Middle-East में हलचल तेज! क्या ईरान पर 3 नवंबर के बाद हमला करेंगे ट्रंप?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (AI Generated)

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अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान पर दोबारा हमले की आशंका बढ़ रही है. खाड़ी में अमेरिकी सैन्य तैनाती, सऊदी अरब में उड़ानों पर रोक और कतर की मध्यस्थता के बीच जानिए पश्चिम एशिया संकट का भारत की तेल सुरक्षा, महंगाई और प्रवासी भारतीयों पर संभावित असर.

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युद्ध हमेशा अपने अगले अध्याय की घोषणा नहीं करता. कभी राष्ट्रपति के बयान, कभी समुद्र में बढ़ते युद्धपोत और कभी अचानक रद्द होती विमान सेवाएं आने वाले संकट के संकेत देती हैं. पश्चिम एशिया में इस समय ये तीनों संकेत एक साथ दिखाई दे रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करने की बात कही है.

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दूसरी ओर, अमेरिकी सैन्य तैयारियों, कूटनीतिक गतिरोध और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते हमलों ने चुनाव के बाद संघर्ष तेज होने की आशंका बढ़ा दी है.

Geostate.org की संस्थापक-निदेशक और सुरक्षा विशेषज्ञ प्रियांशी के अनुसार, 3 नवंबर की तारीख को शांति की गारंटी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई से पहले एक राजनीतिक विराम के रूप में देखना चाहिए.

हालांकि, वह इसे किसी निश्चित हमले की भविष्यवाणी नहीं मानतीं. उनके विश्लेषण का आधार अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों, सैन्य तैनाती, समुद्री गतिविधियों और विमान सेवाओं पर पड़ रहे असर को एक साथ पढ़ना है.
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क्या मिसाइल डिफेंस परमाणु युद्ध रोक सकता है? जानिए इसकी सीमाएं (AI Generated)
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ट्रंप के बयानों में शांति भी, हमले की गुंजाइश भी

8 अक्टूबर को ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा.

उन्होंने तेहरान के साथ बातचीत को भी सकारात्मक बताया था. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, युद्ध और बढ़ती ईंधन कीमतें अमेरिकी मतदाताओं के बीच ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन रही हैं.

लेकिन उनके दूसरे बयान तस्वीर को जटिल बनाते हैं. टाइम पत्रिका को दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने चुनाव के बाद ईरान पर बमबारी बढ़ाने की संभावना से इनकार नहीं किया.

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने ईरान के सात दिन के संघर्षविराम प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था और समझौता नहीं होने की स्थिति में दोबारा हमले की संभावना पर विचार किया जा रहा है.

प्रियांशी का कहना है कि जब कोई नेता एक तरफ युद्ध समाप्त होने की बात करता है और दूसरी तरफ उसकी तीव्रता बढ़ाने का विकल्प खुला रखता है, तो उसके बयानों को केवल शांति या युद्ध की घोषणा मानना भूल होगी. यह रणनीतिक अनिश्चितता भी हो सकती है, जिसके जरिए विरोधी पक्ष पर समझौते का दबाव बनाया जाता है.

खाड़ी की ओर बढ़ते युद्धपोत: तैयारी या दबाव की रणनीति?

अमेरिका की सैन्य गतिविधियां भी इस आशंका को बल दे रही हैं. अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और उसके साथ आने वाले हजारों नौसैनिकों एवं मरीन की तैनाती को लेकर रिपोर्टें सामने आई हैं. क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य संसाधनों की मौजूदगी का उद्देश्य केवल हमला करना नहीं, बल्कि सैन्य विकल्पों को तैयार रखना और विरोधी पक्ष को अपनी ताकत का संकेत देना भी हो सकता है.

एसोसिएटेड प्रेस की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने पश्चिम एशिया के कुछ सहयोगी देशों को चुनाव के बाद ईरान पर संभावित हमलों और उसके जवाब में होने वाली कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा था. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने अंतिम निर्णय नहीं लिया है.

प्रियांशी इस सैन्य जमावड़े को दो नजरियों से देखने की सलाह देती हैं.

  • पहली संभावना यह है कि अमेरिका सीमित या लक्षित हमलों के लिए विकल्प तैयार कर रहा है.
  • दूसरी यह कि सैन्य तैनाती का इस्तेमाल ईरान को बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें स्वीकार करने के लिए मजबूर करने में किया जा रहा है.

सैन्य ताकत का प्रदर्शन अपने आप में युद्ध का प्रमाण नहीं होता. लंबे समय से तैनात युद्धपोतों, सैनिकों की थकान और गोला-बारूद की उपलब्धता जैसे पहलू भी किसी अभियान की वास्तविक क्षमता तय करते हैं. इसलिए युद्धपोतों की मौजूदगी को हमले की निश्चित तारीख मानना जल्दबाजी होगी.

सऊदी अरब में विमान सेवाएं बंद: क्या यह अमेरिकी हमले का संकेत है?

इस पूरे घटनाक्रम में एयर इंडिया और दूसरी भारतीय विमानन कंपनियों की सऊदी अरब जाने वाली उड़ानों का रद्द होना सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना है. लेकिन इसे सीधे अमेरिकी हमले की तैयारी से जोड़ना सही नहीं होगा.

