"व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और ‘गूगल बाबा’ से पढ़कर धार्मिक फिल्म बनाओगे, तो आदिपुरुष जैसा होगा हश्र" - धार्मिक फिल्मों के ट्रेंड पर क्यों बोले इतिहासकार

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रिलीजियस फिल्म्स पोस्टर, फोटो इंस्टाग्राम

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बॉलीवुड में इन दिनों धार्मिक और पौराणिक फिल्मों का चलन जोरों पर है. लेकिन 'आदिपुरुष' विवाद के बाद यह साफ है कि आस्था से जुड़े विषयों को पर्दे पर उतारना आसान नहीं. मशहूर फिल्ममेकर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का मानना है कि 'वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी' और 'गूगल' के ज्ञान से फिल्में बनाने पर दर्शकों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है. जानिए मेकर्स के लिए क्यों जरूरी है क्रिएटिव फ्रीडम से ज्यादा किताबों और इतिहास की गहरी रिसर्च.

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Bollywood Religious Films: बॉलीवुड में इन दिनों धार्मिक और पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है. भगवान, रामायण और भारतीय इतिहास से जुड़े विषयों पर बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा हो रही है. ऐसे में इन कहानियों को पर्दे पर उतारने को लेकर मशहूर फिल्ममेकर और इतिहासकार डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने मेकर्स को एक जरूरी सलाह दी है. उनका कहना है कि धार्मिक फिल्म बनाना सिर्फ कहानी लिखने या इंटरनेट से जानकारी जुटाने का काम नहीं है. इसके लिए गहरी रिसर्च और विषय की सही समझ जरूरी है.

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व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से नहीं बनेगी धार्मिक फिल्म

इतिहासकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाने वाले फिल्ममेकर्स को सतही जानकारी के भरोसे नहीं रहना चाहिए. अगर कोई निर्माता या निर्देशक सिर्फ ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ और ‘गूगल बाबा’ के सहारे ऐसी फिल्म बनाने की कोशिश करेगा, तो उसे दर्शकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है.

इतना ही नहीं, इंटरनेट पर मौजूद हर जानकारी को इतिहास नहीं माना जा सकता. सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर पोस्ट या वीडियो धार्मिक सत्य नहीं होती. इसलिए किसी भी कहानी को पर्दे पर उतारने से पहले उसके स्रोत और तथ्य को समझना जरूरी है.

किताबों से लेकर इतिहास तक पढ़ना जरूरी

धार्मिक फिल्मों की कहानी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं होती. ऐसे विषय करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े होते हैं. यही वजह है कि फिल्ममेकर्स की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.

कई बार लोककथाएं पीढ़ियों से लोगों के बीच प्रचलित होती हैं, लेकिन उन्हें ऐतिहासिक तथ्य मान लेना सही नहीं होता. फिल्म में किसी घटना या किरदार को दिखाने से पहले यह समझना जरूरी है कि उसका स्रोत क्या है और उसकी ऐतिहासिक या धार्मिक पृष्ठभूमि क्या है.

आदि पुरुष विवाद से क्या सीखना चाहिए?

धार्मिक फिल्मों की बात हो और ‘आदि पुरुष’ का जिक्र न हो, ऐसा मुश्किल है. प्रभास और कृति सेनन स्टारर इस फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं. फिल्म रामायण से प्रेरित थी और बड़े बजट के साथ बनाई गई थी.

लेकिन रिलीज के बाद इसके डायलॉग, किरदारों के चित्रण और कई दूसरे पहलुओं को लेकर विवाद खड़ा हो गया. सोशल मीडिया पर फिल्म की आलोचना हुई और धार्मिक भावनाओं से जुड़े सवाल भी उठे. विवाद इतना बढ़ा कि मेकर्स को कुछ डायलॉग में बदलाव करना पड़ा.

यही वजह है कि ‘आदिपुरुष’ को धार्मिक सिनेमा के लिए एक बड़ी सीख के तौर पर देखा जाता है. बड़े बजट, बड़े सितारे और शानदार विजुअल्स के बावजूद अगर कहानी और प्रस्तुति को लेकर दर्शकों का भरोसा टूट जाए, तो फिल्म के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.

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क्रिएटिव फ्रीडम हो, लेकिन रिसर्च से समझौता नहीं

धार्मिक विषयों पर फिल्म बनाते समय क्रिएटिव फ्रीडम को लेकर भी बहस होती रही है. सिनेमा आखिरकार एक रचनात्मक माध्यम है और फिल्ममेकर अपनी कल्पना के अनुसार कहानी को पेश करना चाहते हैं.

फिल्ममेकर अगर किसी धार्मिक या ऐतिहासिक विषय को नए नजरिए से दिखाना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है. लेकिन इसके लिए उसे पहले उस विषय की जड़ तक जाना होगा. सिर्फ गूगल सर्च, सोशल मीडिया पोस्ट या वायरल दावों के आधार पर स्क्रिप्ट तैयार करना जोखिम भरा हो सकता है.

धार्मिक फिल्मों का दौर, मेकर्स के लिए बड़ी चुनौती

इन दिनों धार्मिक और पौराणिक सिनेमा को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ रही है. ऐसे में मेकर्स के पास नए विषयों पर काम करने का बड़ा मौका है. लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है.

दर्शक अब पहले से ज्यादा जागरूक हैं. सोशल मीडिया की वजह से किसी भी गलती पर तुरंत चर्चा शुरू हो जाती है. फिल्म का कोई पोस्टर, डायलॉग या सीन लोगों को गलत लगता है, तो वह कुछ ही समय में वायरल हो सकता है.

ऐसे में धार्मिक सिनेमा के लिए सबसे जरूरी चीज सिर्फ भव्यता नहीं, बल्कि विश्वसनीयता है.  क्योंकि धार्मिक फिल्म में दर्शक सिर्फ कहानी देखने नहीं आता. वह अपनी आस्था का एक हिस्सा पर्दे पर देखने आता है. इसलिए यहां एक छोटी सी रिसर्च की गलती भी बहुत बड़ा विवाद खड़ा कर सकती है.

यानी आने वाले समय में धार्मिक फिल्मों का रास्ता जरूर खुला है, लेकिन इस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए ‘गूगल बाबा’ से ज्यादा किताबों और इतिहास पर भरोसा करना होगा. इस खबर की पुष्टि  प्रभात खबर नहीं करता हैं.

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