समस्त सृष्टि के मूल हैं प्रकृति-पुरुष, दांपत्य में पुरुष बाहरी कवच, तो स्त्री आंतरिक कवच

By Prabhat Khabar Digital Desk
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मार्कण्डेय शारदेय
ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ
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दीया के बिना बाती का और बाती के बिना दीये का क्या वजूद? ठंडे तार के बगैर गरम तार और गरम तार के बगैर ठंडे तार से क्या विद्युत धारा प्रवाहित होकर रोशनी फैला सकती है? बायें हाथ के बिना दायां हाथ और दायें हाथ के बिना बायां हाथ कितना कर सकता है? दिल के बिना दिमाग रोबोट मात्र हो जायेगा, तो दिमाग के बिना दिल मूढ़ हो जायेगा. समाज में भी किसी को कम आंकना बेमानी होगी. इसलिए ईश्वर ने नर बनाया, तो नारी भी बनायी. दोनों को मूल्य दिया, महत्ता दी. इसलिए तो सृष्टि दो की देन है. इसी को अविनाभाव भी कहते हैं.
गीता में भगवान अपनी विभूतियों का परिचय कराते-कराते कहते हैं- ‘द्वन्द्वः सामासिकस्य च’(10.33), अर्थात् अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि एवं द्वंद्ध इन चार मुख्य समास- भेदों में मैं विशेषतः द्वंद्ध ही हूं. अव्ययीभाव में जहां पहले पद की मुख्यत: होती है, वहीं तत्पुरुष में अंतिम पद की प्रधानता. तीसरे, यानी बहुव्रीहि समास में कोई अन्य पद ही प्रधान होता है. इस द्वंद्ध में तो दोनों का समान महत्व है, गैरबराबरी है ही नहीं.
भगवान ने द्वंद्ध को उच्च पद क्यों दिया? इसके कारण अनेक हैं. इस उदाहरण से समझें -
अपृथग्भूत-शक्तित्वाद् ब्रह्माद्वैतं तदुच्यते।
तस्य या परमा शक्तिःज्योत्स्नेव हिमदीधितेः।।
(लक्ष्मीतन्त्रः2.11)
अर्थात् जैसे चांद और चांदनी में भेद नहीं, वैसे ही ईश्वर (ब्रह्म) और उसकी शक्ति में एकात्मकता रहती है, अभेद है. इसी तरह शक्ति और शक्तिमान् में अभेद प्रदर्शित करते अभिनवगुप्त कहते हैं-
शक्तिश्च शक्तिमद्-रूपाद् व्यतिरेकं न वांछति।
तादात्म्यम् अनयोः नित्यं वह्नि-दाहिकयोःइव।।
अर्थात् जिस तरह अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति दोनों में अभेद है, उसी तरह शक्ति-शक्तिधर में एकत्व है, भेद नहीं है.ब्रह्म के साथ माया, जिसे प्रकृति भी कहते हैं, अनपायिनी (अनश्वर) है. महेश्वर का अर्द्धनारीश्वर रूप में अवतार इस ऐक्य का निदर्शन है. इसी तरह तुलसीदास का ‘गिरा अरथ जल-बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न’ में सीता तथा राम के दो होने पर भी ‘सीताराम’ में अभिन्नता है, एकात्मकता है. इसलिए लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश्वर, वाणी-हिरण्यगर्भ, शची-पुरन्दर, माता-पिता आदि युग्मों में भी अद्वैतावस्था देखी गयी है.
समस्त सृष्टि के मूल प्रकृति-पुरुष हैं. इन्हीं की समन्विति से सारा जड़-चेतन संसार बना-बसा है. ये ही द्वंद्ध समास के आदि उदाहरण होने लायक हैं. कारण कि इन्हीं दोनों से विकसित सारे नर-मादा जीव एवं समस्त अंग-प्रत्यंग हैं. अजीवों में भी इनकी उपस्थिति नकारी नहीं जा सकती, क्योंकि समस्त ब्रह्मांड ब्रह्म-माया का ही विस्तार है. इसलिए जहां लक्ष्मी माया मानी गयीं, वहां विष्णु मायापति कहे गये और जहां उमा माया मानी गयीं, वहां महेश्वर मायापति माने गये-
‘मायां तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनं तु महेश्वरम्’।
इस माया-ब्रह्म के रहस्य को 'जाकी रही भावना जैसी' के आधार पर आचार्यों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये हैं. इसी रूप में मनु कहते हैं- ब्रह्माजी ने अपने शरीर को दो खंड करके एक भाग से पुरुष तथा दूसरे भाग से स्त्री हो गये. आशय यह कि दोनों एक ही परमात्मा के दो रूप हैं, दो परस्पर अपेक्षी दो अंग हैं.
