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Human Psychology: हर किसी के सामने स्वाभाविक रखें अपना व्यवहार, तरीके से रखें अपने विचार

बेहतर है एक इंसान के रूप में जहां तक संभव हो अपने को स्वाभाविक रखें और तरीके से अपने विचारों का इजहार करें.

By विजय बहादुर
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Human Psychology: मेरे एक मित्र हैं स्वभाव से गंभीर, मितभाषी और थोड़े रूखे भी. मैंने उन्हें मुस्कुराते हुए शायद ही कभी देखा होगा, हालांकि अंदर से वो बढ़िया इंसान हैं. ऑफिस और घर दोनों जगह उनका व्यवहार एक जैसा ही है. मैं उन्हें कभी-कभी छेड़ता भी हूं कि कभी मुस्कुरा भी दें , क्या हर वक्त ऐसी सूरत बनाकर रहते हैं जैसे बहुत ही ज्यादा बोझ तले दबे हुए हैं.

अलग तरह की छवि गढ़ी

एक दिन मेरे पास आए तो लगा कि जैसे कुछ ज्यादा ही परेशान हैं. मैंने पूछा कि कोई दिक्कत है? उन्होंने कहा कि कुछ विशेष नहीं. सोचा आज घर में अपने बच्चों को चौंकाता हूं. इसी क्रम में घर में बच्चों के साथ हंसते हुए बात करने लगा. लेकिन मुझे लगा कि बच्चों को मेरा व्यवहार अजीब लगा. उन्हें लगा कि पापा की तबीयत कुछ गड़बड़ है. वस्तुतः मेरे मित्र ने वर्षों से अपनी एक गंभीर छवि अपने परिवार में भी गढ़ ली है. इसी वजह से जब उन्होंने थोड़ा कम गंभीर दिखने की कोशिश की तो इसने उनके परिवार वालों को भी चौंका दिया.

दोहरी जिंदगी जीने की कोशिश

अमूमन हममें से बहुत सारे लोग व्यवहार को लेकर दोहरी जिंदगी जीने की कोशिश करते हैं. जो हम हैं नहीं ,उससे उलट दुनिया को दिखाने की कोशिश करते हैं, इसी चक्कर में अपने बारे में समाज और दोस्तों के बीच एक मिथ्या धारणा बनवा लेते हैं और बहुत बार ऐसा भी होता है कि समाज के हिसाब से ही अपनी छवि गढ़ने की कोशिश करते हैं.

खुद को हमेशा स्वाभाविक रखें

मेरा मानना है इंसान को अपने को स्वाभाविक रखने की कोशिश करनी चाहिए.ऑरिजिनल होने का अर्थ ठेठ या कम पढ़ा लिखा होना नहीं है. फर्ज कीजिए हमारी मातृभाषा हिंदी है और अच्छी हिंदी बोल सकते हैं तो फिर जहां जरूरत हो वहां हिंदी ही बोलें, लेकिन ये क्षमता भी विकसित करें कि जहां जरूरी हो वहां अंग्रेजी भी बोल सकें. बहुत बार हवाई यात्रा में बढ़िया होटल्स में या इसी तरह की जगहों पर आपने देखा होगा कि सामने वाला जिससे आपको बात करनी है वो आपके साथ आपकी भाषा में बात करने में काफी बेहतर महसूस करता है लेकिन हम सिर्फ इस प्रत्याशा में कि कहीं वो मुझे गंवार ना समझ ले, अलग तरीके से व्यवहार करने लगते हैं और इसकी वजह से अपने को फूहड़ बना लेते हैं. बेहतर है एक इंसान के रूप में जहां तक संभव हो अपने को स्वाभाविक रखें और तरीके से अपने विचारों का इजहार करें.

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