झारखंडः जहां हर पल रहता है हाथियों का डर

Updated at : 16 Jun 2014 3:10 PM (IST)
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झारखंडः जहां हर पल रहता है हाथियों का डर

नीरज सिन्हा पांचपरगना से लौटकर, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए झारखंड के पांचपरगना इलाक़े के रहने वाले महेश्वर अहीर कहते हैं, "किसी ग़रीब के पास क्या होता है. दो-चार टु़कड़े खेत और सिर छुपाने के लिए छोटा-मोटा घर. उसके पास और कुछ होता है, तो मेहनत और हिम्मत. लेकिन अब हिम्मत ने जवाब दे […]

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झारखंड के पांचपरगना इलाक़े के रहने वाले महेश्वर अहीर कहते हैं, "किसी ग़रीब के पास क्या होता है. दो-चार टु़कड़े खेत और सिर छुपाने के लिए छोटा-मोटा घर. उसके पास और कुछ होता है, तो मेहनत और हिम्मत. लेकिन अब हिम्मत ने जवाब दे दिया है. हाथियों ने घर ढहा दिए और दो क्विंटल चावल भी खा गए. चिंता इसकी है कि बरसात के चार महीने पेट कैसे भरेंगे. लू के थपेड़ों में देह जलती है, लेकिन पखवाड़े भर से पूरा परिवार मिट्टी की दीवार जोड़ने और छत पर खपरे बिछाने में जुटा है."

यह कहते हुए वह चुप हो जाते हैं, क्षण भर के लिए आसमान ताकते हैं फिर माथे से पसीने पोंछते हुए कहते हैं, "क्या आप सरकारी बाबू तक हमारी रिपोर्ट पहुंचा देंगे."

बुंडू, तमाड़, सिल्ली, राहे, सोनाहातू प्रखंड पांचपरगना के वे इलाके हैं जहां दो-ढाई महीने से जंगली हाथियों का उत्पात अचानक बढ़ गया है.

इस दरम्यान हाथियों ने दो लोगों की जानें ली हैं और एक दर्जन लोग घायल हुए हैं. हाथियों ने सैकड़ों कच्चे घरों को भी ध्वस्त कर दिया है.

तकलीफ

महेश्वर अहीर राहे प्रखंड के चीरूडीह-महुआडीह गांव के रहने वाले हैं. हम जब उनसे मिले, तो पूरा परिवार टूटे घर को बनाने में जुटा था.

वह बताते हैं कि 24 मई की रात हाथियों के झुंड ने धावा बोला था,लेकिन वन विभाग ने उनकी तकलीफ़ों को जानने की अब तक कोशिश नहीं की है.

अमृता देवी बेहद ग़रीब महिला हैं. हाथियों ने उनके मिट्टी के घर को ढहा दिया है. वह बताने लगीं कि छोटी-छोटी बेटियों के साथ मिलकर मिट्टी की दीवार जोड़ रही हैं. पूछती हैं कि ग़रीब को कोई सरकारी मदद क्यों नहीं मिलती?

उनकी बेटी मुन्नी गांव के ही स्कूल में नवीं की छात्रा हैं.

वह उस रात की भयावहता बताते हुए कलप पड़ती हैं कि कैसे उस रात मां से वे तीन बहनें चिपक कर एक कोने में दुबक गई थीं.

वहां से हम सुमानडीह फिर धतकीजारा गांव पहुंचे. 29 मई की रात इन गांवों में भी हाथियों का उत्पात मचा था.

कुछ परिवारों ने आपबीती सुनाई, तो लगा कि इनका ग़म महेश्वर अहीर की तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा है.

करमी देवी के पास एक ही कमरे का कच्चा मकान है. हाथियों ने उसके एक हिस्से को बुरी तरह से ढहा दिया है. उनके पास इतने पैसे नहीं कि मरम्मत करा सकें. सामने बरसात भी है.

