‘चल मेरी Luna’ से E-Luna तक, खत्म होने की कगार से कैसे फिर खड़ी हुई Kinetic? जानिए पूरी कहानी
Kinetic Motors का सफरनामा
एक दौर में ‘चल मेरी Luna’ से देशभर में पहचान बनाने वाली Kinetic अब E-Luna के साथ इलेक्ट्रिक दौर में लौट चुकी है. जानिए 1972 से Honda साझेदारी, गिरावट और दोपहिया कारोबार से बाहर निकलने के बाद Kinetic Engineering की पूरी वापसी की कहानी.
एक समय था जब भारत की सड़कों पर एक नाम खूब सुनाई देता था- Luna. इसके साथ जुड़ी थी एक बेहद यादगार लाइन- 'चल मेरी Luna'. यह सिर्फ एक विज्ञापन नहीं था. यह उस दौर की आवाज थी, जब भारत में दोपहिया वाहन आम आदमी की आजादी का जरिया बन रहे थे. आज वही Kinetic नाम इलेक्ट्रिक व्हीकल के दौर में फिर दिखाई दे रहा है, नाम है- E-Luna.
लेकिन इस वापसी की कहानी सिर्फ एक नए इलेक्ट्रिक व्हीकल की कहानी नहीं है. इसके पीछे करीब पांच दशक की एक लंबी यात्रा है. इसमें जबरदस्त सफलता है, Honda जैसा बड़ा साझेदार है, फिर गिरावट है और अंत में खुद को बदलकर वापसी की कहानी है.

कहानी शुरू होती है 1972 से
Kinetic की कहानी की शुरुआत 1972 में हुई थी. इसके पीछे थे एचके फिरोदिया. उनका सपना था आम भारतीय के लिए ऐसी गाड़ी बनाना, जिसे खरीदना और चलाना दोनों आसान हो.
Kinetic के मुताबिक शुरुआत में करीब 15 लाख रुपये की पूंजी रखी गई थी. लक्ष्य भी साफ था- गाड़ी 50 किलो से हल्की हो, पूरी तरह भारत में बने और इसकी कीमत करीब 2,000 रुपये से ज्यादा न हो. यही सोच आगे चलकर Luna बनी.

फिर आई Luna और बदल गई कहानी
Luna का फॉर्मूला बिल्कुल सीधा था.
- हल्की गाड़ी
- आसान डिजाइन
- कम खर्च
- और भारतीय सड़कों के हिसाब से उपयोगी.
यही वजह थी कि यह जल्दी ही लोगों की पसंद बन गई. Kinetic के मुताबिक 1980 के दशक में उसके अहमदनगर प्लांट में हर दिन 2,000 तक Luna बनाने की क्षमता थी. कंपनी ने इंजन, गियरबॉक्स, चेसिस और कई दूसरे हिस्सों का निर्माण खुद किया. पेंटिंग और हीट ट्रीटमेंट जैसी सुविधाएं भी प्लांट के अंदर थीं. यानी Kinetic सिर्फ वाहन बेच नहीं रही थी. वह अपनी पूरी मैन्युफैक्चरिंग मशीनरी खड़ी कर रही थी.

‘चल मेरी Luna’ ने बना दिया इसे घर-घर का नाम
लेकिन किसी ब्रांड को सिर्फ अच्छी मशीन बड़ा नहीं बनाती. उसकी कहानी लोगों के दिमाग में भी उतरनी चाहिए. Kinetic ने यह काम विज्ञापन के जरिए किया.‘चल मेरी Luna’ कैंपेन ने Luna को सिर्फ एक वाहन नहीं रहने दिया.
Kinetic के 50वीं वर्षगांठ के दस्तावेज के मुताबिक इस कैंपेन में स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और क्रिकेट जगत के कपिल देव, मोहम्मद अजहरुद्दीन और सचिन तेंदुलकर जैसे नाम जुड़े थे. यही वह दौर था जब Luna लाखों भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई. कंपनी खुद बताती है कि Luna ने करीब 1 करोड़ ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाई.

फिर Kinetic पहुंची Honda के पास
Kinetic की कहानी का अगला बड़ा मोड़ था Honda. 1980 के दशक में भारतीय टू-व्हीलर बाजार तेजी से बदल रहा था. Honda के पास तकनीक थी. Kinetic के पास भारत का बाजार और मैन्युफैक्चरिंग अनुभव था. दोनों के बीच साझेदारी हुई और Kinetic Honda Motor Ltd. सामने आई.
Honda के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक 1984 में Kinetic Engineering के साथ पार्टनरशिप हुई थी. Kinetic के अपने रिकॉर्ड में Kinetic Honda joint venture की अवधि 1986 से 1998 बताई गई है. यह साझेदारी भारतीय स्कूटर बाजार के लिए काफी अहम साबित हुई.

