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कुछ लंपट तार-तार कर रहे लोकतंत्र की मर्यादा

Updated at : 23 May 2019 2:08 AM (IST)
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कुछ लंपट तार-तार कर रहे लोकतंत्र की मर्यादा

लोकतंत्र की त्रासदी : पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर लगे एक अधिकारी की आपबीती मैं केंद्र सरकार में अपनी सेवा दे रहा एक अधिकारी हूं. चुनाव आयोग के आदेशानुसार माइक्रो ऑब्जर्वर के रूप में पश्चिम बंगाल में काम करने का मौका मिला. उत्तरी कोलकाता में मुझे जिम्मेदारी मिली थी. लोकतंत्र के महापर्व में जुटना […]

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लोकतंत्र की त्रासदी : पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर लगे एक अधिकारी की आपबीती

मैं केंद्र सरकार में अपनी सेवा दे रहा एक अधिकारी हूं. चुनाव आयोग के आदेशानुसार माइक्रो ऑब्जर्वर के रूप में पश्चिम बंगाल में काम करने का मौका मिला. उत्तरी कोलकाता में मुझे जिम्मेदारी मिली थी. लोकतंत्र के महापर्व में जुटना था, सो रोमांच भी था. अपने को सौभाग्यशाली मान रहा था. रूटीन से हट कर चुनाव में काम करने का मौका था.

मेरे समकक्ष, परिचित कई अधिकारी चुनाव ड्यूटी में लगाये गये थे. हम लोग पूरे उत्साह और जज्बे के साथ निकले थे, लेकिन चुनाव के दौरान जो मानसिक पीड़ा और तनाव झेला, उसे बयां करते हुए भी रोंगटे खड़े होते हैं. यह मैं इसलिए नहीं कह रहा कि मेरे या मेरे मित्रों के साथ क्या हुआ, कितने दबाव में काम किया. यह सबकुछ ड्यूटी का पार्ट है, तो यह सब लगा रहता है. मेरी चिंता, मेरी वेदना और संवेदना दूसरी है, इसलिए मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं.

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की मर्यादा जिस तरह से कुछ एक लंपट हाथों से तार-तार हो रही थी, उसकी वेदना ज्यादा थी. हम लोग चुनाव ड्यूटी के दौरान नेताजी स्टेडियम और बस से पोलिंग पार्टी पहुंची. स्टेट पुलिस को लेकर स्कूल पोलिंग स्टेशन पर मतदानकर्मियों को छोड़ा. मैंने गेट के अंदर तैनात सीआरपीएफ के अधिकारी को अपना परिचय दिया, तो सभी अंदर गये.

पूरी रात मतदानकर्मी (आठ बूथों के) जमीन पर चादर बिछा कर रात भर सोये. मतदानकर्मियों को तकलीफ हो रही थी, लेकिन कोई सिकन नहीं थी. सुबह छह बजे से मॉक पोल शुरू हुआ. मैं अपनी ड्यूटी कर रहा था. पोलिंग एजेंट का परिचय पूछना शुरू किया, उनकी आइडी देखा. उसमें एक तृणमूल और एक सीपीएम का एजेंट था. बाकी निर्दलीय एजेंट थे. निर्दलीय एजेंट, पूरी तरह से टीएमसी समर्थक थे.

एक कमरे के अंदर एजेंट भले ही निर्दलीयों के नाम पर बने थे, लेकिन एक रणनीति के तहत टीएमसी समर्थकों को अंदर घुसाया गया था. मैं इस बात को समझ गया. आप आश्चर्य करेंगे, कहीं कहीं कमरे के अंदर 10-10 टीएमसी समर्थक बैठे थे.

मैंने कई जगहों पर सूचना के बाद उन पर ध्यान देने लगा, लेकिन उन्होंने पास निर्दलीय के नाम पर बना कर रखा था. सुबह सात बजे से मतदान शुरू हुआ. मतदान के दौरान जब भी खाली समय मिलता, ये लोग अंदर चुनाव कार्य में लगे अधिकारियों को धमकाते. देख लेने की धमकी देते.

