल में ही नहीं, उसके बाद भी एक बड़ी भूमिका थी, आज घटती जा रही है. विश्वविद्यालयों में तर्क, विचार, बहस की गुंजाइश कम है. सब जगल ‘मन’ और ‘इच्छा’ प्रबल है. सुनने को तैयार कम लोग हैं और सुनाने के नाम पर ‘मन की बात’ सुनाई जा रही है.
वर्तमान भारतीय समाज में तर्क और रेशनलिटी का लगातार ह्रास हो रहा है. तर्क आधारित और तर्कसंगत बातें कम हो रही हैं. परिवार और समाज का ताना-बाना टूट रहा है. खाने का संबंध भूख से है, पर खाने के बारे में पूछने पर बच्चे और सयाने दोनों कहते हैं- ‘मन नहीं है.’ मनमौजी और फिरंट पूंजी मन को अपने अधीन कर रही है- बाजार के मार्फत. मन ‘अंत:करण की संकल्प-विकल्प करने वाली वृत्ति’ से अलग हो रहा है.
तीस के दशक में, जब मनचली पूंजी अपनी आरंभिक अवस्था में थी, छायावाद के दो प्रमुख कवियों-निराला और प्रसाद ने ‘मन चंचल न करो’ और ‘ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की/ एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की’ लिख कर हमें सावधान किया था. प्रसाद बुद्धि को भी महत्व दे रहे थे-‘रस पगी रही, पायी न बुद्धि’. बाजार हमें सोचने का अवसर नहीं देता. एक सामान के नहीं, सभी सामानों के असंख्य विज्ञापन हमारे मानस को निष्क्रिय कर हमारे चित्त को प्रभावित करते हैं. मार्केट इकोनॉमी ने ‘मार्केट कल्चर’ को जन्म दिया है. मन का दास होकर हम संकट-मुक्त नहीं हो सकते और न ‘मन की बात’ सुन कर विवेकवान हो सकते हैं.
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in
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