डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: नेहरू के मंत्रालय से इस्तीफा, जनसंघ की स्थापना और कश्मीर का आखिरी सफर
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देश आजाद हुए अभी छह साल भी पूरे नहीं हुए थे. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू देश को नई दिशा देने में जुटे थे. दूसरी तरफ, मुखर्जी सरकार की नीतियों से असहमत होकर विपक्ष की राजनीति को मजबूत करने में लगे थे. 23 जून 1953 की सुबह सूर्योदय से दो घड़ी पहले (लगभग 3. 40 बजे ) श्रीनगर से एक ऐसी खबर आई, जिसने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी. खबर थी कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अब इस दुनिया में नहीं रहे. अभी उनकी उम्र महज 51 वर्ष कि थी.
यह वही श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, जिन्होंने कुछ साल पहले जवाहरलाल नेहरू की सरकार में मंत्री पद संभाला था. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने अपनी ही सरकार से इस्तीफा दे दिया? कांग्रेस के सामने एक नई पार्टी खड़ी कर दी और आखिरकार कश्मीर की ओर ऐसा सफर शुरू किया, जहां से वह कभी लौट नहीं सके.
एक पूर्व केंद्रीय मंत्री की हिरासत में मौत, कई अनसुलझे रहस्यों को पीछे छोड़ गई. हिरासत में उनकी तबीयत कैसे बिगड़ी? क्या उन्हें समय पर इलाज मिला? और क्या उनकी मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच हुई?
लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा पढ़ाई और शिक्षा के क्षेत्र में बिताया, वह देश की राजनीति में इतना बड़ा नाम कैसे बन गया?
इसका जवाब जानने के लिए कहानी को थोड़ा पीछे ले चलते हैं.
किताबों के बीच बीता बचपन, लेकिन किस्मत ने राजनीति में पहुंचा दिया
6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में एक बच्चे का जन्म हुआ. परिवार में शिक्षा का बड़ा महत्व था. पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् थे. वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे.

घर में पढ़ाई का माहौल था. किताबें थीं, बहस होती थी और देश-दुनिया के मुद्दों पर चर्चा होती थी. श्यामा प्रसाद ने इसी माहौल में आंखें खोलीं.
उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की. 1921 में अंग्रेजी विषय से स्नातक किया. इसके बाद बांग्ला में एमए किया और कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. वहां से बैरिस्टर बनकर लौटे.
सोचिए, उस नौजवान के सामने वकालत और शिक्षा में कितना शानदार भविष्य था. फिर भी, वह राजनीति की कठिन राह पर क्यों चल पड़ा?
दरअसल, श्यामा प्रसाद के लिए शिक्षा केवल नौकरी या प्रतिष्ठा पाने का रास्ता नहीं थी. वह देश और समाज के लिए कुछ करना चाहते थे.
कुलपति से मंत्री पद तक का सफर
उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1934 में, महज 33 साल की उम्र में, अंग्रेजी सरकार में उन्हें भी कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया.
उस समय इतनी कम उम्र में इस पद तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि थी. वह 1934 से 1938 तक इस जिम्मेदारी पर रहे. उनके कार्यकाल में भारतीय भाषाओं को विश्वविद्यालय में अधिक महत्व देने की कोशिश हुई. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बांग्ला में भाषण दिया.
लेकिन बंगाल की राजनीति में उथल-पुथल बढ़ रही थी. देश अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ रहे थे.
श्यामा प्रसाद धीरे-धीरे शिक्षा की दुनिया से निकलकर राजनीति में सक्रिय होने लगे. 1929 में वह बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए. आगे चलकर हिंदू महासभा से भी जुड़े और बंगाल की राजनीति में अपनी पहचान बनाई.
आजादी के बाद नेहरू ने बनाया मंत्री, लेकिन साथ ज्यादा दिन नहीं चला
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ. लोगों ने आजादी का जश्न मनाया, लेकिन विभाजन ने लाखों परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी थी.
पंजाब और बंगाल में हिंसा, पलायन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बन गई थी. खासकर पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में हिंदू परिवार भारत आ रहे थे.
इसी दौर में जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पहली सरकार बनाई. उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री की जिम्मेदारी दी.
यह एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर थी. एक तरफ कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू थे और दूसरी तरफ हिंदू महासभा से जुड़े श्यामा प्रसाद मुखर्जी. विचारधारा अलग थी, लेकिन देश के पहले मंत्रिमंडल में दोनों साथ काम कर रहे थे.
मुखर्जी के सामने देश के उद्योगों को खड़ा करने और जरूरी सामान की आपूर्ति को बेहतर बनाने की चुनौती थी.
लेकिन सरकार में रहते हुए एक ऐसा मुद्दा सामने आया, जिसने दोनों नेताओं के रास्ते अलग कर दिए.
