कैसी हो हमारी स्थानीय नीति

Published at :25 Mar 2015 7:27 AM (IST)
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कैसी हो हमारी स्थानीय नीति

झारखंड गठन के साथ ही यहां स्थानीय नीति बनाने की मांग उठने लगी थी, पर दुर्भाग्य है कि राज्य गठन के 14 साल बाद भी झारखंड की अपनी स्थानीय नीति नहीं बन सकी. इसका खमियाजा यहां के युवा भुगत रहे हैं. स्पष्ट स्थानीय नीति के अभाव में दूसरे राज्य के लोग यहां नौकरी लेने में […]

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झारखंड गठन के साथ ही यहां स्थानीय नीति बनाने की मांग उठने लगी थी, पर दुर्भाग्य है कि राज्य गठन के 14 साल बाद भी झारखंड की अपनी स्थानीय नीति नहीं बन सकी. इसका खमियाजा यहां के युवा भुगत रहे हैं. स्पष्ट स्थानीय नीति के अभाव में दूसरे राज्य के लोग यहां नौकरी लेने में सफल होते रहे हैं.
अब राज्य की नयी सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर दिख रही है. सरकार ने विधानसभा में घोषणा की है कि दो माह के अंदर राज्य की स्थानीय नीति घोषित कर दी जायेगी. इसे देखते हुए प्रभात खबर कैसी हो हमारी स्थानीय नीति श्रृंखला चला रहा है. कैसी हो स्थानीय नीति, इस मुद्दे पर आप भी अपने विचार हमें मेल कर सकते हैं या फिर लिख कर भेज सकते हैं. हमारा पता है : सिटी डेस्क, प्रभात खबर, 15-पी, कोकर इंडस्ट्रीयल एरिया, रांची या फिर हमें मेल करें.
स्थानीय लोगों की बहाली नीति बने
वाल्टर कंडुलना
बिहार में स्थानीय व्यक्ति का आधार जिला माना गया. जिला में जिनके पूर्वजों के नाम जमीन वासगित का उल्लेख हो, उन्हें ही स्थानीय माना गया़ बिहार में मूलअधिसूचना अभी भी लागू है़ परन्तु झारखंड में इस अधिसूचना पर हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई और प्रवासी लोग स्थानीय शब्द को ‘अधिवासी’ अथवा ‘नागरिकता’ मानकर ‘अधिवासी नीति’ की चर्चा करने लग़े कोई भी राज्य सरकार अधिवास नीति नहीं बना सकती़ झारखंड सरकार की नीति सिर्फ इस पर केंद्रित है कि राज्य में नियोजन के लिए कैसे स्थानीय लोगों को चिह्रित करना है़ स्थानीय नीति के निर्धारण के लिए इन तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है कि झारखंड में हर 10 में से 5 गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताते हैं. इनमें पांच में से चारआदिवासी हैं.
झारखंड के मूल वासियों व आदिवासियों को रोजगार तथा नौकरियों में समान अवसर नहीं मिलते, क्योंकि रोजगार देनेवाले अपने लोगों को सही-गलत तरीके से नियोजित करते हैं. रोजगार के लिए सदानों व आदिवासियों का पलायन होता है, जबकि बाहरी लोगों का झारखंड में बाढ़ की तरह आगमन हुआ है़ सिर्फ संविधान में लिखित समता और समान अवसर को संवैधानिक रूप से नहीं देखना चाहिए, बल्कि जमीनी स्थिति को देखना भी जरूरी है़
(लेखक आदिवासी बुद्घिजीवी मंच, गुमला से जुड़े हैं)
मूलवासियों की पहचान को लेकर हो सव्रे
अनंत ओझा
देश की डोमिसाइल नीति एक होती है. राज्य गठन से पहले झारखंड एकीकृत बिहार का हिस्सा था. ऐसे में राज्य गठन के समय से यहां रहने वाले सभी लोग झारखंडी है. छत्तीसगढ़ समेत हर राज्य ने मूलवासियों की पहचान को लेकर सव्रे कराया गया है. झारखंड के बड़े हिस्से में अब तक सव्रे का काम नहीं हुआ है. राज्य में जमीन की प्रकृति अलग-अलग है.
यहां पर वर्षो से रहने वाले लोगों को पास अब तक अपनी जमीन नहीं हो पायी है. खास महल क्षेत्र में रहनेवाले लोगों की भी यही समस्या है. वे अब तक जमीन नहीं खरीद पाये हैं. कई गरीब लोग भी यहां वर्षो से रह रहे हैं, लेकिन उनके पास अपना भूखंड नहीं है. ऐसे लोगों की पहचान को लेकर सरकार को पहल करनी चाहिए.
इन क्षेत्रों का सव्रे करा कर मूलवासियों की पहचान की जानी चाहिए. राज्य गठन के बाद से यहां पर बांगलादेशियों की घुसपैठ बढ़ी है. इनमें से अधिकांश लोगों ने पहचान पत्र भी बना लिया है.
स्थानीयता तय करने से पहले सरकार को सव्रे करा कर मूलवासियों की पहचान करनी चाहिए, ताकि वे अपने अधिकार से वंचित नहीं रह जाये. पिछले 14 वर्षो में स्थानीय नीति बनाने को लेकर सिर्फ राजनीति हुई है. इसकी वजह से यहां के मूलवासियों को हक नहीं मिल पाया है. राज्य में स्थानीय नीति का मुद्दा संवेदनशील है.
(लेखक भाजपा विधायक हैं)
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