सफल होने के सिवाय कोई विकल्प नहीं

Published at :28 Aug 2014 11:48 PM (IST)
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सफल होने के सिवाय कोई विकल्प नहीं

भारत को फिर उठना ही होगा, ताकि बहुलतावाद एवं लोकतांत्रिक पारस्परिकता के साथ भेदरहित सामूहिक विकास यहां फल-फूल सके और सुरक्षित रहे. सफल होने के सिवाय और कोई विकल्प है ही नहीं. भारत के इतिहास में 28 अगस्त, 2014 ‘जन अर्थ क्रांति’ का एक ऐसा दिन बन कर उभरा है, जब गरीब, निरक्षर ग्रामीणों, विशेषकर […]

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भारत को फिर उठना ही होगा, ताकि बहुलतावाद एवं लोकतांत्रिक पारस्परिकता के साथ भेदरहित सामूहिक विकास यहां फल-फूल सके और सुरक्षित रहे. सफल होने के सिवाय और कोई विकल्प है ही नहीं.

भारत के इतिहास में 28 अगस्त, 2014 ‘जन अर्थ क्रांति’ का एक ऐसा दिन बन कर उभरा है, जब गरीब, निरक्षर ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं के हाथों में भी बैंक खाते की कॉपी, डेबिट कार्ड और एक लाख रुपये के बीमा का भरोसा होगा. ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ के शुभारंभ के साथ एक दिन में एक करोड़ से अधिक लोगों का बीमा होना और खाते खुलना अपने आप में एक रिकार्ड है. इस समय देश के 48 प्रतिशत से ज्यादा नागरिक किसी भी तरह की बैंकिंग सुविधा से वंचित हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 18 प्रतिशत एटीएम और सिर्फ 38 प्रतिशत बैंक शाखाएं हैं. देश के आर्थिक विकास के राडार पर शहरी और धनी लोगों का वर्चस्व रहा है. पैसे वालों की सरकारें, पैसे वालों द्वारा प्रभावित और केवल पैसे वालों के लिए काम करनेवाली रही हैं. गरीब और ग्रामीण लोग आर्थिक नियोजन के केंद्र में कभी रहे ही नहीं.

यह पहली बार हुआ है कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री किसी योजना की घोषणा करते हैं और 15 दिन से भी कम समय में उस योजना को पूरा करने का अभियान शुरू हो जाता है. अरुणाचल में इटानगर तक रेलगाड़ी, जम्मू-कश्मीर में कटरा और उत्तराखंड में चारधाम तक रेल, बंदरगाहों को भारत में समृद्धि लाने का महाद्वार बनाना, सरकारी खर्च कम करने के लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में खर्च प्रबंधन बोर्ड बनाना, रेल और रक्षा के क्षेत्र में क्रमश: सौ प्रतिशत से लेकर 49 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश खोलना- ये सभी नये आर्थिक परिवर्तन की सुगबुगाहट देते हैं.

श्री अरविंद के शब्द बल और विश्वास देते हैं. वह भारत जो सदियों लड़ता रहा, जीतता और हारता रहा, फिर जीता, उठा और इकबाल से भी लिखवा दिया कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, अंतत: अपनी मूल आत्मा के स्वर को पहचानते हुए उस दिन का साक्षात्कार करेगा ही, जब अविद्या और दरिद्रता के दुख इस धरती पर नहीं रहेंगे.

दुनिया भर में घूम आइये- भारत से सुंदर देश कहां मिलेगा? शिलांग से वालोंग, सिक्किम से लेह और कारगिल, श्रीनगर से जैसलमेर और अजंता-एलोरा से रामेश्वरम, हम्पी से लक्षद्वीप और कोंकण रेलवे के रास्ते से गुजरते हुए पंजिम और उडुप्पी, ताजमहल और फतेहपुर सीकरी से ग्वालियर के किले तो हुसैन सागर से कटक और फिर तो जय जगन्नाथ. जो सारे विश्व में है, वह भारत में है, लेकिन जो भारत में है, वह शेष विश्व में भी हो, यह आवश्यक नहीं.

