विदेश से पहले बने रक्षा नीति

Updated at : 08 Jun 2014 5:28 AM (IST)
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विदेश से पहले बने रक्षा नीति

।। पवन के वर्मा।। (पूर्व राजनयिक, लेखक व बिहार के मुख्यमंत्री के सलाहकार) विदेश नीति के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार की सक्रियता सराहनीय है. राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में भव्य शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के नेताओं की उपस्थिति संतोषप्रद थी. मोदी की चीन के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ओबामा से टेलीफोन पर बातचीत […]

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।। पवन के वर्मा।।

(पूर्व राजनयिक, लेखक व बिहार के मुख्यमंत्री के सलाहकार)

विदेश नीति के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार की सक्रियता सराहनीय है. राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में भव्य शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के नेताओं की उपस्थिति संतोषप्रद थी. मोदी की चीन के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ओबामा से टेलीफोन पर बातचीत भी कूटनीतिक पहल की नयी तत्परता का संकेत देते हैं. नवाज शरीफ द्वारा उपहार के बदले उपहार में मोदी की मां के लिए साड़ी भेजना बहुत विचारपूर्ण भाव है, और अब शायद हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की बेटी मरियम के लिए भी कोई अच्छा-सा उपहार भेजें.

भले ही यह सब देखने में बहुत अच्छा लगता हो, लेकिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या ये सारी बातें किसी व्यापक कार्ययोजना का हिस्सा हैं? यदि विदेश नीति से जुड़े मसलों का औपचारिक तौर पर हाथ मिलाने या सोच-विचार से चुने गये उपहारों से समाधान हो जाता, तो कूटनीति को नियंत्रित करना अभी के मुकाबले बहुत आसान काम होता. मोदी को भी यह बात समझ में आने लगी है कि सरल प्रतीत होनेवाली शिष्टाचारपूर्ण भाव-भंगिमाएं कूटनीति की असली दुनिया में अनैच्छिक और अप्रिय स्थितियां उत्पन्न कर सकती हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे के निमंत्रण का तमिलनाडु की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने एक सुर में विरोध किया. बांग्लादेश में शेख हसीना के साथ मौजूदा नजदीकियों की सतह के ठीक नीचे अक्सर भारत-विरोधी भाव भी घर किये बैठा रहता है. शेख हसीना ने इस शिखर सम्मेलन स्तर के आयोजन में आना जरूरी नहीं समझा और संसद की अध्यक्षा को बतौर प्रतिनिधि भेज दिया. पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की इस बात के लिए चौतरफा आलोचना हुई कि उन्होंने हमारे नये प्रधानमंत्री के साथ रात्रि-भोज में कश्मीर का मामला नहीं उठाया.

वास्तविकता यह है कि दक्षिण एशिया की जमीनी सच्चाइयां को लेकर सद्भाव की अस्थायी भंगिमाओं से कहीं अधिक जरूरत व्यापक रणनीतिक और सुरक्षा सिद्धांतों के अनुरूप सुविचारित कार्ययोजना की है. जब मोदी ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता की पहली झलक दिखायी, तब उनकी सरकार ने पद-भार भी नहीं ग्रहण किया था. उनका कोई न विदेश मंत्री था और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति हुई थी. विदेश नीति के एक जानकार के मुताबिक, मोदी अंधेरे में उड़ रहे थे. चुनाव अभियान में उनके बयान ही उनकी विदेश नीति के मार्गदर्शक थे. मोदी भी इस बात को स्वीकार करेंगे कि उनके वे बयान उन्हें परेशान कर सकते हैं. तब उनका तेवर युद्धोन्मादी था. कश्मीर में लगातार घुसपैठ और आंतकवाद के पाकिस्तान द्वारा प्रश्रय देने की बात कह कर उन्होंने पिछली सरकारों द्वारा पाकिस्तान के साथ बातचीत की हर कोशिश का मजाक उड़ाया था. नवंबर, 2008 के मुंबई नरसंहार के दोषियों को भारत को सौंपे जाने से पहले वे पाकिस्तान के साथ बातचीत के विरुद्ध थे और पाकिस्तानी नृशंसता के शिकार भारतीय सैनिकों के सिर काटे जाने की घटना और यूपीए सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ बरती गयी नरमी का विस्तृत तुलनात्मक वर्णन किया करते थे. वे अक्सर सरकार की आलोचना करते हुए कहा करते थे कि एक तरफ सीमा पर हमारे सैनिकों के सिर काटे जा रहे हैं और दूसरी तरफ हमारी सरकार पाकिस्तानी नेताओं को स्वादिष्ट बिरयानी परोस रही है.