आया Kinetic Honda DX
इस साझेदारी की सबसे बड़ी पहचान बनी Kinetic Honda DX. यह भारत के शुरुआती और चर्चित CVT आधारित स्कूटरों में शामिल था. सबसे खास बात यह थी कि इसमें गियर बदलने की जरूरत नहीं थी. उस समय भारत में यह अनुभव नया था.
Kinetic के मुताबिक Honda के साथ साझेदारी के दौरान कंपनी ने CVT, इंजन और गियरबॉक्स निर्माण की क्षमता Honda के सिस्टम के अनुसार तैयार की. यानी Kinetic सिर्फ Honda की तकनीक इस्तेमाल नहीं कर रही थी. वह नई तकनीक को भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम में उतार भी रही थी.

लेकिन बाजार बदल रहा था
यहीं से कहानी थोड़ी मुश्किल होने लगी. भारतीय टू-व्हीलर बाजार में मुकाबला बढ़ रहा था. ग्राहकों के पास ज्यादा विकल्प आने लगे. नई कंपनियां आ रही थीं, नई बाइक्स और नए स्कूटर लॉन्च हो रहे थे. Kinetic Honda को भी इस बदलते बाजार का दबाव महसूस हुआ.
1997-98 में Kinetic Honda की बिक्री बढ़ी जरूर, लेकिन प्रतिस्पर्धा तेज हो चुकी थी. उस समय बाजार में Bajaj Auto, TVS Suzuki और LML जैसी कंपनियां भी मजबूत थीं. सिर्फ इतना ही नहीं. Kinetic Honda का स्कूटर पोर्टफोलियो भी दूसरे बड़े खिलाड़ियों के मुकाबले सीमित माना जा रहा था.

फिर 1998 में Honda से रास्ते अलग हो गए
यह Kinetic की कहानी का सबसे बड़ा मोड़ था. 1998 में Honda ने Kinetic Honda से बाहर निकलने का फैसला किया. Honda ने Kinetic Honda में अपनी 50.92% हिस्सेदारी Kinetic प्रमोटर्स को बेचने का फैसला किया था. डील की कीमत करीब 34.74 करोड़ रुपये बताई गई थी.
इससे एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया. लेकिन Kinetic के लिए मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. असल चुनौती अब शुरू होने वाली थी.

Kinetic की सबसे बड़ी मुश्किल क्या थी?
एक समय कंपनी भारतीय दोपहिया बाजार की बड़ी ताकत थी. लेकिन बाजार अब पहले जैसा नहीं था. गियरलेस स्कूटर सेगमेंट में बड़े और मजबूत खिलाड़ी उतर चुके थे. Honda, Suzuki और Hero Honda जैसे नाम तेजी से अपनी पकड़ बना रहे थे.
Kinetic को अब सिर्फ पुरानी लोकप्रियता के भरोसे नहीं चलना था. उसे हर मोर्चे पर नए सिरे से मुकाबला करना था. और यही वह दौर था, जब कंपनी का दोपहिया कारोबार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा.

2008 में आया एक और बड़ा फैसला
आखिरकार Kinetic ने अपने पारंपरिक दोपहिया कारोबार को लेकर बड़ा रणनीतिक फैसला किया. 2008 में Mahindra & Mahindra ने Kinetic Motor Company के दोपहिया कारोबार की संपत्तियां खरीदने पर सहमति जताई. डील की कीमत करीब 110 करोड़ रुपये थी.
नई कंपनी में Mahindra की हिस्सेदारी 80% और Kinetic की 20% रखने की योजना थी. यानी जिस Kinetic ने कभी अपने दोपहियों से बाजार बनाया था. वही कारोबार अब एक दूसरे बड़े ऑटो ग्रुप के हाथ में जा रहा था. यह एक तरह से Kinetic के पुराने दोपहिया अध्याय का अंत था.

लेकिन Kinetic Engineering खत्म नहीं हुई
यहीं इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आता है. Kinetic Engineering ने हार नहीं मानी. कंपनी ने अपना फोकस बदल दिया. दोपहिया वाहन बनाने के बजाय उसने ऑटो कंपोनेंट्स और ट्रांसमिशन सिस्टम पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया.
कंपनी के मौजूदा प्रबंधन के मुताबिक इस बदलाव में कारोबार, तकनीक, लागत और ऑपरेशन का बड़े स्तर पर पुनर्गठन किया गया. इस दौरान कंपनी ने भारी कर्ज भी कम किया और घाटे से निकलकर मुनाफे की तरफ वापसी की. यानी Kinetic ने यह समझ लिया था कि बाजार बदल चुका है. इसलिए कंपनी को भी बदलना होगा.