सिकुड़ गये और गली-मोहल्ले की बातों में उलझ गये, वरना हमारे पूर्वजों के पदचिह्न् और उनकी विद्या तथा करुणा का मैत्रीपूर्ण प्रभाव जापान से लेकर कोरिया, चीन से लेकर थाईलैंड, म्यांमार व कंबोडिया, तो अफगानिस्तान से लेकर पूर्ववर्ती मैसोपोटामिया तक मिलता है. चीन में आज भी यदि कम्युनिस्ट पार्टी का साहित्य किसी भारतीय का आदर से नाम लेता है, तो वह है कुमार जीव और कश्यप. कुमार जीव हजार साल पहले चीन के अध्यापक या राजगुरु के नाते सम्मानित किये गये थे, जिनकी अद्भुत कथा विद्यावारिधि डॉ लोकेशचंद्र ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रस्तुत की थी. लेकिन, यह बात कह कर आप एक बार देखिये कि बैंकाक में विश्व के विराट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम यदि स्वर्णभूमि है और यदि वहां सागरमंथन का अद्भुत दृश्य मूर्तिमंत है, तो तुरंत आधुनिक प्रभाव के वे बौद्धिक, जो लगभग भारत की हर श्रेष्ठता से घृणा करना अपनी कलम का संप्रदाय मानते हैं, कहेंगे कि आप विस्तारवादी हो रहे हैं, हिंदूवादी बात कर रहे हैं, भारत के प्राचीन औपनिवेशिक साम्राज्य की उपहासास्पद स्मृति जगा रहे हैं यानी भारत की महानता का स्मरण उन्हें सहन नहीं होता.

एक बार फिर वर्तमान बौद्धिक माहौल में कहिये कि भाई यदि शताब्दियों पहले तक्षशिला में तीस लाख पुस्तकें किसी आक्रमणकारी ने जलायी थीं, तो जरा इतना तो सोचो कि हस्तलिखित तीस लाख पुस्तकों को जमा कर विश्वविद्यालय स्थापित करनेवाला भारत कितने वर्ष पूर्व से शब्द और उनके अर्थ, ज्ञान और विज्ञान, काव्य भंडार एकत्र कर रहा होगा? आज अगर अपना मजाक ठीक ब्रिटिश सार्जेट या भारत के प्रति घनीभूत घृणा से ग्रस्त पूर्वाग्रही पाश्चिमात्यों की तरह उड़वाना है, तो बस इतना भर कह कर देख लीजिये कि- सॉरी सर, शायद वे भारतीय ही थे, जिन्होंने जंग न लगनेवाले लौह स्तंभ का निर्माण किया था और पाइथागोरस की थ्योरम से पहले भास्कराचार्य कुछ लिख और कर गये थे. प्लीज सर देख लीजिये, शायद वह कुछ विद्वता की बात थी.

सर, शायद द वंडर दैट वॉज इंडिया देखना चाहें या इस पहेली का जवाब ढूंढ़ना चाहें कि क्या दुनिया भर से कोलंबस या मार्को पोलो या बाबर या मोहम्मद बिन कासिम किसी लुटे-पिटे, दरिद्री, भुखमरे, अनपढ़, जाहिल देश में आ रहे थे और यहां से मिट्टी या कचरा लूट कर ले जा रहे थे अथवा वे उन लोगों के देश में आ रहे थे, जिसे दुनिया भर में सोने की चिड़िया कहा जाता था और जो ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से दो हजार साल पहले नालंदा बना चुके थे, एलोरा का आश्चर्य तथा श्रीरंगपट्टनम के चमत्कार सृजित कर चुके थे? और सृजन करनेवाले ये हाथ रोम, वेटिकन, पेरिस या किसी डच इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेकर नहीं आये थे. सर, हमें नापना आता था, हमें गिनना भी आती थी, जहां अंगरेज नहीं गिन पाते थे और लैटिन शब्दों को दोहरा-दोहरा कर हिंदी पूरे करते थे, वहां हम नील, पदम और शंख तक गिनते थे. सर, कहते हैं कि दशमलव भी उन्होंने दिया, जिन्हें अंगरेजी नहीं आती थी और शून्य ही नहीं, बल्कि अंकगणित भी हमारे ही उन पूर्वजों ने दिया जो मॉस्को पढ़ने नहीं गये थे और इसीलिए अरबी में अंकों को हिंदसे कहा जाता है तथा अंगरेज उसे इंडियन न्यूमरल्स कहते हैं.

विश्व के सबसे भयानक आक्रमण हमने झेले और फिर भी यदि हम खड़े हो गये, तो इसकी वजह है भारत को आसेतु हिमाचल बांधने तथा व्याख्यायित करनेवाली कोई ताकत है, कोई धागा है, कोई समानता का सूत्र है. वह सूत्र घृणा और आक्रामकता का पात्र नहीं हो सकता.

भारत को फिर उठना ही होगा, ताकि बहुलतावाद एवं लोकतांत्रिक पारस्परिकता के साथ भेदरहित सामूहिक विकास यहां फल-फूल सके और सुरक्षित रहे. सफल होने के सिवाय और कोई विकल्प है ही नहीं. इसीलिए पुन: पुन: भारत भाग्योदय का अटल विश्वास हृदय में है. इसीलिए नवीन शब्द, नवीन भाषा, नवीन छंद रचे जाने की आहट है.

तरुण विजय

राज्यसभा सांसद, भाजपा

tarunvijay2@yahoo.com

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