'मेगा डिस्काउंट' का असली सच, त्योहारों में बचत हो रही है या सिर्फ कट रही है जेब?

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Festive Sale Discount Trap, सांकेतिक तस्वीर (PC : AI)

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Festive Sale Discount Trap : त्योहारों की 'महा सेल' के पीछे की मार्केटिंग चालबाज़ी को समझें. कंपनियां दाम बढ़ाकर डिस्काउंट का भ्रम कैसे पैदा करती हैं? जानें असली गणित और अपनी मेहनत की कमाई बचाएं.

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Festive Sale Discount Trap : त्योहार आते ही फोन की स्क्रीन से लेकर सड़क किनारे लगे होर्डिंग्स तक 'महा सेल' और 'फ्लैट 50% ऑफ' के विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है. कंपनियां ऐसा माहौल तैयार करती हैं मानो अगर आपने आज यह सामान नहीं खरीदा तो दुनिया की सबसे बड़ी डील छूट जाएगी. असल में यह कोई समाज सेवा या त्योहार का तोहफा नहीं है, बल्कि कंपनियों की एक सोची-समझी साइकोलॉजिकल मार्केटिंग है.

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कंज्यूमर अफेयर्स और मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, कंपनियां अक्सर सेल से ठीक पहले दाम 30 से 40 फीसदी तक बढ़ा देती हैं और फिर उसी बढ़े हुए दाम पर डिस्काउंट का झूठा टैग चिपका देती हैं. जिसे आप बहुत बड़ी बचत समझकर घर लाते हैं, वह असल में अपनी जेब से एक्स्ट्रा पैसे लुटाने का जरिया बन जाता है.

फेक अर्जेंसी वाला खेल समझो

ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल्स पर चलने वाले 'सिर्फ 2 घंटे बाकी' या 'स्टॉक में सिर्फ 1 बचा है' वाले टाइमर सीधे आपके दिमाग में फोमो यानी छूट छूटने का डर पैदा करते हैं. यह एक ऐसा एल्गोरिदम है जो खरीदार को सोचने और तुलना करने का वक्त ही नहीं देता.

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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और वित्तीय विश्लेषक बार-बार चेतावनी देते हैं कि हड़बड़ी में लिया गया हर फैसला क्रेडिट कार्ड के भारी कर्ज और अनचाहे खर्च की तरफ धकेलता है. जब तक आपको यह अहसास होता है कि खरीदे गए गैजेट या कपड़े की असल में कोई जरूरत ही नहीं थी, तब तक बैंक खाते से पैसा कट चुका होता है.

ऐसे कटता है छूट के चक्कर में जेब का बिल

सामान का नामअसली एमआरपी (मार्केट रेट)सेल में दिखाया रेट (डिस्काउंट का दावा)बैंक कार्ड छूट (शर्तों और कैपिंग के साथ)कंपनियों का असली खेल और आपका नुकसान
Smartphone₹15,000₹18,000 दिखाकर ₹15,000 में 'डील'10% इंस्टेंट डिस्काउंट (अधिकतम कैप ₹1,000)पहले MRP बढ़ाई, फिर ₹1,000 घटाकर वही सामान्य कीमत वसूली.
मिक्सर ग्राइंडर₹3,000फ्लैट 40% ऑफ का झांसा (दिखाया ₹1,800)कार्ड पेमेंट पर अतिरिक्त ₹200 कैशबैक₹200 का मामूली कैशबैक पाने के चक्कर में ₹1,800 का गैर-जरूरी सामान खरीद लिया.
LED TV₹40,000'नो-कॉस्ट ईएमआई' ₹3,333 प्रति माह0% ब्याज का लुभावना दावाबैंक ने फाइल चार्ज और 18% जीएसटी जोड़कर ₹1,200 से ₹1,500 अलग से काट लिए.

उतना ही लो जितनी सच में नीड है

अगर आपको केवल ₹500 का बैंक डिस्काउंट पाने के लिए ₹10,000 की ऐसी शॉपिंग करनी पड़ रही है जिसकी घर में कोई तात्कालिक जरूरत नहीं थी, तो यह सीधी सी गणित समझ लीजिए कि आपकी ₹500 की बचत नहीं हुई, बल्कि ₹9,500 का सीधा और फालतू घाटा हुआ है. बड़े ब्रांड्स इसी मानसिक कमजोरी का फायदा उठाते हैं. जब तक आप पहले से एक सख्त शॉपिंग लिस्ट बनाकर उस पर टिके नहीं रहेंगे, तब तक सेल के नाम पर घर में कबाड़ और बैंक बैलेंस में खालीपन बढ़ता रहेगा.

क्रेडिट कार्ड का मिनिमम ड्यू वाला खतरनाक चक्रव्यूह

त्योहारी जोश में कार्ड स्वाइप करना सबसे आसान लगता है, लेकिन महीने की शुरुआत में जब स्टेटमेंट आए तो सिर्फ 'मिनिमम अमाउंट' भरकर पल्ला झाड़ने की गलती कभी मत करना. बैंकिंग नियमों और आरबीआई गाइडलाइंस के मुताबिक, जैसे ही आप मिनिमम ड्यू भरते हैं, बाकी बची हुई पूरी रकम पर 36 से 42 फीसदी सालाना का भारी-भरकम ब्याज मीटर चालू हो जाता है. इतना ही नहीं, अगले महीने जो भी नया खर्च होगा, उस पर मिलने वाला ब्याज-मुक्त 45-50 दिन का ग्रेस पीरियड भी पूरी तरह खत्म हो जाता है.

लोकल मार्केट जिंदाबाद, ऑफलाइन मोलभाव मत छोड़ना

ऑनलाइन स्क्रीन पर चमकते ऑफर्स को अंतिम सच मानने की भूल बिल्कुल न करें. अपने नजदीकी बाजार या मोहल्ले के दुकानदार के पास जाएं. ऑफलाइन दुकानदार न सिर्फ आपको सामान की सही क्वालिटी हाथ में लेकर जांचने का मौका देता है, बल्कि बिना किसी बैंक कार्ड, छुपे हुए प्रोसेसिंग चार्ज या डिलीवरी फीस के आमने-सामने बात करने पर ऑनलाइन से भी सस्ता सौदा दे देता है. त्योहारी माहौल को खुशी से एन्जॉय कीजिए, लेकिन अपनी मेहनत की कमाई को इन मार्केटिंग स्टंट्स की भेंट चढ़ने से बचाइए.

हर सेल फर्जी नहीं, ऐसे पहचानें असली बचत

सेल पूरी तरह झूठ नहीं होती. टीवी, फ्रिज या फोन जैसे बड़े गैजेट्स पर कंपनियां पुराना स्टॉक निकालने और बिक्री बढ़ाने के लिए सच में भारी छूट देती हैं. अगर जरूरत का सामान पहले से तय हो, तो बैंक ऑफर्स के जरिए सच में पैसे बचाए जा सकते हैं.

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