कहीं वैसा न हो जाये!

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार [email protected] ऑस्कर वाइल्ड ने कभी कहा था, ‘नये साल के संकल्प करना उस बैंक का चेक काटने जैसा है, जिसमें अपने खाते में पैसा नहीं है.’ भले आदमी थे वाइल्ड, और इस बात के लिए ऑस्कर अवाॅर्ड के हकदार भी, कि उन्होंने अपने कथन में इतनी सदाशयता बरती. वरना आज तो […]
सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
ऑस्कर वाइल्ड ने कभी कहा था, ‘नये साल के संकल्प करना उस बैंक का चेक काटने जैसा है, जिसमें अपने खाते में पैसा नहीं है.’ भले आदमी थे वाइल्ड, और इस बात के लिए ऑस्कर अवाॅर्ड के हकदार भी, कि उन्होंने अपने कथन में इतनी सदाशयता बरती.
वरना आज तो लोग उस बैंक का भी चेक काट देते हैं, जिसमें अपने खाते में ही नहीं, बल्कि किसी के खाते में पैसा न हो और अगर हो भी, तो सरकार ने उसे निकालने पर सौ तरह के प्रतिबंध लगाये हुए हों, ताकि उसे अमीर किस्म के गरीबों को डूबंत ऋण के रूप में उपलब्ध कराया जा सके. सरकार ऐसे गरीब अमीरों को बैंकों से न केवल ऋण दिलवाती है, बल्कि उसे न लौटाने के रास्ते भी दिखाती है, जिस पर चलकर वे देश से बाहर भी जा सकते हैं और फिर बैंकों को आंखें दिखा सकते हैं.
डूबंत ऋण भी अब केवल डूबे हुए ऋण को नहीं कहते, बल्कि डूबनेवाले ऋण को भी कहते हैं. यानी जो ऋण यह जानते-बूझते हुए ही दिया जाता है कि यह डूबेगा. वर्ण-विपर्यय के सिद्धांत के अनुसार, कई जगह डूबना ‘बूड़ना’ हो गया है. कमाल नामक पूत के उपजने पर कबीर का वंश बूड़ा था, तो डूबत ऋण लेनेवाले होनहारों के कारण पूरा देश बूड़ने के कगार पर है.
नेता लोग तो संकल्पों के मामले में उन बैंकों के भी चेक काट देते हैं, जो कहीं होते ही नहीं और अगर पहले कभी रहे भी होते हैं, तो उन्हीं की करतूतों से न होने की स्थिति में पहुंच गये होते हैं. उनके लिए संकल्प और आश्वासन में ज्यादा फर्क नहीं होता, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं.
इधर से जो संकल्प जैसा दिखता है, दूसरी तरफ से वही आश्वासन के रूप में प्रकट होता है. नेता द्वारा येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने का संकल्प ही जनता को विकास के आश्वासन के रूप में मिलता है. जनता भी उसके लिए केवल वही लोग होते हैं, जो उसे वोट देते हैं. जो उसे वोट न दे, वह जनता नहीं, गठबंधन होता है. और इसलिए वह घोषित कर देता है कि आगामी चुनाव जनता और गठबंधन के बीच है.
नये साल की यह बहुत बुरी आदत है कि वह सर्दियों में आता है. यह देखते हुए कुछ लोग रोज नहाने का भी संकल्प लेते हैं और जिस दिन भी नहा लें, उसे ही ‘रोज’ कह देते हैं. इसमें लेखक किस्म के लोग ज्यादा होते हैं, जो लेखन में अपने नहाने की बात करने को ही क्रांति समझते हैं.
कुछ लोग अपने पर नहीं, दूसरों पर ध्यान रखते हैं कि वे क्यों धूम्रपान छोड़ने, मद्यपान बंद करने या मोटापा घटाने के संकल्प नहीं करते. उन्हें नहीं पता कि मोटे लोग दुनिया के सबसे जिंदादिल इंसान होते हैं. उन्हें आप लाख चिढ़ाते रहो, लेकिन वे आपको कुछ नहीं कहेंगे. शर्त बस यह है कि चिढ़ाने के फौरन बाद आप वहां से रफूचक्कर हो जायें.
रही बात मेरी, कि मैं नये साल पर कोई संकल्प लेता हूं या नहीं? तो जनाब हफीज जालंधरी के शब्दों में मेरी तो यह हालत है कि – इरादे बांधता हूं, सोचता हूं, तोड़ देता हूं; कहीं ऐसा न हो जाये, कहीं वैसा न हो जाये!
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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