फिर इलेक्ट्रिक व्हीकल का दौर आया
अब कहानी पहुंचती है उस दौर में, जहां भारत पेट्रोल और डीजल से इलेक्ट्रिक की तरफ बढ़ रहा था. Kinetic Group ने इस मौके को पहचाना. 2013 में Kinetic Green Energy & Power Solutions Ltd. की स्थापना हुई.
इसका फोकस इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर रखा गया. यहीं से Kinetic की नई पहचान बननी शुरू हुई. अब लक्ष्य था कम लागत वाली, आसान, काम की और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी.

और फिर लौटी Luna
2024 में Kinetic Green ने ऐसा नाम वापस लाया, जिसे भारत भूल नहीं पाया था- E-Luna. 7 फरवरी 2024 को E-Luna लॉन्च की गई. इसकी शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत 69,990 रुपये रखी गई थी. यानी वही Luna. लेकिन इस बार पेट्रोल के बजाय बिजली से चलने वाली.

E-Luna सिर्फ Nostalgia नहीं है
यहां कंपनी ने सिर्फ पुराने नाम का इस्तेमाल नहीं किया. E-Luna को एक multi-utility electric two-wheeler के तौर पर पेश किया गया. इसमें 2.0 kWh बैटरी के साथ करीब 110 किलोमीटर की रेंज का दावा किया गया था. इसकी अधिकतम रफ्तार 50 kmph रखी गई और सबसे खास बात, इसमें करीब 150 किलो तक का payload दिया गया. यानी इसे सिर्फ निजी इस्तेमाल के लिए नहीं.
छोटे कारोबार और डिलीवरी जैसे कामों को ध्यान में रखकर भी तैयार किया गया. कंपनी ने 1.7 kWh और आगे 3.0 kWh बैटरी जैसे विकल्पों की भी बात की थी. 3.0 kWh बैटरी के साथ 150 किलोमीटर तक की रेंज का लक्ष्य बताया गया था.

सबसे दिलचस्प बात क्या है?
E-Luna की कहानी सिर्फ Kinetic Green की नहीं है. इसके पीछे Kinetic Engineering भी फिर से जुड़ गई है. Kinetic Engineering के 2023-24 Annual Report के मुताबिक कंपनी ने E-Luna के लिए चेसिस, स्विंग आर्म और दूसरे बॉडी पार्ट्स बनाने की दिशा में काम शुरू किया.
यानी एक समय जिसने Luna को बनाया था. वही Kinetic अब उसके इलेक्ट्रिक अवतार के पीछे भी तकनीकी भूमिका निभा रही है. इसे आप Kinetic की पूरी कहानी का एक तरह से सर्कल पूरा होना कह सकते हैं.

आज Kinetic कहां खड़ी है?
आज Kinetic Engineering का चेहरा पहले जैसा नहीं है. अब कंपनी मुख्य तौर पर ऑटो कंपोनेंट्स और इजीनियरिंग सॉल्यूशंस पर फोकस करती है. लेकिन EV से उसका रिश्ता लगातार मजबूत हो रहा है.
2023-24 में Kinetic Engineering ने करीब 151.83 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया. कंपनी का शुद्ध मुनाफा करीब 5.22 करोड़ रुपये रहा. Annual Report के मुताबिक मुनाफे में सालाना आधार पर 66.58% की बढ़त दर्ज हुई.
दूसरी तरफ Kinetic Green इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर कारोबार को आगे बढ़ा रही है. कंपनी अपनी वेबसाइट पर 50 से ज्यादा वर्षों की ऑटोमोबाइल विरासत और 550 से ज्यादा डीलर नेटवर्क का दावा करती है.

तो Kinetic की असली कहानी क्या है?
Kinetic की कहानी सिर्फ एक कंपनी की कहानी नहीं है. यह भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार के बदलने की कहानी है. एक दौर में Luna ने आम आदमी को सस्ती और आसान मोबिलिटी दी. फिर Honda के साथ साझेदारी ने Kinetic को नई तकनीक से जोड़ा.
इसके बाद बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कंपनी की मुश्किलें बढ़ाईं. दोपहिया कारोबार लगभग खत्म हुआ. लेकिन Kinetic Engineering ने खुद को ऑटो कंपोनेंट कंपनी के तौर पर फिर खड़ा किया और अब वही विरासत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में लौट रही है.
पहले थी ‘चल मेरी Luna’, आज है E-Luna. ईंधन बदल गया है, टेक्नोलॉजी बदल गई है. लेकिन एक चीज अब भी वही है. आम भारतीय के लिए आसान मोबिलिटी देने की Kinetic की सोच.

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