करोडों रुपये खर्च होने के बाद भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चुनौती

नयी दिल्ली: छह से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) को लागू करने पर सर्व शिक्षा अभियान के तहत तीन वर्षो में 1.13 लाख करोड रुपये खर्च किए गए हैं. लेकिन इसके बावजूद कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए स्कूलों में 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना, अशक्त बच्चों को पढाई […]
नयी दिल्ली: छह से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) को लागू करने पर सर्व शिक्षा अभियान के तहत तीन वर्षो में 1.13 लाख करोड रुपये खर्च किए गए हैं. लेकिन इसके बावजूद कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए स्कूलों में 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना, अशक्त बच्चों को पढाई के अवसर देना, शिक्षकों के रिक्त पदों को भरना, आधारभूत सुविधा मुहैया कराने के साथ गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा जैसे विषय अभी भी चुनौती बने हुए हैं.
सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरटीई लागू होने पर देशभर में कुल खर्च एवं लाभार्थियों की संख्या पर गौर करें तब 2010.11 में यह राशि प्रति छात्र 2384 रुपये थी जो 2011.12 में बढकर प्रति छात्र 2861 रुपये हो गई.स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2010.11 में आरटीई के मद में देशभर में 37.24 हजार करोड रुपये उपलब्ध कराये गए जिसमें से 31.35 हजार करोड रुपये खर्च हुए. इस अवधि में आरटीई के लाभार्थियों की संख्या 13 करोड 89 हजार 841 थी.
2011.12 में आरटीई के मद में 42.43 हजार करोड रुपये उपलब्ध कराये गए जबकि 37.83 हजार करोड रुपये खर्च किये गए. 2012.13 में आरटीई के मद में देशभर में 47.96 हजार करोड रुपये उपलब्ध कराये गए जिसमें से 44.08 हजार करोड रुपये खर्च हुए.एक रिपोर्ट के मुताबिक, केवल 8 प्रतिशत स्कूलों ने ही छह से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के मापदंडों को पूरा किया है जबकि इसे लागू करने की सीमा करीब एक वर्ष पहले समाप्त हो गई.आरटीई फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, नयी कक्षाओं का निर्माण किया गया है लेकिन स्कूलों में पढने वाले 59.67 प्रतिशत बच्चों के समक्ष छात्र-शिक्षक अनुपात की समस्या है. शिकायत निपटारा तंत्र की स्थिति भी काफी खराब बनी हुई है.
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