गंगा का जलस्तर घटने के बाद भी 3 से 4 हफ्ते तक Post-Flood का रिस्क: बीमारी, टूटी सड़कें और डूबे खेत बनते हैं आफत

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पटना के दियारा जिले में बाढ़ के बाद रेस्क्यू के लिए इकट्ठा हुए लोग (PC : ANI)

Post-Flood Risk : बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी असली खतरा बना रहता है. तटबंधों में दरारें, पीने के पानी की समस्या, सड़कों का क्षतिग्रस्त होना और खेतों में पानी ठहरना अगली फसलों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. जानिए 3 से 4 हफ्तों तक पोस्ट-फ्लड जोखिमों के बारे में.

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Post-Flood Risk : केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के हाइड्रोलॉजिकल प्रोटोकॉल के अनुसार, नदी का जलस्तर घटने के बाद भी असली खतरा अगले 10 से 15 दिनों तक सबसे ज्यादा बना रहता है. तकनीकी रिपोर्ट बताती है कि जब नदी का पानी तेजी से नीचे उतरता है, तो तटबंधों (Embankments) की भीतरी मिट्टी में फंसा पानी बाहर की ओर दबाव बनाता है. इस दबाव के चलते अचानक मिट्टी धंसने और तटबंधों में दरारें आने की आशंका बढ़ जाती है.

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इसके साथ ही लोक निर्माण विभाग (PWD) के फील्ड आंकड़ों के मुताबिक, लंबे समय तक पानी में डूबे रहने की वजह से ग्रामीण संपर्क सड़कें और छोटी पुलिया अंदर से खोखली हो जाती हैं, जिन्हें पूरी तरह सुरक्षित और बहाल होने में कम से कम 3 से 4 हफ्ते का वक्त लग जाता है

बाढ़ के बाद पीने के पानी और बिजली की सबसे बड़ी चुनौती

निचले इलाकों से सैलाब हटने के बाद सबसे बड़ा संकट सुरक्षित पेयजल का खड़ा होता है. बाढ़ का गंदा पानी चापाकलों (हैंडपंप) के जलस्तर में समा जाने से 'सोर्स कंटामिनेशन' हो जाता है. स्थानीय प्रशासन की ओर से ब्लीचिंग पाउडर और हैलोजन टैबलेट्स बांटी जाती हैं, लेकिन जब तक जलस्रोतों का क्लोरीनेशन पूरा नहीं होता, तब तक डायरिया और जलजनित बीमारियों का खतरा बना रहता है. वहीं, सब-स्टेशनों और ट्रांसफार्मरों में पानी भरने की वजह से सुरक्षा कारणों से काटी गई बिजली को दोबारा बहाल करने में 7 से 10 दिन लग जाते हैं, क्योंकि शॉर्ट-सर्किट का जोखिम बना रहता है.

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स्कूल और अस्पताल कितने तैयार हैं?

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और उप-केंद्र सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. पानी निकलने के बाद प्राथमिक चुनौती एंटी-वेनम (सांप के जहर की दवा), ORS और एंटीबायोटिक्स की उपलब्धता बनाए रखने की होती है. दूसरी ओर, दर्जनों सरकारी स्कूलों को राहत शिविरों (Relief Shelters) में तब्दील कर दिया जाता है. पानी उतरने के बाद भी गाद (Silt) की सफाई और सैनिटाइजेशन न होने से 2 से 3 सप्ताह तक कक्षाएं शुरू नहीं हो पाती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई का लंबा नुकसान होता है.

खेतों में पानी ठहरने का अगली फसल पर क्या असर?

कृषि विभाग के आकलन के अनुसार, खरीफ की धान फसल अगर 7 से 10 दिन तक पूरी तरह डूबी रह जाए, तो बालियां गल जाती हैं. पानी घटने के बाद खेतों में मोटी बालू या गाद की परत छूट जाती है. अगर सितंबर के आखिर तक खेतों से पानी नहीं निकला, तो मिट्टी में अत्यधिक नमी के कारण रबी सीजन की तैयारी, खासकर दलहन और तिलहन की समय पर बुआई पिछड़ जाती है.

कागजों पर बना 'फ्लड मैप' जमीन पर क्यों फेल हो जाता है?

आपदा प्रबंधन विभाग के पास एक नक्शा होता है, जिसमें दर्ज होता है कि नदी का पानी बढ़ने पर कौन-कौन से इलाके डूबेंगे. लेकिन जमीन पर हकीकत बदल चुकी है. नए बने हाईवे, ऊंची सड़कें, रेलवे लाइनें और अवैध निर्माण पुराने प्राकृतिक नालों का रास्ता रोक देते हैं. इसका नतीजा यह होता है कि नक्शे के हिसाब से जिन गांवों या मोहल्लों को सुरक्षित माना गया था, वहां पानी हफ्तों तक जमा रह जाता है क्योंकि पानी निकलने का रास्ता ही बंद हो चुका होता है. यानी प्रशासन की तैयारी पुराने मैप पर होती है, जबकि सैलाब नए रास्तों से आकर तबाही मचा देता है.

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