रोहंगिया समुदाय की अंतहीन त्रासदी

Published at :12 Jun 2015 5:11 AM (IST)
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रोहंगिया समुदाय की अंतहीन त्रासदी

टीना र्बेट/क्रिस्टोफर साइमंस दोनों राजनीतिक विश्लेषक हैं म्यांमार (बर्मा) के राखिन प्रांत में बौद्धों और रोहंगिया मुसलिम समुदाय के बीच हिंसा के तीन वर्षो के बाद भी इस जातीय तथा सांप्रदायिक संघर्ष का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है. संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक, म्यांमार से इस अवधि में 1.20 लाख रोहंगिया पलायन […]

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टीना र्बेट/क्रिस्टोफर साइमंस
दोनों राजनीतिक विश्लेषक हैं
म्यांमार (बर्मा) के राखिन प्रांत में बौद्धों और रोहंगिया मुसलिम समुदाय के बीच हिंसा के तीन वर्षो के बाद भी इस जातीय तथा सांप्रदायिक संघर्ष का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है.
संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक, म्यांमार से इस अवधि में 1.20 लाख रोहंगिया पलायन कर गये हैं. बांग्लादेश में 28 हजार पंजीकृत रोहंगिया शरणार्थी हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग का कहना है कि अतिरिक्त दो लाख लोग बर्मा-बांग्लादेश सीमा के गांवों में रह रहे हैं. हजारों परेशान शरणार्थी थाइलैंड, मलयेशिया और इंडोनेशिया जैसी निकटवर्ती देशों में पहुंचने के चक्कर में मानव-तस्करों के चंगुल में फंस गये हैं.
पहले थाइलैंड और उत्तरी मलयेशिया में जमीन के रास्तेतस्करी होती थी, पर जंगलों में स्थित तस्करों के शिविरों में बड़ी संख्या में दफन लाशों के मिलने के बाद इन रास्तों को सरकारों ने बंद कर दिया है.
इस कारण अब तस्कर अंतरराष्ट्रीय समुद्र में बड़े जहाजों में लोगों को रख कर उनसे और उनके रिश्तेदारों से फिरौती में मोटी रकम वसूलते हैं. खबरों के अनुसार, तस्कर छोटे बच्चों को भी चालाकी से बंधक बना लेते हैं. इन जहाजों से बचाये गये लोगों ने तस्करों द्वारा अमानवीय शोषण की अंतहीन कहानियां सुनायी हैं. हजारों लोग अभी भी इन जहाजों पर फंसे हुए हैं, क्योंकि विभिन्न देश आश्रय देने में आनाकानी कर रहे हैं.
हालांकि, 29 मई को आसियान की एक खास बैठक में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों राहत और बचाव के प्रयास करने तथा इस समस्या के बुनियादी कारणों पर विचार का आश्वासन दिया है, लेकिन बर्मा के प्रतिनिधियों ने अलगाव की अपनी नीति के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया था और इन शरणार्थियों के लिए ‘रोहंगिया’ शब्द के इस्तेमाल से भी परहेज किया था.
उनके मुताबिक ये ‘बंगाली’ विस्थापित हैं. इससे भी चिंताजनक यह है कि इस संकट से म्यांमार की सरकार को लाभ भी मिल रहा है. बर्मा मीडिया के अनुसार, सरकार विरोधी दो राखिन उग्रवादी समूहों ने बर्मा-बांग्लादेश सीमा पर सरकार के साथ मिलकर निगरानी का प्रस्ताव रखा है ताकि अवैध आप्रवासियों को सीमा से बाहर रखा जा सके.
म्यांमार की 5.6 करोड़ की आबादी में करीब आठ लाख रोहंगिया हैं और ये देश के जातीय अल्पसंख्यकों की सामाजिक श्रेणी में सबसे नीचे हैं. देश का संविधान अक्तूबर, 2014 में बनायी गयी राखिन राज्य कार्य-योजना के तहत उन्हें ‘गैर-राष्ट्रीय’ या ‘विदेशी निवासी’ मानता है.
अपने देश में रोहंगिया समुदाय के साथ हो रहे इस दुर्व्यवहार पर नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित और बर्मा की मुख्य विपक्षी नेता आंग सान सू की द्वारा मौन साधे रखने पर तिब्ब्ती धर्म गुरु तथा नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा ने अपनी नाखुशी जाहिर की है.
पिछले कुछ वर्षों में बर्मा की सैनिक सरकार द्वारा देश में किये गये राजनीतिक सुधार सराहनीय हैं. परंतु जो देश अपने अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित नहीं करता है, उसे किसी भी स्थिति में एक स्वतंत्र देश की संज्ञा नहीं दी जा सकती है.
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