तो ऐसी पार्टी का सिमटना ही देशहित में!

Published at :22 Oct 2014 2:04 AM (IST)
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तो ऐसी पार्टी का सिमटना ही देशहित में!

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए अस्तित्व के संकट का सवाल सतह पर ला दिया है. यह पार्टी अपने 129 सालों के इतिहास में कभी इतनी बेचारगी से नहीं गुजरी, जितनी आज गुजर रही है. गत अप्रैल-मई में हुए आम चुनाव से पहले तक लोग […]

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महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए अस्तित्व के संकट का सवाल सतह पर ला दिया है. यह पार्टी अपने 129 सालों के इतिहास में कभी इतनी बेचारगी से नहीं गुजरी, जितनी आज गुजर रही है. गत अप्रैल-मई में हुए आम चुनाव से पहले तक लोग इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत इसके देशव्यापी होने को मानते थे, पर आज इसे लोग सिमटती हुई पार्टी के रूप में देखने लगे हैं.

हो सकता है कि बहुत से लोग यह सोचते हों कि चिंता हम क्यों करें, चिंता तो कांग्रेस के कर्ता-धर्ताओं को करनी चाहिए. लेकिन सोचिये, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में भाजपा के अखिल भारतीय स्वरूप की ओर बढ़ने की प्रक्रिया जहां लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में स्वागतयोग्य है, वहीं कांग्रेस का अखिल भारतीय स्वरूप सिमटने की प्रक्रिया लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंताजनक है और खासतौर पर तब, जबकि अखिल भारतीय पर कोई अन्य पार्टी हो ही न.

अब तक देश ने सभी प्रयोग देख लिये- एक पार्टी का ऊपर से नीचे तक शासन, मिश्रित शासन, गंठबंधन की सरकारें, ऐसी पार्टियों वाली सरकारें जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ होती हैं तो राज्य में विपक्षी दल के साथ. इन सबको देखने के बाद कल का विपक्षी दल, जो आज सत्ता में है, कहने लगा है कि देश के विकास के लिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री यानी केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री यानी राज्य सरकार एक टीम के तौर पर काम करें. यह स्थायी रूप से कब हो सकता है, तब ही न जब केंद्र और राज्य में एक ही दल या फिर साथी दलों की सरकारें हों.

इस बयान का अभिप्राय साफ है कि 1967 से पहले कमोबेश कांग्रेस की जो स्थिति थी, वही स्थिति मौजूदा सत्तारूढ़ दल चाहता है. लेकिन तब और आज की स्थिति में एक बड़ा फर्क यह आया है कि तब राजनीतिक सहिष्णुता ज्यादा थी और आज यह सिमटती जा रही है. इस फर्क को और इस फर्क की वजह से उत्पन्न हुई राजनीतिक जरूरत को कुछ क्षेत्रीय दल समझ रहे हैं और वे बड़े राज्यों में प्रभाव रखनेवाला एक साझा राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं. लेकिन क्या सिर्फ इतने भर से इस वक्त की राजनीतिक जरूरत पूरी हो सकेगी?

कांग्रेस के लिए सबसे चिंताजनक बात यह होनी चाहिए कि लोग उससे अपेक्षा रखना ही बंद करते जा रहे हैं. ऐसा हो भी क्यों न, जब कांग्रेस के नेताओं की करनी और जन जरूरतों के बीच कोई तालमेल ही न रह गया हो. कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के कैरियर को ही देखिये. इससे ज्यादा हास्यास्पद क्या होगा कि वे 19 अक्तूबर को विशाखापत्तनम में हुदहुद प्रभावित क्षेत्रों के दौरे पर थे और कह रहे थे कि प्रभावितों के मुद्दों पर कांग्रेस के सांसद पूरा दम लगा कर केंद्र पर दबाव बनाएंगे.

यहां गौरतलब है कि हुदहुद के समय आपदा प्रबंधन बहुत प्रभावी तरीके हुआ, जिससे इसके विनाशकारी प्रभाव को न्यूनतम स्तर पर रखने में मदद मिली. करीब एक साल पहले ओड़िशा में भी ऐसा ही तूफान आया था और उस समय भी आपदा प्रबंधन बहुत ही सक्षम तरीके से हुआ था. मुङो नहीं याद आता कि किसी राष्ट्रीय दल का सबसे बड़ा नेता वहां राहुल की तरह दौरे पर गया, क्योंकि कहीं कुछ इतना बड़ा गड़बड़ था ही नहीं. कांग्रेस के लोग अपने नेतृत्व पर सवाल तो नहीं ही उठा रहे, बल्कि यह साबित करने में लगे हुए हैं कि राहुल तो गलत हो ही नहीं सकते.

