I Am and I Will : कैंसर के खिलाफ जंग जरूरी, हर साल मरते हैं 80 लाख लोग, भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Feb 2019 9:15 AM
नयी दिल्ली : कैंसर से हर साल दुनिया भर में 80 लाख से ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं. यह एक डराने वाला तथ्य है. इससे भी गंभीर मामला यह है कि मरने वाले लोगों में 40 लाख लोग समय से पहले (30-69 वर्ष आयु वर्ग) मर जाते हैं. वक्त का तकाजा है कि इस […]
नयी दिल्ली : कैंसर से हर साल दुनिया भर में 80 लाख से ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं. यह एक डराने वाला तथ्य है. इससे भी गंभीर मामला यह है कि मरने वाले लोगों में 40 लाख लोग समय से पहले (30-69 वर्ष आयु वर्ग) मर जाते हैं. वक्त का तकाजा है कि इस बीमारी के खिलाफ चौतरफा जंग छेड़ी जाये. ऐसा नहीं किया गया, तो वर्ष 2025 तक इसकी वजह से समय से पहले होने वाली मौतों की संख्या 60 लाख तक हो जायेगी.
‘विश्व कैंसर दिवस’ एक वैश्विक कार्यक्रम है, जो दुनिया के हर व्यक्ति को इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ एकजुट करने का आह्वान करता है. इसका उद्देश्य जागरूकता फैलाना, कैंसर के बारे में शिक्षा बढ़ाना तथा विश्व में सरकारों और व्यक्तियों को कार्रवाई करने के लिए संवेदनशील बनाना है.
4 फरवरी, 2000 को पेरिस में नयी सदी में कैंसर के खिलाफ विश्व सम्मेलन में इस दिन को विश्व कैंसर दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की गयी थी.
भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारी
कैंसर भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारी बन गया है. पिछले ढाई दशक में कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या में दोगुना से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है. यही नहीं, देश में होने वाली कुल मौतों में कैंसर की हिस्सेदारी बढ़कर 8.3 फीसदी हो चुकी है.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एक अध्ययन रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि वर्ष 1990 में देश में कैंसर के चलते 3.82 लाख मौतें हुईं थीं. वर्ष 2016 में यह संख्या बढ़कर 8.13 लाख हो गई.
केरल में स्थित गंभीर, बिहार-झारखंड में कम हैं मामले
यहां चिंता का विषय यह है कि आमतौर पर जागरूकता की कमी से कैंसर होने की बात कही जाती है, लेकिन कैंसर के सबसे अधिक मामले केरल में सामने आए हैं, जहां साक्षरता दर देश में सबसे ज्यादा है. वर्ष 2016 में केरल में कैंसर के मामलों की दर प्रति लाख आबादी पर 135.3 थी. केरल के बाद मिजोरम (121.7), हरियाणा (103.3), दिल्ली (102.9) क्रमश: दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर हैं.
प्रति लाख 53.9 की दर के साथ बिहार में कैंसर का प्रकोप सबसे कम है. वहीं, झारखंड-मिजोरम (64.3) संयुक्त रूप से कम कैंसर के मामले में दूसरे स्थान पर और राजस्थान-तेलंगाना (72.6) संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर दरअसल गलत लाइफस्टाइल के कारण बढ़ने वाली बीमारी है.
शुरुआती निदान तथा बेहतर समझ से इससे बचना और उबरना संभव है. शायद इसलिए इस बार वर्ल्ड कैंसर डे की थीम भी ‘आइ एम एंड आइ विल’ रखी गयी है. यानी मरीज प्रबल इच्छाशक्ति से इस जानलेवा रोग को मात दे सकता है.
इसलिए हो जाती है कैंसर से मौत
धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर सर्जिकल ऑन्कोलॉजी कंसलटेंट, डॉ अतुल कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि जागरूकता के अभाव में अपर्याप्त डायग्नोसिस होने के कारण कैंसर के 50 प्रतिशत मरीज तीसरे या चौथे चरण में पहुंच जाते हैं, जिस वजह से मरीज के बचने की संभावना बहुत कम रह जाती है.
महिलाओं में ब्रेस्ट व ओवरी कैंसर के मामले ज्यादा
जहां पुरुषों में प्रोस्टेट, मुंह, फेफड़ा, पेट, बड़ी आंत का कैंसर आम है, तो वही महिलाओं में ब्रेस्ट और ओवरी कैंसर के ज्यादातर मामले देखने को मिलते है. इनका सबसे बड़ा कारण बदलता लाइफस्टाइल, प्रदूषण, खानपान में मिलावट और तंबाकू या धूम्रपान के सेवन का बढ़ता चलन है.
डॉक्टर बताते हैं कि शरीर के किसी हिस्से में अनावश्यक गांठ हो जाए या किसी अंग से अकारण रक्तस्राव होने लगे, तो तत्काल डाक्टर से परामर्श लेने और जांच कराने की जरूरत है. शरीर के किसी अंग में वृद्धि या त्वचा के रंग में बदलाव इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं.
ऐसे में तत्काल जांच कराई जाती है और कैंसर की पुष्टि हो जाने के बाद कैंसर का स्टेज निर्धारित किया जाता है, ताकि इलाज के विकल्पों और इस बीमारी से उबरने की संभावनाओं पर विचार किया जा सके.
ऐसे बचें कैंसर के खतरों से
एक्शन कैंसर हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, डॉ जेबी शर्मा का कहना है कि कैंसर के खतरनाक मामलों से बचने और उबरने का एकमात्र उपाय नियमित जांच, स्वस्थ लाइफस्टाइल, धूम्रपान त्यागना, शुद्ध और पौष्टिक खान-पान, फलों-सब्जियों का ज्यादा सेवन, स्वच्छ आबोहवा, व्यायाम और नियमित दिनचर्या ही है.
कैंसर को अपने आप में मौत का दूसरा नाम कहा जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में बहुत से लोगों ने इस बीमारी से निजात पाकर इसको हराने का हौसला दिखाया है. जरूरत है, तो इसके खिलाफ जागरूकता फैलाने की और समय रहते इसकी आहट पहचानकर इसे मार भगाने की.
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