जल, जंगल के रक्षार्थ चले अभियान

Published at :08 Jul 2015 5:27 AM (IST)
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जल, जंगल के रक्षार्थ चले अभियान

भविष्य के परिणामों की चिंता किये बगैर ही हम प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ कर रहे हैं. प्रकृति को छेड़ कर हम अपना विकास नहीं कर रहे, बल्कि विनाश को न्योता ही दे रहे हैं. विकास के नाम पर दुनियाभर में बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाये जा रहे हैं. बिजली के निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं की शुरुआत […]

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भविष्य के परिणामों की चिंता किये बगैर ही हम प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ कर रहे हैं. प्रकृति को छेड़ कर हम अपना विकास नहीं कर रहे, बल्कि विनाश को न्योता ही दे रहे हैं.
विकास के नाम पर दुनियाभर में बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाये जा रहे हैं. बिजली के निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं की शुरुआत के लिए नदियों को बांधा जा रहा है. परमाणविक बिजली के उत्पादन के लिए विशाल भट्ठियां लगायी जा रही हैं. हम भी पेयजल और सिंचाई के लिए भूजल का दोहन करते हैं और उसके लिए नलकूपों का निर्माण कराते हैं.
भवनों, औद्योगिक इकाइयों, रेलवे लाइनों, सड़कों आदि के निर्माण के लिए वनों का उजाड़ते जा रहे हैं. इन सभी मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा नहीं हो रही है. उल्टे हम आनेवाली पीढ़ियों के दुर्दिन को आमंत्रित कर रहे हैं. अनावृष्टि और समय पर बारिश होने की वजह से फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.
वहीं, भूजल स्तर में भी लगातार गिरावट आ रही है. मानवीय कार्यो से तत्काल हमें खुद का विकास नजर तो आता है, लेकिन भविष्य अंधकारमय ही दिखायी देता है. नदियों पर बांध बनाने से एक ओर जहां उसका बहाव बाधित हो रहा है, वहीं जलजमाव वाले क्षेत्र की आबादी भी विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ रही है.
साथ ही, उस इलाके में फसलों का उत्पादन और वनस्पतियों का विकास भी रुक जाता है. समय रहते यदि भारत सहित दुनियाभर के लोग नहीं चेतते हैं, तो वह दिन दूर नहीं, जब हमें पानी, शुद्ध हवा, शुद्ध भोजन और शुद्ध पर्यावरण के लिए तरसना पड़े. इस दिशा में भारत सहित दुनिया के सभी देशों की सरकारों की ओर से युद्धस्तर पर अभियान तो चलाना ही होगा, साथ ही हम लोगों को भी सचेत होना होगा.
वशिष्ठ कुमार हेंब्रम, रांची
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