आदिवासी समाज में बचत का महत्व

By Prabhat Khabar Digital Desk
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आदिवासी समाज में बचत का महत्व

-गणेश मांझी-

पुरानी कहावत है, जीवन भर खुश रहना है तो अत्यधिक बचत करो. वस्तुतः अत्यधिक बचत से लंबी अवधि में आर्थिक विकास की संभावना अधिक होती है, लेकिन इसकी वजह से अल्पावधि में आय की कमी होगी क्योंकि वर्तमान में खर्चे कम होंगे और बचत ज्यादा. खर्चे कम होने से वर्तमान में आर्थिक विकास कम होगी और आय में कमी होगी. अंततः आय कम होने से बचत और खर्च दोनों में कमी आएगी जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों में आर्थिक विकास में मंदी हो सकती है. फलतः, बचत ज्यादा कर के अधिक आय करने की कोशिश में अंततः कम आर्थिक वृद्धि में सीमित हो जाना पड़ेगा. इस सिद्धांत को बचत का विरोधाभास सिद्धांत कहते हैं. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए कीन्स (Keynes) ने बचत कम और खर्च अधिक की बात कही है जिसपर आधुनिक अर्थव्यवस्था निर्भर करता रहा है. इसी संकल्पना को आदिवासियों के दृष्टिकोण से देखा जाये तो आदिवासी समाज काफी हद तक कीनेसियन (Keynesian) नजर आता है. ये लेख आदिवासी अर्थव्यवस्था में बचत की संकल्पना का विश्लेषण करता है.

सामान्यतः संपत्ति को वित्तीय-संपत्ति और गैर-वित्तीय संपत्ति दो तरीके से समझा जा सकता है और दोनों का बचत भी किया जा सकता है. वित्तीय-संपत्ति मौद्रिक होती हैं और गैर-वित्तीय के अंतर्गत घर, जमीन, कार इत्यादि आते हैं. आदिवासी अर्थव्यवस्था में बचत के दृष्टिकोण से देखा जाये तो आदिवासी वर्तमान की ज्यादा सोचता है तथा धन ज्यादा इकट्ठा नहीं करता है. धन ज्यादा जमा का मतलब है अधिक बर्बादी और संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जोकि सतत विकास में बाधक है. धन एकत्रित करना, नहीं करना, आधुनिक आर्थिक व्यवस्था के दो अलग पहलू हैं. अति-पूंजीवाद जो आधुनिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुका है संसाधनों का अत्यधिक दोहन और अधिक धन भी एकत्र करना चाहता है.

दूसरा पहलू बचत कम लेकिन मांग आधारित आर्थिक व्यवस्था को दर्शाता है जो कि संसाधनों के सतत उत्पादक क्षमता पर विश्वास करता है और अत्यधिक दोहन और अत्यधिक धन जमा करने से बचने की कोशिश करता है. इन दोनों पहलुओं को लोगों द्वारा देखने का अपना-अलग नजरिया हो सकता है. जैसे, भविष्य में कौन जिंदा रहेगा? डार्विन कहता है जो मजबूत है वो जिंदा रहेगा, अब सोचने वाली बात है मजबूत कौन है? वो, जो अधिक गर्मी झेलने के लिए अपने एसी की क्षमता बढ़ाते जा रहे हैं और संसाधन का अधिक दोहन कर रहे हैं, या वो जो 45/50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खेत में काम कर सकता है? आपके अपने निर्णय हो सकते हैं आपका अपना तर्क हो सकता है.आपकी व्याख्या अल्पावधि या लम्बी अवधि के हिसाब से बदल भी सकती है.