नेहरू-लियाकत समझौते पर मतभेद, इस्तीफे की बनी वजह
1950 में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ रहा था. पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता थी. बड़ी संख्या में लोग अपना घर छोड़कर भारत पहुंच रहे थे.
ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने बातचीत का रास्ता चुना.
8 अप्रैल 1950 को दोनों देशों के बीच समझौता हुआ, जिसे नेहरू-लियाकत समझौते के नाम से जाना जाता है. इसका मकसद दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करना था.
लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस समझौते से चिंतित थे.
उनका मानना था कि कागज पर समझौता कर देने से पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं की परेशानियां खत्म नहीं होंगी. उन्हें आशंका थी कि वहां से लोगों का पलायन जारी रहेगा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाएगी.
अब सवाल था कि क्या मुखर्जी अपनी बात मनवाने के लिए सरकार में बने रहेंगे?

6 अप्रैल 1950 को उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.
कल्पना कीजिए. आजादी के कुछ ही साल बाद, एक मंत्री अपनी ही सरकार की नीति से असहमत हो गए. उन्होंने पद छोड़ दिया. उनके पास सत्ता थी, जिम्मेदारी थी और सरकार में रहने का मौका भी था. लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों और राजनीतिक सोच को सत्ता से ऊपर रखा.
यह इस्तीफा उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुआ.
अब उनके सामने अगली चुनौती थी. सरकार से बाहर निकलने के बाद वह अपनी आवाज कहां से उठाएंगे?
कांग्रेस के सामने खड़ी कर दी नई पार्टी, नाम रखा भारतीय जनसंघ
नेहरू सरकार छोड़ने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राजनीति से दूरी नहीं बनाई. उलटे उन्होंने एक नया राजनीतिक रास्ता चुन लिया.
21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने भी इस संगठन को खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
जनसंघ का मकसद कांग्रेस के सामने एक अलग राजनीतिक विकल्प पेश करना था. पार्टी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और तत्कालीन सरकार की नीतियों के विरोध जैसे मुद्दों को उठाती थी.
1952 में देश का पहला आम चुनाव हुआ. उस समय भारतीय जनसंघ नई पार्टी थी. इसके बावजूद पार्टी ने लोकसभा की तीन सीटें जीत लीं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे.
अब वह सरकार का हिस्सा नहीं थे, बल्कि सरकार से सवाल पूछने वाले नेता बन चुके थे.
लेकिन उनके मन में एक ऐसा मुद्दा था, जिसे लेकर वह लगातार आवाज उठा रहे थे. यह मुद्दा था जम्मू-कश्मीर का.
कश्मीर में ऐसा क्या था, जिसे बदलना चाहते थे मुखर्जी?
1947 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन दूसरे राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था अलग थी.
उस समय राज्य का अपना झंडा था और अलग संविधान बनाने की प्रक्रिया चल रही थी. केंद्र और जम्मू-कश्मीर के संबंधों को लेकर भी कई सवाल थे.

1952 में दिल्ली समझौते के बाद राज्य को विशेष स्वायत्तता से जुड़े प्रावधान मिले. प्रधानमंत्री नेहरू और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच इस व्यवस्था को लेकर सहमति बनी थी.
लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी इससे सहमत नहीं थे.
उनका कहना था कि जब जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हो चुका है, तो वहां अलग झंडा और अलग संवैधानिक व्यवस्था क्यों होनी चाहिए?
जम्मू में प्रजा परिषद भी इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रही थी. मुखर्जी ने इस आंदोलन का समर्थन किया.
धीरे-धीरे उनका एक नारा पूरे आंदोलन की पहचान बन गया:
एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे.
यह नारा सुनने में छोटा था, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक सवाल था.
क्या जम्मू-कश्मीर को बाकी राज्यों की तरह भारत की संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए,
या उसकी अलग पहचान और स्वायत्तता बनी रहनी चाहिए?
मुखर्जी पहले विकल्प के पक्ष में थे.
अब उन्होंने सिर्फ संसद में भाषण देने तक खुद को सीमित रखने के बजाय कश्मीर जाने का फैसला किया.
8 मई 1953: दिल्ली से निकले, लेकिन घर वापस नहीं लौट सके
उस समय जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट व्यवस्था लागू थी. राज्य में जाने के लिए बाहर के लोगों को अनुमति लेनी पड़ती थी.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस व्यवस्था को गलत मानते थे. उनका तर्क था कि भारत के एक नागरिक को देश के किसी हिस्से में जाने के लिए परमिट की जरूरत क्यों होनी चाहिए?
उन्होंने इस व्यवस्था का विरोध करने का फैसला किया.
8 मई 1953 को वह दिल्ली से जम्मू-कश्मीर के लिए रवाना हुए. उनके साथ कुछ अन्य लोग भी थे. यात्रा का मकसद साफ था. वह बिना परमिट राज्य में प्रवेश कर अपनी राजनीतिक मांग को सामने रखना चाहते थे.