एक बूथ में एजेंट ने कहा कि हमारे अधिकारी को कहा कि हमें 60-60 वोट मारने दो. मतदानकर्मियों को कहते कि आप लोग घर नहीं जा सकोगे, लेकिन सीआरपीएफ भी मुस्तैद थी. बूथ के अंदर हो हल्ला देख एक सीआरपीएफ के अधिकारी पूरा मामला समझ गये. उन्होंने मेरा और दूसरे अधिकारियों को ढाढ़स बंधाया. एक औरत कुछ घंटे के बाद दुबारा वोट करने आयी. वह पकड़ी गयी. इसके बाद एजेंट हल्ला करने लगे. पीठासीन अधिकारी पर बरसने लगे. वह अधिकारी बेहोश हो गया.

मैं एक बात आपको त्रासदी से भरी बता रहा हूं कि स्टेट पुलिस इस तरह से मिली हुई थी कि अगर शाम को कोई मतदानकर्मी -अधिकारी स्टेट पुलिस की गाड़ी से जाता, अगर वह एजेंट का बात नहीं सुना हो, तो उसकी पिटाई तय थी. पर आयोग ने सीआरपीएफ को निर्देश दे रखा था कि बस में मतदानकर्मियों के साथ वे लोग ही जायेंगे.

एक बूथ पर एक एजेंट ने ही फर्जी वोट मारा. मशीन की आवाज हुई, सीआरपीएफ के जवान तुरंत ही अंदर घुस गये. मैं भी अंदर गया. मैंने पूछा कि जब यहां कोई वोटर नहीं है, तो मशीन में आवाज कैसे हुई. पीठासीन अधिकारी डर के मारे कांप रहे थे, लेकिन सीआरपीएफ के जवान पीठासीन अधिकारी की मनोदशा देख कर समझ गये कि एजेंट ने इनको डराया है.

इसके बाद सीआरपीएफ के जवानों ने कहा कि अब हमलोग गेट पर बैठते हैं, देखते हैं कि कौन वोट करता है. मैं इन जवानों को सलाम करता हूं. सवाल लोकतंत्र का है. कोई दल हो, देश का कोई कोना हो, आप ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. मेरे साथ सीआरपीएफ के जवान हर घंटे वोट का प्रतिशत लेते रहते, वह इस बात का अंदाजा लगा रहे थे कि कहीं भी जबरदस्ती वोटिंग न हो.

जहां कहीं कम वोट पड़ रहे थे, उन बूथों पर विशेष निगरानी थी. मैंने देखा कि वोटिंग से पहले ही एक दल विशेष के लोगों ने जान-बूझ कर हंगामा कर रहे थे. वे वोटिंग को प्रभावित करना चाहते थे. केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान मोर्चा ले रहे थे, लेकिन स्टेट पुलिस मूक दर्शक बनी थी.

मैं एक खास घटना का उल्लेख कर रहा हूं कि 20 मई को सियालदाह से महज 30 किलोमीटर दूर जगदल में स्टेट पुलिस के जवानों ने उन घरों में लोगों को डराया, जिन्होंने एक दल विशेष को वोट दिया था.

मैं सोचता हूं कि किस रास्ते बंगाल में लोकतंत्र चल पड़ा है. जिस बंगाल की पूंजी वैचारिक क्रांति थी, जिसने देश में स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सांस्कृतिक आंदोलन को एक स्वरूप दिया. एक दशा-दिशा दी, वह किधर जा रहा है.

(लेखक केंद्रीय सेवा के अधिकारी हैं, जो पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर तैनात थे, उन्होंने अपना अनुभव साझा किया है. हम कुछ परिस्थितियों पर बस उनके नाम सार्वजनिक नहीं कर सकते़ )

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