अक्टूबर में एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस, इंडिगो और अकासा एयर ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति के कारण रियाद, जेद्दा और दमाम समेत कुछ मार्गों पर उड़ानें निलंबित की थीं.
24 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने रियाद और दमाम की उड़ानें 7 नवंबर तक स्थगित की थीं, जबकि जेद्दा के लिए निलंबन की अवधि अलग थी.
एयर इंडिया का विमान, फोटो-एक्स
एयर इंडिया का विमान, फोटो-एक्स

इन फैसलों की पृष्ठभूमि में यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ता संघर्ष तथा सऊदी अरब के हवाई अड्डों एवं नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों की आशंकाएं थीं. इसका अर्थ है कि विमान सेवाओं में व्यवधान क्षेत्रीय सुरक्षा संकट का वास्तविक संकेत है, लेकिन इसे अमेरिका द्वारा ईरान पर हमला करने की तैयारी का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता.

प्रियांशी के विश्लेषण में यही फर्क महत्वपूर्ण है.

'विमान सेवाओं का रुकना बताता है कि युद्ध का दायरा और उससे जुड़ा जोखिम बढ़ रहा है. लेकिन हर सुरक्षा चेतावनी को एक ही सैन्य घटनाक्रम से जोड़ देना विश्लेषण को कमजोर कर सकता है.'

बातचीत का रास्ता अब भी खुला

सैन्य तैयारियों के बीच कूटनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है.

  • कतर के माध्यम से अमेरिका और ईरान के बीच संपर्क जारी है. रॉयटर्स की 31 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी वार्ताकारों ने दोहा में कतर के मध्यस्थों से मुलाकात की.
  • अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है और कूटनीति को प्राथमिकता दी जा रही है, हालांकि अमेरिका जरूरत पड़ने पर हमले के लिए तैयार है.

विवाद के प्रमुख मुद्दों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंध, ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही शामिल हैं.

ईरान चाहता है कि आर्थिक दबाव कम हो और समुद्री मार्ग को लेकर उसकी चिंताओं पर विचार किया जाए. अमेरिका परमाणु कार्यक्रम पर ठोस रियायतों की मांग कर रहा है. दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी के कारण किसी समझौते तक पहुंचना कठिन बना हुआ है.

यही कारण है कि सीमित सैन्य कार्रवाई की आशंका और बातचीत जारी रहने की संभावना एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं. कई बार सैन्य दबाव और कूटनीति समानांतर चलते हैं. असली सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष किसी ऐसे समझौते पर पहुंच सकते हैं, जिसमें शुरुआती रियायतों के बाद संघर्ष दोबारा शुरू होने का खतरा कम हो.

ईरान-अमेरिका तनाव. AI generated
ईरान-अमेरिका तनाव. AI generated

भारत के लिए क्यों अहम है 3 नवंबर की तारीख?

भारत के लिए यह संकट केवल दूर पश्चिम एशिया की सैन्य खबर नहीं है. इसका सीधा संबंध ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, व्यापार, प्रवासी भारतीयों और समुद्री मार्गों से है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2025 में होर्मुज जलडमरूमध्य से लगभग 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन गुजरता था, जो वैश्विक कच्चे तेल व्यापार का करीब 34 प्रतिशत था. इस मार्ग से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों के लिए जाता है. भारत और चीन मिलकर इस प्रवाह का बड़ा हिस्सा प्राप्त करते हैं.

यदि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष तेज होता है, तो तेल की कीमतों, जहाजों के बीमा खर्च और माल ढुलाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये, महंगाई और परिवहन लागत पर पड़ सकता है. वैकल्पिक पाइपलाइन और दूसरे आपूर्ति मार्ग कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन वे होर्मुज से गुजरने वाले पूरे व्यापार का विकल्प नहीं हैं.

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दूसरी चिंता खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है.

विमान सेवाओं में व्यवधान, हवाई अड्डों पर हमले और क्षेत्रीय संघर्ष के विस्तार से यात्रा, रोजगार तथा भारत आने-जाने वाले लोगों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है.

भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है. अमेरिका और इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध, ईरान के साथ संपर्क और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा एवं आर्थिक साझेदारी- इन सभी का महत्व है. भारत के लिए प्राथमिकता किसी एक पक्ष के सैन्य अभियान का समर्थन करने के बजाय अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखना होगी.

3 नवंबर के बाद क्या हो सकता है?

प्रियांशी के आकलन में सबसे महत्वपूर्ण बात निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि संभावनाओं के बीच अंतर करना है. यदि कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो सीमित और लक्षित हमले संभव हैं. लेकिन व्यापक सैन्य अभियान चलाना अधिक कठिन होगा, क्योंकि उसके लिए पर्याप्त हथियार, सैन्य संसाधन और लंबे समय तक अभियान जारी रखने की क्षमता चाहिए.

प्रियांशी त्रिपाठी
प्रियांशी त्रिपाठी

दूसरी ओर, यदि कतर के माध्यम से बातचीत आगे बढ़ती है और दोनों पक्ष होर्मुज जलडमरूमध्य तथा संघर्षविराम पर किसी अंतरिम व्यवस्था तक पहुंचते हैं, तो तत्काल तनाव कम हो सकता है. फिर भी इससे परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विवाद अपने आप समाप्त नहीं होंगे.

बहरहाल, आने वाले दिनों में ट्रंप के चुनाव के बाद के बयानों, अमेरिकी सैन्य तैनाती, कतर के मध्यस्थता प्रयासों और होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा.

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