(मनुस्मृतिः1.32)।
इसी को शारदा-तिलक (1.29) में अग्नीषोम के रूप में देखा गया है -
अग्नीषोमात्मको देहो बिन्दुः यदुभयात्मकः।
दक्षिणांशः स्मृतः सूर्यो वामभागो निशाकरः।।
अर्थात् यह शरीर सूर्यतत्व एवं चंद्रतत्व से बना है. कारण है कि जिस बिंदु से बना है, उसमें शुक्र-शोणित का संयोग है. शुक्र अग्निरूप (सूर्यरूप) है, तो शोणित सोमरूप. इन दोनों का स्थान कहां है? तभी तो कहते हैं कि देह का दाहिना हिस्सा सूर्यात्मक है तथा बायां हिस्सा चंद्रात्मक. शास्त्रकारों ने गर्भ में भी पुरुष जीव की स्थिति दायीं कोख में तथा स्त्री जीव की स्थिति बायीं कोख में बतायी है.
यों तो हमारे शरीर में नाड़ियों की संख्या अनंत बतायी गयी है, परंतु उनमें तीन नाड़ियों का स्थान विशेष महत्वपूर्ण है. इनके नाम इडा, पिंगला और सुषुम्ना हैं. इनमें इडा नाड़ी शरीर के वाम अंडकोश से धनुष के समान टेढ़ी होती हुई बायीं नाक तक जाती है.
पिंगला नाड़ी दक्षिण अंडकोश से धनुषाकार होती हुई दायीं नाक तक जाती है. इन दोनों से भी अधिक महत्व रखनेवाली नाड़ी है सुषुम्ना. यह शरीर के मध्य में पीठ की ओर से रीढ़ की हड्डी से होती हुई डंडे के समान सीधी ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है. मध्यस्थता करनेवाली यह सुषुम्ना अग्नीषोम-स्वरूपिणी कही गयी है. यदि इसी तथ्य को दूसरे रूप में लिया जाये, तो प्रत्येक पुरुष पिंगला के प्रतीक हैं, तो प्रत्येक स्त्री इडा के. नर-नारी का एकीकरण सुषुम्ना है. दूसरे शब्दों में शिवा इडा हैं, तो शिव पिंगला और दोनों का एकत्व सुषुम्ना है, अर्धनारीश्वर है, वागर्थ की संयुक्तता, यानी शब्दार्थ संबंध है. इस तरह पूरी सृष्टि ही कहियत भिन्न न भिन्न है. प्रकृति ही माता है और पुरुष ही पिता, इन्हीं दोनों से हम बने-बढ़े हैं. इनमें से किसी एक को हटा कर अपनी सत्ता कायम नहीं कर सकते.
दांपत्य में पुरुष बाहरी कवच, तो स्त्री आंतरिक कवच
कहा गया है कि शक्ति के बिना शिव भी शव है. इसका मतलब स्पष्ट है कि दोनों का एकत्व ही शिवत्व है. सभी रूपवानों में कोई न कोई गुण है ही. स्वयं सत्व, रज तथा तम- ये तीनों गुण भी माया के ही हैं, जिनसे सृष्टि का अंग-अंग व्याप्त है. हम अपने दांपत्य को ही लें, तो दोनों की एकचित्तता कितना सुखद होती है! पुरुष जहां बाहरी कवच का काम करता है, वहीं स्त्री आंतरिक कवच का. दोनों का एकीकरण हर मुसीबत से उबार लेनेवाला होता है. जब-जब पुरुष परेशान होता है, तब-तब नारी अपने मधुमिश्रित परामर्शों से मार्ग प्रशस्त करती है. इधर पुरुष भी अपने पौरुष से उसे इस तरह सहारा देता है, जैसे लताओं को वृक्ष.
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