समाज में व्याप्त असमानता के कारण भारत कुपोषण के खिलाफ लड़ाई 2025 तक नहीं जीत पायेगा : न्यूट्रिशन रिपोर्ट

Author : Rajneesh Anand Published by : Prabhat Khabar Updated At : 13 May 2020 5:24 PM

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Global Nutrition Report 2020 said India will not win fight against malnutrition by 2025 ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2020 एक ऐसे समय में सामने आया है, जब पूरा विश्व कोविड 19 जैसी महामारी की गिरफ्त में है. ऐसे समय में यह कहा जा रहा है कि 2025 तक भारत अपने न्यूट्रिशन के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पायेगा.

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नयी दिल्ली : ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2020 एक ऐसे समय में सामने आया है, जब पूरा विश्व कोविड 19 जैसी महामारी की गिरफ्त में है. ऐसे समय में यह कहा जा रहा है कि 2025 तक भारत अपने न्यूट्रिशन के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पायेगा. रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस के दौर में सभी को अधिक न्यूट्रिशन या पोषण की जरूरत है ताकि उनका इम्यून सिस्टम ठीक रहे, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो पोषण में असमानता के कारण वर्ष 2012 में कुपोषण को मिटाने के लिए 2025 तक का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह पूरा होता नहीं दिख रहा है.

वर्ष 2012 में वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली ने पोषण के छह टारगेट तय किये थे, जिसके तहत मां, नवजात और 0-5 वर्ष तक बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालना शामिल था. इसके तहत 19-49 वर्ष तक की महिलाओं को एनीमिया से मुक्त करना. नवजात को स्तनपान कराना और 0-5 साल तक के बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराना.

ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2020 के अनुसार भारत पोषण को लेकर तय किये गय लक्ष्य को पूरा नहीं कर पायेगा. जिसमें 0-5 साल तक के बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराना, प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया को मिटाना,बचपन में अधिक वजन को दूर करना और अनिवार्य स्तनपान.आंकड़ों के अनुसार कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी तो आयी है, लेकिन अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना है. यह आंकड़ा 66 प्रतिशत से घटकर 58.1 प्रतिशत पर आ गया है.

भारत में कुपोषण की स्थिति : भारत में पोषण की स्थिति बहुत गंभीर है, विश्व में सिर्फ नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश ही ऐसे हैं जहां हमसे भी खराब स्थिति है. बिहार-बंगाल, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में 40 प्रतिशत से भी ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं.वहीं अगर महिलाओं की बात करें, तो आधी आबादी एनीमिया की शिकार है. झारखंड में तो 65 प्रतिशत से अधिक महिलाएं एनेमिक हैं.

ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2020 का कहना है कि कुपोषण का एक बड़ा कारण लिंग, भौगोलिक स्थिति, उम्र और जाति आधारित असमानता है .रिपोर्ट में कहा गया है -असमानता कुपोषण का कारण है – कम पोषण और अधिक वजन, मोटापा और अन्य आहार संबंधी पुरानी बीमारियां. भोजन और स्वास्थ्य प्रणालियों में असमानता पोषण के परिणामों में असमानता को बढ़ाती है जो बदले में अधिक असमानता पैदा कर सकती है.

ऐसे समय में जब पूरा विश्व कोविड-19 जैसी महामारी से लड़ रहा है और हम खान-पान पर विशेष जोर दे रहे हैं, यह जरूरी है कि कुपोषण को मिटाने के लिए समाज से ऐसी असमानता को दूर किया जाये.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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