दूसरी तरफ भाजपा को देखिये. 2009 का चुनाव आडवाणी जी के नेतृत्व में लड़ा गया, जिसमें भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा. जब 2014 का चुनाव आनेवाला था, तब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को बदलने की प्रक्रिया शुरू हो गयी और चुनाव से काफी पहले नेतृत्व बदलाव कर लिया गया. देखा जाये तो आज से 10-15 साल पहले कोई भाजपाई यह कल्पना नहीं कर सकता था कि अटल या आडवाणी के रहते उनकी पार्टी का नेतृत्व सफलतापूर्वक किसी और के हाथ में जा सकता है. लेकिन ऐसा हुआ. ऐसा नहीं है कि भाजपा में यह बदलाव बहुत आसानी से हो गया. भाजपा में भी तमाम परोक्ष-अपरोक्ष बाधाएं और तमाम कल्पित सवाल भी सामने आये. कांग्रेस में ऐसा संभव है क्या?

कांग्रेस में आम चुनाव के काफी पहले से सब जान रहे थे कि हालत खराब है और नेतृत्व इतना सक्षम नहीं है कि वह अपने जुझारुपन, विजन और संप्रेषण क्षमता से तस्वीर बदल सके. पर बोला किसी ने नहीं. नतीजे के बाद तो और गजब रहा. कांग्रेस के बड़े नेता राहुल को क्लीनचिट देने में लग गये कि हार की जिम्मेवारी उनकी नहीं है, बल्कि सामूहिक रूप से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की है. आपने देखा है कभी ऐसी उलटबांसी, कि सेना हार जाये और सेनापति विजयी रहे. कांग्रेस में यही हो रहा है.

मुझे लगता है कि अब बहुत सारे लोगों के दिमाग में यह सवाल चल रहा होगा कि क्या अखिल भारतीय स्तर की 129 साल पुरानी पार्टी में एक भी नेता-कार्यकर्ता ऐसा नहीं, जो सच बोलने का साहस रखता हो और यदि नहीं है तो ऐसी पार्टी का सिमट जाना ही देश के लिए अच्छा है. नीतियां तो तब ठीक होंगी और ठीक से चल पाएंगी, जब पार्टी देशहित को सामने रख कर चलेगी. लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए सोनिया-राहुल ही सर्वोपरि हैं और उनको खुश रखने के लिए ही उनका हर क्रियाकलाप होता है.

यह बात सही है कि कांग्रेस के सिमटने से पैदा होनेवाले निर्वात को भरने में समय लगेगा, लेकिन यह निर्वात हमेशा नहीं बना रहेगा. कांग्रेस नहीं सक्षम होगी तो कोई और फॉर्मेशन लेफ्ट टू सेंटर के रूप में मूर्त रूप लेगा, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. ठीक वैसे ही जैसे आजादी के बाद 40-45 साल लग गये मजबूत विपक्ष (राइट टू सेंटर) खड़ा होने में.

और अंत में..

दिवाली पर गोपालदास नीरज की कविता ‘जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये’ ही याद आती है. लेकिन इस बार फेसबुक पर मित्र रामेंद्र जनवार की वॉल पर बालकवि बैरागी की एक कविता दिखाई दी, जो आज के समय में भी प्रासंगिक है. तो दिवाली की शुभकामनाओं के साथ यही कविता आपसे साझा कर रहा हूं-
एक पीढ़ी बुझ रही है
एक पीढ़ी जल रही है
एक पीढ़ी और है जो
गर्भ में ही पल रही है
इन विसंगत पीढ़ियों को
कौन सा परिवेश देंगे.
देश सौंपेंगे इन्हें हम
या कि बस उपदेश देंगे
झिलमिलाती लौ
सनातन लौ भला कब तक रहेगी
क्रूर अंधियारे क्षितिज के
बोझ को कब तक सहेगी
झिलमिलाती लौ
भभक करके लपट यदि बन गयी
फिर न कहना यह दिवाली
हाय कैसी मन गयी..
राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर,प्रभात खबर
rajendra.tiwari@prabhatkhabar.in
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