सचमुच का गुस्सा या मजे के लिए हिंसा?

किसी के हाथों में डंडे, तो किसी के हाथों में पत्थर. किसी के चेहरे पर गुस्सा, तो किसी के चेहरे पर शैतानी हंसी. उन्हें अपनी तरफ आते देख हम सब बस यही सोचने लगे कि पता नहीं अगले पल हमारे साथ क्या होने वाला है? हम बोधगया से पटना लौट रहे थे. हमारी गाड़ी जहानाबाद […]
किसी के हाथों में डंडे, तो किसी के हाथों में पत्थर. किसी के चेहरे पर गुस्सा, तो किसी के चेहरे पर शैतानी हंसी. उन्हें अपनी तरफ आते देख हम सब बस यही सोचने लगे कि पता नहीं अगले पल हमारे साथ क्या होने वाला है? हम बोधगया से पटना लौट रहे थे. हमारी गाड़ी जहानाबाद से गुजर रही थी. तभी अचानक सामने से उग्र भीड़ हमारी ओर आती दिखी. कुछ ही पलों में उन्होंने हमारी गाड़ी को घेर लिया. शीशे पर मुक्के बरसाने लगे.
डंडे बरसा कर शीशा तोड़ने वाले थे कि ड्राइवर ने सूझ-बूझ दिखाते हुए गाड़ी साइड लगा ली. वे अन्य वाहनों के साथ भी ऐसा ही कर रहे थे. पता चला कि आगे एक बरसाती नदी बहती है, जिसमें एक लड़का पुल से गिर गया है. इसलिए लोगों ने सड़कों पर तोड़-फोड़ की है. टायर जलाये हैं. वाहनों को नुकसान पहुंचाया है. यह देख कर एक बार फिर मेरा मन इस विषय पर चिंतन करने लगा. आखिर हर बात पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आइडिया था किसका, जिसका अनुसरण आज देश में लगभग हर जगह हो रहा है. पटना में तो आये दिन ऐसा होता है. इससे जाम अलग लगता है और लोगों का तो नुकसान होता ही है.
दक्षिण भारतीय शहर तो हमसे भी दो कदम आगे हैं. बेंगलुरु में लोकप्रिय कन्नड़ अभिनेता राजकुमार की स्वाभाविक मौत हुई थी, लेकिन लोगों ने शहर भर में हिंसक प्रदर्शन किया. दुकानें तोड़ डालीं. वाहनों को नुकसान पहुंचाया. चक्का जाम किया. तीन दिनों तक शहर में लोग सड़कों पर निकलने से डरते रहे.
आखिर क्या वजह है कि किसी चीज का विरोध करने या फिर अपनी मांगें मनवाने के लिए हम ऐसा काम करते हैं, जिससे परोक्ष रूप से हमारा खुद का नुकसान होता है? हममें से अधिकांश लोग केवल मजा लेने के लिए ऐसा करते हैं. जी हां, यह एक ऐसा सच है, जिसे हमें स्वीकार करना ही होगा. जहानाबाद में ही जो भीड़ हमारे सामने थी, उनमें ढेरों बच्चे थे, जिनकी उम्र मुश्किल से आठ-नौ साल रही होगी. भला उन्हें इसकी समझ क्या? फिर भी उनके हाथों में डंडे और पत्थर थे.
बाकी लोगों की तरह वे भी लोगों को नुकसान पहुंचा रहे थे. हम कब सुधरेंगे? इस प्रकार का विरोध-प्रदर्शन करके जब हम अपने जैसे आम लोगों को ही परेशान कर रहे हैं, तो हमारा मकसद कहां पूरा हो रहा है? यदि दबाव ही बनाना है, तो अधिकारियों और मंत्रियों के कार्यालयों और आवास के बाहर प्रदर्शन करने से हम डरते क्यों हैं? जब हमें मालूम है कि हमारे टैक्स के पैसों से सार्वजनिक संपत्ति निर्मित होती है, तो उन्हीं को नुकसान पहुंचा कर हम कैसी समझदारी का परिचय दे रहे हैं? जरा सोचिए हमारी हरकतों की वजह से जाम में फंसी एंबुलेंस में किसी की जान चली जाती है. स्कूल से लौटते बच्चे भूखे-प्यासे घंटों बस में फंसे रहते हैं. सच में, हम कौन थे? क्या हो गये? और क्या होंगे अभी? आइए जरा सोचें.
शैलेश कुमार
प्रभात खबर, पटना
shaileshfeatures@gmail.com
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




