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कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल

Updated at : 21 Jan 2020 7:09 AM (IST)
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कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल

विजय कु चौधरी अध्यक्ष, बिहार विधानसभा vkumarchy@gmail.com पिछले दिनों कोच्चि (केरल) में आयोजित एक कार्यक्रम में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने कहा कि न्यायपालिका मेें हाल की गतिविधियों को देखने के बाद उन्हें न्यायिक नियुक्तियों हेतु आयोग (एनजेएसी) संबंधी मामले में 2015 में दिये गये फैसले में शामिल होने का अफसोस है. […]

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विजय कु चौधरी
अध्यक्ष, बिहार विधानसभा
vkumarchy@gmail.com
पिछले दिनों कोच्चि (केरल) में आयोजित एक कार्यक्रम में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने कहा कि न्यायपालिका मेें हाल की गतिविधियों को देखने के बाद उन्हें न्यायिक नियुक्तियों हेतु आयोग (एनजेएसी) संबंधी मामले में 2015 में दिये गये फैसले में शामिल होने का अफसोस है.
वे अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ के 13वें राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘वर्तमान युग में भारतीय संविधान के सामने चुनौतियां’ विषय पर बोल रहे थे. उनके इस कथन ने उच्चतर न्यायपालिका (हायर जूडिशियरी) की कार्यशैली से लेकर नियुक्ति की प्रक्रिया की तरफ देश का ध्यान आकृष्ट किया है.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 में संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित हुआ था एवं उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को व्यापक आधार देने का प्रावधान किया गया था.
न्यायपालिका, कार्यपालिका के साथ-साथ प्रख्यात बुद्धिजीवियों की सहभागिता से नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने की यह कवायद थी. इसको संवैधानिक पीठ द्वारा अवैध करार दिया गया एवं इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित करने से जोड़कर संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया गया.
जस्टिस कुरियन से पहले न्यायाधीश जेएस वर्मा ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए जजों संबंधी दूसरे मामले (1993) के फैसले में कहा कि उनका मकसद न्यायपालिका को प्रधानता और प्रभुत्व देना नहीं था, बल्कि सिर्फ परामर्श को प्रभावकारी बनाना था.
इस मामले में विजयी पक्ष के वकील रहे फली नरीमन ने 2009 में कॉलेजियम की कार्यशैली को देखते हुए कहा कि उक्त मुकदमा जीतने का उनको अफसोस है. आखिर इन सब बातों का अर्थ क्या निकलता है? स्पष्ट है कि कॉलेजियम के सदस्य अथवा कर्ताधर्ता रहे न्यायाधीशों को भी इसकी कार्यशैली पर न सिर्फ दुख है, बल्कि पछतावा भी हो रहा है.
किसी कानून की वैधता सत्यापित करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय को ही है. इसके अलावा अनुच्छेद 137 के तहत इसे न्यायिक समीक्षा की शक्ति भी प्राप्त है. संविधान के अनुसार उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्ति का अधिकार स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को दिया गया है.
राष्ट्रपति द्वारा आवश्यकता समझने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेने का प्रावधान है. विभिन्न फैसलों के आधार पर इसका स्वरूप परिवर्तित करते हुए परामर्श लेने की प्रक्रिया को अनिवार्य बना दिया गया. प्रधान न्यायाधीश का तात्पर्य उच्चतम न्यायालय की संस्था के रूप में बताते हुए पांच जजों के एक कॉलेजियम की अवधारणा स्थापित की गयी. इस प्रकार संविधान में बिना उल्लेख के कॉलेजियम एक निकाय के रूप में अस्तित्व में आ गया.
पुनः कॉलेजियम द्वारा की गयी अनुशंसा को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी बना दिया गया. विभिन्न व्याख्याओं के परिप्रेक्ष्य में संविधान की मूल प्रावधानित व्यवस्था का ही रूपांतरण हो गया. दोनों व्यवस्थाओं में अंतर यह है कि मूल व्यवस्था में नियुक्ति संबंधी अंतिम निर्णय का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त था. परंतु नयी व्यवस्था में अंतिम निर्णय कॉलेजियम का होता है, जो स्पष्ट रूप से संविधान की मौलिक अवधारणा से अलग है.
हाल में सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर जब उनके सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, तो उच्चतम न्यायालय के जिस पीठ ने इस मामले की पहली सुनवाई की, उसकी अध्यक्षता स्वयं गोगोई ने की. यह सामान्य न्यायिक सिद्धांत के प्रतिकूल है. अभी लोग भूले नहीं हैं कि प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली के विरुद्ध आवाज उठानेवाले चार जजों में से एक रंजन गोगोई भी थे.
इनके नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने वरीयता का उल्लंघन कर नियुक्ति के मामले में एक मिसाल कायम की. पूर्व में अनुशंसित वरीय जजों का नाम वापस लेकर कनीय लोगों को उच्चतम न्यायालय मेें जज नियुक्त करने का मार्ग प्रशस्त किया. क्या न्यायाधीशों को भी आम लोगों की तरह ही किसी गलत काम का एहसास तभी होता है, जब उसे करनेवाला कोई दूसरा हो? यह बड़ी विचित्र स्थिति है, क्योंकि विधायिका या कार्यपालिका द्वारा सीमा लांघने पर न्यायपालिका उसे नियंत्रित करती है. परंतु न्यायपालिका को तो स्वयं ही आत्मनियामक की भूमिका निभानी होगी.
अनुच्छेद 50 के अनुसार न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक रखने की व्यवस्था की गयी है. संविधान निर्माताओं द्वारा विधायिका अथवा कार्यपालिका के द्वारा न्यायपालिका के अधिकारों के अतिक्रमण अथवा उसे प्रभावित करने की स्थिति के निषेध के लिए ही ऐसी व्यवस्था की गयी है. दूसरी तरफ, संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली में संप्रभुता निर्विवादित रूप से जनता में निहित होती है, जो उसका उपयोग अपने द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों के माध्यम से करती है.
हमारा संविधान सरकार के तीनो अंगों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच नियंत्रण और संतुलन की अवधारणा को प्रतिपादित करने के लिए जाना जाता है. न्यायपालिका से ही जुड़े पुराने एवं अनुभवी लोग कॉलेजियम व्यवस्था पर न सिर्फ असंतोष, बल्कि अफसोस प्रकट कर रहे हैं. फिर तो इस दिशा में समय रहते आवश्यक पहल करनी होगी.
कॉलेजियम व्यवस्था के ढंग से कार्य नहीं करने के आलोक में न्यायिक नियुक्तियों के संबंध में किसी दूसरी पारदर्शी प्रक्रिया हेतु सरकार को न्यायपालिका को विश्वास में लेकर पहल करने की जरूरत है.
यह लेखक के निजी विचार हैं
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