आदिवासी समुदायों के बीच धन की सामुदायिक बचत की एक संकल्पना है जिसे 'धान का गोला' कहा जाता है. धान का गोला जिसका जिक्र बहुत से विद्वानों ने भी किया है परंतु पढ़ कर समझने से पहले निजी अनुभव से आदिवासियों के एक छोटे से आर्थिकी को समझने की कोशिश करते हैं. आधुनिक अर्थव्यवस्था में जिस प्रकार वित्तीय बैंक का महत्व है, ऐसा ही महत्व आदिवासियों के जीवन में 'धान का गोला' का है. इसे साधारण भाषा में धान का बैंक कहा जा सकता है. अकसर इसकी शुरुआत गांव स्तर पर अगहन के दिनों में होती है, यानी की जब धान पर्याप्त मात्रा में सबके घर में होता है. अगर किसी गांव में 10 घर हैं तो हरेक घर शुरुआत में कुछ धान, गोला में जमा करेगा, जैसे - अगर हरेक घर 5-5 पैला (सेर) जमा करते हैं तो 50 पैला हो जायेगा.जब धान जमा हो जाये तो इसे गांव की अर्थव्यवस्था को ठीक करने और किसी भी परिवार को सामान्य सूद में ऋण दिया जाता है. जैसे, अगर धान बुवाई के समय किसी के पास बीज के लिए धान की कमी हो जाये तो नगण्य दर पर उसे धान ऋण दिया जाता है फिर जब अगले वर्ष अगहन के महीने में पर्याप्त उपज हो जाये तो ऋणी व्यक्ति/परिवार सूद समेत धान वापस करेगा और 'धान का गोला' में भी इजाफ़ा होगा.जब ये प्रक्रिया सतत काफी सालों तक चले और 'गोला' में पर्याप्त वृद्धि हो जाये तो धान की कुछ न्यूनतम मात्रा को गोला के लिए छोड़कर बाकी को सभी साझेदार परिवार आपस में बांट लेते हैं. इस तरीके से सुरक्षित भविष्य के लिए सार्वजानिक बचत प्रणाली का और आदिवासी आर्थिक व्यवस्था के 'धान बैंकिंग' प्रणाली का विकास हुआ.

धीरे-धीरे इस व्यवस्था का क्षय हो रहा है क्योंकि इस पर भी अति-पूंजीवादी व्यवस्था की जबरदस्त मार पड़ी है. तात्पर्य यह है कि लोग धान लेने के बाद वापस नहीं करते हैं.इस प्रकार एक व्यक्ति के धान वापस नहीं करने, दूसरे व्यक्ति के द्वारा धान वापस नहीं करने और इस प्रकार ऐसे लोगों की संख्या बढ़ते जाये तो उसे 'धान का गोला' में संकट की स्थिति कही जाएगी. और ऐसी परिस्थिति में बचे हुए लोग शेष धान को आपस में बांटकर 'धान का गोला' को बंद कर देते हैं. इस प्रकार आदिवासी समाज में एकजुटता तथा समाजवादी व्यवस्था का प्रतीक काफी सारे गांवों में अंतिम सांसें भी लेने लगा है. आधुनिक बैंकिंग प्रणाली, धान कम और पैसे की ज्यादा जरूरत ने लोगों को अत्यधिक व्यक्तिपरक और स्वार्थी बना दिया है और अभी की स्थिति में 'धान का गोला' एक इतिहास मात्र बनने की ओर अग्रसर है.

वित्तीय और गैर-वित्तीय संपत्ति की बचत, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बचत से सीधे तौर पर कैसे संबंधित है आइए समझने की कोशिश करते हैं.गौर करने वाली बात है कि एक तरफ वित्तीय या गैर-वित्तीय बचत पर आदिवासी समुदाय का ध्यान भले न गया हो लेकिन जैसे ही पर्यावरण/प्राकृतिक संसाधनों के बचत की बात आती है आदिवासी समुदाय पहली पंक्ति में खड़ा नजर आता है.शायद इसलिए क्योंकि इनका जीवन-दर्शन सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा हुआ है. वित्तीय और गैर-वित्तीय संपत्ति से क्रमशः वित्तीय/धन पूंजी और भौतिक पूंजी का निर्माण होता है उसी प्रकार प्रकृति से प्राकृतिक पूंजी का निर्माण होता है. प्राकृतिक पूंजी का सही इस्तेमाल सतत विकास के लिए बहुत जरूरी है और यही वजह है आदिवासी समुदाय हमेशा प्रकृति के बचाव मुद्रा में होता है. दूसरा दृष्टिकोण ये कहता है कि लगभग 500 ईपू पृथ्वी/प्रकृति 10 करोड़ जनसंख्या को बर्दाश्त कर चुका है और अभी 700 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या को भी पालने में सक्षम है.

(लेखक गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

संपर्क : (gmanjhidse@gmail.com)

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