रास्ते में उन्होंने शेख अब्दुल्ला को अपने आने की जानकारी भी दी थी. लेकिन उन्हें यात्रा न करने की सलाह दी गई.
फिर भी मुखर्जी नहीं रुके.
11 मई 1953 को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
यहां कहानी एक नया मोड़ लेती है. अब तक जो नेता संसद में सरकार की नीतियों को चुनौती दे रहा था, वह खुद हिरासत में था.
उन्हें श्रीनगर ले जाया गया और वहां एक सरकारी भवन में रखा गया.
उनकी गिरफ्तारी के कानूनी आधार पर भी बाद में सवाल उठे. सितंबर 1953 में संसद में हुई चर्चा के दौरान परमिट व्यवस्था से जुड़े अध्यादेश और गिरफ्तारी की तारीख को लेकर आपत्ति जताई गई. इसलिए इस मामले को केवल एक सामान्य गिरफ्तारी कहकर छोड़ देना सही नहीं होगा.
हिरासत में बिगड़ी तबीयत, फिर आई मौत की खबर
श्रीनगर में हिरासत के दौरान मुखर्जी की तबीयत खराब होने लगी.
उनके स्वास्थ्य को लेकर परिवार और समर्थक चिंतित थे. इलाज किस तरह हुआ, डॉक्टरों ने क्या सलाह दी और उन्हें समय पर सही चिकित्सा मिली या नहीं, ये सवाल बाद में संसद तक पहुंचे.
लेकिन 23 जून 1953 को तड़के (3.40 बजे) सुबह कश्मीर से दिल्ली यह सूचना भेजी गई कि मुखर्जी शाहब नहीं रहे.
खबर फैलते ही राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे. एक पूर्व केंद्रीय मंत्री की हिरासत में मौत हो गयी. आखिर ऐसा कैसे हुआ?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर में हिरासत के दौरान मृत्यु हो गई. उस समय उनकी उम्र 51 साल थी.
18 सितंबर 1953 को लोकसभा में उनकी हिरासत और मृत्यु पर चर्चा हुई. इस दौरान इलाज में लापरवाही और परिवार को समय पर जानकारी न देने जैसे आरोप उठाए गए. सरकार की ओर से इन आरोपों का जवाब भी दिया गया.

उनके समर्थकों ने निष्पक्ष जांच की मांग की. उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर आज भी राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस होती है.
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि मौत को लेकर उठे सवाल और किसी साजिश का आरोप दो अलग बातें हैं.
लेकिन एक बात जरूर है कि मुखर्जी की मृत्यु ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा सवाल छोड़ दिया, जिसे कुछ इतिहासकार आज भी साजिस मानते हैं.
मुखर्जी चले गए, लेकिन जनसंघ की कहानी आगे बढ़ती रही
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद उनकी विचारधारा आगे बढ़ती रही. दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं ने संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई.
1977 में भारतीय जनसंघ जनता पार्टी में शामिल हुआ. इसके बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ.
इसलिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भाजपा का सीधा संस्थापक कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा. वह भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे, जिसे भाजपा का राजनीतिक पूर्ववर्ती संगठन माना जाता है.
आज जब भारतीय राजनीति में भाजपा के इतिहास की चर्चा होती है, तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम शुरुआती अध्यायों में जरूर आता है.
उनकी कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है. यह उस दौर की भी कहानी है, जब आजाद भारत अपनी पहचान, संविधान, राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक दिशा को लेकर नए सवालों से जूझ रहा था.
एक तरफ नेहरू की नीतियां थीं, दूसरी तरफ मुखर्जी की असहमति. एक तरफ कश्मीर की विशेष स्वायत्तता का सवाल था, तो दूसरी तरफ उसके पूर्ण एकीकरण की मांग.
इन मुद्दों पर आज भी बहस होती है.
इतिहास में कुछ लोग अपने फैसलों से पहचाने जाते हैं और कुछ अपने संघर्षों से. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इन दोनों का मेल था.
कलकत्ता में पढ़ाई से शुरू हुआ उनका सफर विश्वविद्यालय के कुलपति पद तक पहुंचा. वहां से राजनीति में आए, नेहरू सरकार में मंत्री बने, इस्तीफा दिया, जनसंघ बनाया और आखिरकार कश्मीर में उनकी जिंदगी का अंत हो गया.
अगली कहानी में जानेंगे कि झारखंड की राजनीति. जंगल, पहाड़ और आदिवासी समाज की पहचान के बीच एक अलग राज्य की मांग: एक साधारण परिवार से आने वाले बाबूलाल मरांडी आंदोलन और राजनीतिक बदलाव से लेकर झारखंड के पहले मुख्यमंत्री कैसे बने?
अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाने का फैसला क्यों किया और झारखंड की राजनीति में उनकी भूमिका कैसे बदली?
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