पड़ोस की क्यारी की सब्जियां

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार अभी मुश्किल से पंद्रह दिन पहले तो नर्सरी से लाकर कद्दू की बेल लगायी थी और इतनी जल्दी उस पर पीले फूल भी खिल गये. यानी जल्दी ही इस पर कद्दू लगेंगे. उसके बड़े-बड़े पत्ते और पीले फूल, फैली घास पर ऐसे लग रहे हैं, जैसे हरी साड़ी या दुपट्टों पर […]
क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
अभी मुश्किल से पंद्रह दिन पहले तो नर्सरी से लाकर कद्दू की बेल लगायी थी और इतनी जल्दी उस पर पीले फूल भी खिल गये. यानी जल्दी ही इस पर कद्दू लगेंगे. उसके बड़े-बड़े पत्ते और पीले फूल, फैली घास पर ऐसे लग रहे हैं, जैसे हरी साड़ी या दुपट्टों पर खिले हुए पीले फूल छपे हों. किसी कलाकार ने बहुत मेहनत से कोई डिजाइन बनायी हो. सामने लगा लाल कनेर, छत से प्रतियोगिता करते मोरपंखी, कोने में लगे नींबू पर सफेद फूल खिले हैं और फल आने को हैं, दीवार के किनारे लगे लाल, गुलाबी, पीले, सफेद गुलाब, सबके सब जैसे कद्दू की बेल पर खिले फूलों को देखकर खुश हो रहे हैं.
यह बेल गांव में होती, तो अपने सहोदरों तोरई, लौकी, टिंडे, परवल की तरह किसी बिटोरे पर चढ़कर गोल-गोल घूम रही होती. बड़े-बड़े गोल कद्दुओं का बोझ बिटोरा उसी तरह संभाल लेता जैसे कि तोरई, लौकी या तरबूज-खरबूज काे संभालता है. गांवों और शहरों की हरियाली का फर्क दिखता है. गांवों में दूर तक फैले खेत, और घरों में छोटी-छोटी क्यारियों में खेती-बाड़ी के पूरे होते शौक, सबका अपना आनंद है.
कई बार ककड़ी या तोरई के खेतों के पास से गुजरो, तो चट-चट की आवाजें सुनायी देती हैं, जैसे कि कोई उंगलियां चटका रहा हो. ये आवाजें इन फलों, सब्जियों के बढ़ने की आवाजें होती हैं. अगर किसी को बताओ तो सहसा विश्वास ही न हो. बल्कि अकेला कोई गुजर रहा हो और इस बारे में न जानता हो, तो हो सकता है कि भूत-प्रेत के डर से भाग खड़ा हो.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों और शहरों में भी अक्सर शाम के वक्त कद्दू, लौकी, तोरई, टिंडा, परवल आदि खाने का रिवाज है. कहा जाता है कि ये सब्जियां रात को खाने से हमारा पाचनतंत्र सही रहता है. पेट की समस्याएं नहीं सतातीं. डाॅक्टर भी अकसर बीमारी के वक्त इन्हीं सब्जियों को खाने की सलाह देते हैं.
खेतों की तरह ही अपने घर की क्यारियों में इन शाक-भाजी को उगाना अपने आप में एक सुखद और बहुत रचनात्मक अनुभव है. जैसे ही किसी बेल या पौधे पर फूल खिलता है या कोई फल लगता है, तो वह एक अद्भुत सुख देता है. एक तोरई या घीया देखकर मन ऐसे खिल उठता है, जैसे कि सचमुच कारूं का खजाना मिल गया हो. इस तरह की खेती-क्यारी और हरियाली से ऐसी नजदीकी मन को तमाम तरह के तनाव से मुक्त करती है, खुशी देती है.
विदेशों की तरह शहरों के आसपास भी कम्युनिटी फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. जहां कुछ पैसे खर्च करके लोग अपने-अपने पसंद की सब्जियां, फल उगा सकें.
और उनके उगाने का आनंद ले सकें. अगर ऐसी सुविधा मिल सके, तो हम में से बहुत लोग अपने बचपन में दोबारा पहुंच जायेंगे. जहां स्कूलों में हमें खेती-क्यारी सिखायी जाती थी. और बच्चों की अलग-अलग क्यारियां होती थीं. अपनी क्यारी की प्रतियोगिता हमेशा पड़ोस वाली क्यारी से चलती रहती थी. और बच्चों को और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा देती थी.
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