सरबजीत की मौत के हर जिम्मेदार को दो सजा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jul 2013 1:32 PM

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इस्लामाबाद : पाकिस्तानी मीडिया ने कहा है कि पाकिस्तान की एक जेल में मौत की सजा पाए भारतीय कैदी की हत्या का मामला द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है और प्रशासन को मामले की तह तक पहुंच कर सरबजीत सिंह की मौत के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति को सजा देनी चाहिए. लाहौर की कोट […]

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इस्लामाबाद : पाकिस्तानी मीडिया ने कहा है कि पाकिस्तान की एक जेल में मौत की सजा पाए भारतीय कैदी की हत्या का मामला द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है और प्रशासन को मामले की तह तक पहुंच कर सरबजीत सिंह की मौत के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति को सजा देनी चाहिए.

लाहौर की कोट लखपत जेल में पिछले सप्ताह सरबजीत पर जघन्य हमले तथा कल उनकी मौत की खबरें आज अधिकतर पाकिस्तानी मीडिया के पहले पन्नों पर हैं. 49 वर्षीय सरबजीत सिंह की 26 अप्रैल को साथी कैदियों के हमले के बाद करीब एक सप्ताह तक कोमा में रहने के बाद दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी.

सरबजीत की मौत पर द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा है, पाकिस्तान की जेल में 22 साल, आठ महीने और तीन दिन बिताने के बाद सरबजीत सिंह गुरुवार को भारत लौट गया लेकिन परिवार के साथ रहने के लिए नहीं बल्कि अंतिम यात्रा के लिए.’’ ट्रिब्यून में प्रकाशित संपादकीय में ‘‘सरबजीत सिंह का दुखद अंत’’ शीर्षक से लिखा गया है : उन पर हमला करने वाले कैदियों को पकड़ने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि जेल प्रशासन को कड़ाई से इस मामले होगा.’’ संपादकीय में लिखा गया है कि सरबजीत की सुरक्षा और देखभाल पाकिस्तानी राज्य की जिम्मेदारी थी. द ट्रिब्यून ने चेतावनी दी है कि घटना भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों को प्रभावित कर सकती है. पत्र ने लिखा है, ‘‘राजनयिक विवाद टालने के लिए, उम्मीद की जाती है कि सरकार उचित जांच करेगी.’’

दैनिक ने संपादकीय में लिखा है,हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि हमला पूर्व नियोजित था लेकिन यह ‘‘गंभीर चिंता का विषय है कि एक भारतीय कैदी की पाकिस्तान की जेल में इतनी बुरी तरह पिटाई हुई जबकि उनके वकील ने बार बार उनकी जान के प्रति गंभीर खतरे की चेतावनी दी थी. संपादकीय लिखता है, ‘‘पारदर्शी जांच में जेल प्रशासन की भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि उनकी भूमिका तय हो सके.’’ भारतीय संसद पर हमला मामले में दिल्ली में अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद कई मानवाधिकार समूहों तथा सरबजीत के वकील ने पाकिस्तानी प्रशासन से उनकी सुरक्षा बढ़ाने को कहा था.

द न्यूज ने अपने संपादकीय में कहा है,सरबजीत सिंह की लंबी कहानी का त्रसद अंत. हालांकि उनकी रिहाई के लिए चलाए गए अभियान के बदौलत उनकी मौत की सजा कई बार टाली गयी. दैनिक ने लिखा है,लेकिन कुछ सवाल हैं जिनका जवाब दिए जाने की जरुरत है और हमले के लिए जिम्मेदार सभी लोगों की हर हालत में पहचान होनी चाहिए. द न्यूज ने लिखा है,यह भी महत्वपूर्ण है कि हमें यह जांच करनी होगी कि उन्हें बेहतर सुरक्षा क्यों नहीं दी गयी. खासतौर से तब जबकि जेल के भीतर भारतीय कैदी से बुरे बर्ताव की यह पहली घटना नहीं थी.

दैनिक लिखता है,‘‘ राजनयिक और राजनीतिक मुद्दों से आगे जाकर देखे तो तथ्य यह है कि एक व्यक्ति का बुरा अंत हुआ. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तानी प्रशासन सरबजीत को सुरक्षित रखने में बुरी तरह विफल रहा. यहां तक कि उनके वकीलों ने भी उनकी जान के प्रति पैदा खतरे की शिकायत की थी. न्याय की खातिर मामले की पड़ताल किए जाने की जरुरत है , भले ही सरबजीत को खुद इसका फायदा नहीं मिलेगा.’’

द डान ने ‘‘कैदी खतरे में सरबजीत सिंह पर हमला ’’शीर्षक से अपने संपादकीय में भी इस बात पर सवाल उठाया है कि गंभीर खतरे के बावजूद भारतीय नागरिक को बेहतर सुरक्षा क्यों नहीं उपलब्ध करायी गयी.’’ इसमें लिखा गया है , ‘‘ यह उसी बीमारी का मामला है जिसका पाकिस्तान अक्सर सामना करता रहता है. समय रहते कदम नहीं उठाना और चीजों के गलत होने पर मामले में सुलह समझौते का प्रयास करना.’’

पाकिस्तान की भीड़भाड़ वाली जेलों में आमूलचूल सुधार का आह्वान करते हुए डान ने लिखा है कि सरबजीत का मामला अलग है क्योंकि इसके राजनीतिक और राजनयिक आयाम हैं. ‘इस सवाल का जेल प्रशासन को हर हालत में जवाब देना चाहिए कि क्यों नही सरबजीत को ऐसे कैदी के रुप में देखा गया जिसे खतरा था. हमले को आसानी से टाला जा सकता था यदि जेल प्रशासन थोड़ा और चौकस रहता.’ 49 वर्षीय सरबजीत पर शुक्रवार को कोट लखपत जेल में छह कैदियों ने हमला किया था और उनके सिर की हड्डी में चोट आने के साथ ही उन्हें कई प्रकार की चोटें लगी थीं. उनके सिर पर ईटों से हमला किया गया तथा उनकी गर्दन और धड़ पर तेज हथियारों से वार किए गए थे. सरबजीत को वर्ष 1990 में पंजाब प्रांत में हुए कई बम विस्फोटों में कथित रुप से उसकी संलिप्तता के लिए दोषी ठहराया गया था. इस हमले में 14 लोग मारे गए थे.

अदालतों तथा पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उसकी दया याचिकाओं को ठुकरा दिया था. पाकिस्तान की निवर्तमान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने वर्ष 2008 में सरबजीत की फांसी पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी थी. सरबजीत का परिवार कहता रहा कि वह गलत शिनाख्त का शिकार हुआ और नशे की हालत में वह गलती से सीमा पार कर गया था.

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