बहरहाल, न तो पाकिस्तान में चल रहे आतंकी शिविर बंद हुए, न ही मुंबई के अपराधियों को सजा मिली और न ही जम्मू-कश्मीर में सीमा-पार से संचालित आतंकवाद खत्म हुआ. पिछले मसलों को सुलझाये बगैर पाकिस्तान से कोई संबंध नहीं रखने के मोदी के दावों की कलई खुल गयी है. राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में नवाज शरीफ की मौजूदगी या मोदी की माताजी के लिए साड़ी के उपहार को तो छोड़ ही दें. दरअसल, जब मोदी के साथ नवाज शरीफ बिरयानी या शायद ढोकला खा रहे थे, उसी समय अफगानिस्तान के हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमले में लश्करे-तय्यबा के शामिल होने के सबूत स्पष्ट रूप से सामने आ चुके थे.

इसीलिए, महत्वपूर्ण बात यह है कि विदेश नीति को भली नीयत के अस्थायी तामझाम से बचा कर वास्तविक राजनीति की ठोस हकीकतों पर आधारित करने की जरूरत है. पाकिस्तान विस्फोटक आक्रामकता और कुशल तुष्टीकरण की नीति में पारंगत हो चुका है. समय की मांग है कि भारत ऐसी कार्ययोजना तैयार करे, जिससे पाकिस्तान के दोनों रवैयों का पूर्वानुमान लगाया जा सके. बातचीत, समझौतों और अन्य पहलों में कोई दिक्कत नहीं है, अगर ये सब हमारे उद्देश्यों के अनुरूप हों.

चीन और पाकिस्तान के साथ हमारी विदेश नीति के परिणाम हमारी रक्षा तैयारियों पर निर्भर हैं. यह बात चीन के संदर्भ में अधिक जरूरी है. चीन एक महीने के भीतर सेना के 30 डिवीजन यानी करीब पांच लाख सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात कर सकता है, जो उस क्षेत्र में भारतीय सेना की संख्या से तीन गुनी है. तिब्बत सीमा पर इसने 3000 किलोमीटर लंबी नयी सड़कें, 1956 किलोमीटर लंबी रेल लाइन, 1080 किलोमीटर लंबी गोलमुड-ल्हासा पाइप लाइन और अनेकों हवाई पट्टी तैयार कर लिया है. भारत-चीन सीमा पर मौजूद हमारे बुनियादी ढांचे की इससे कोई तुलना ही नहीं हो सकती है. चीन को ध्यान में रखते हुए एक पहाड़ी हमलावर कोर, जिसमें एक सैन्य टुकड़ी उत्तराखंड और दो सशस्त्र टुकड़ियां लद्दाख और सिक्किम के लिए हो, बनाने का सेना का प्रस्ताव अब भी लंबित है. चीन और पाकिस्तान के हिसाब से देश की सुरक्षा में ऐसी कई कमजोरियां हैं.

इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेश नीति को पुराने पड़ चुके पारंपरिक दिखावे के बंधन से मुक्त कर विदेश नीति और सुरक्षा के मानदंडों के सम्मिलित आधार पर सोच-समझकर एक सुस्पष्ट सुरक्षा-सिद्धांत विकसित करना चाहिए. ऐसा करते समय उन्हें चाणक्य और उसके चार सूत्रों- साम, दाम, दंड और भेद- तथा अल्पचर्चित सूत्र आसन यानी जान-बूझकर किनारे बैठने की सामरिक कला का अध्ययन करना चाहिए.

उपहारों के आदान-प्रदान, समारोहों के निमंत्रणों और बिरयानी के भोजों का तभी कोई मतलब होगा, जब परवर्तित और प्रभावी सुरक्षा सिद्धांत लागू होगा. विदेश नीति में सामरिक ठहराव की जरूरत होती है, बिना मायने-मतलब की जल्दबाजी की नहीं. अगर इस बात पर समुचित ध्यान नहीं दिया जायेगा, तो देखने में भली लगनेवाली आकर्षक भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन पहले की तरह चलता रहेगा, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर पिछली परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं होगा.

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