एतवारी देवी का घर भी हाथियों ने ढहा दिया है. थकान और दहशत का साया उनकी आंखों में साफ़ झलक रहा था.

वह बताती हैं कि पूरा परिवार किसी पड़ोसी या परिजन के यहां पनाह लेने को मजबूर हैं.

तभी वहां से गुज़रते कृष्णा महतो हमसे फुलवार गांव भी चलने का अनुरोध करते हैं.

रास्ते में वह बताते हैं कि 27 मई की रात हाथियों का झुंड यहां आया था. कई घरों को तोड़ा, अनाज खाए और चलते बने.

गांव की शांति देवी उस रात की चर्चा करते सुबक पड़ती हैं. वह कहती हैं कि पल भर के लिए आंखों के सामने पूरे परिवार की मौत नाचती हुई दिखाई पड़ी थी.

जिंतू गांव के पंचायत प्रतनिधि सुकरा मुंडा बताते हैं कि दो सौ गांव ऐसे होंगे जहां शाम ढलते ही लोग दहशत के साए में घिर जाते हैं.

यहां हर दूसरी-तीसरी रात किसी न किसी गांव में हाथी उत्पात मचा रहे हैं.

वह बताते हैं कि दो महीने के अंदर फुलवार, लुपुंगडीह, जोजोडीह, सुमानडीह, रेलाडीह, सेरंगडीह, भुटूडीह, बुरूडीह, नावाडीह, हुमटा, गितिलडीह समेत दर्जनों गांवों में हाथियों ने उत्पात मचाया है.

चार सौ क्विंटल से ज्यादा अनाज भी हाथी खा गए हैं.

इतना होने के बाद भी गांव वाले हाथियों को देवता ही मानते-पुकारते हैं. वे हाथियों का नुकसान कभी नहीं चाहते. लिहाजा कभी पलटवार हमले नहीं करते.

सोनारी देवी कहती हैं, "हाथी तो गणेश देवता ही हुए ना, तभी तो उन्हें गांवों से भगाने का कोई भी नुस्ख़ा कारगर नहीं होता."

हाथियों के क्षेत्र

ज़िला वन पदाधिकारी राजीव लोचन बक्शी बताते हैं कि जंगल और पहाड़ों से घिरे होने की वजह से ये इलाक़े हाथियों के रहने और विचरने के लिए चिह्नित क्षेत्र हैं.

इस दरम्यान अगर मादा हाथी ने बच्चे भी जने या उनके झुंड में छोटे हाथी रहे,तो उनका मूवमेंट खास हिस्सों में दो से ढाई महीने तक जारी रहता है.

इंसानों द्वारा जंगलों के साथ छेड़छाड़ भी इसकी मुख्य वजह हो सकती है.

फिर हडि़या, शराब बनने की महक भी हाथियों को गांवों की ओर खीच ले जाती हैं.

वे बताते हैं कि हाथियों को जंगलों में वापस भेजने व मुआवज़े के भुगतान के प्रयास जारी हैं.

एक के बाद एक गांवों का जायज़ा लेने के क्रम में हमारी मुलाक़ात मुखिया प्रतिनिधि संतोष मुंडा से हुई.

उन्होंने बताया कि गांव के गांव लोग रातजगा कर रहे हैं. हाथियों द्वारा घर तोड़े जाने के बाद कई घरों के लोग दूसरी जगह चले जा रहे हैं.

हाथी लगातार खेतों में लगी फ़सलों को भी रौद रहे हैं. लिहाजा इस बरसात खेती करने से भी गांव के लोग हिचक रहे हैं.

स्थानीय पत्रकार ओमप्रकाश सिंह वन निभाग के रवेयै को निराशजनक बताते हैं.

वह कहते हैं, "गांव वालों को अगर पटाख़े और तेज़ रोशनी वाली टॉर्च, लाइट दी जाएं, तो हाथियों को भगाने में कुछ हद तक मदद मिलेगी. दूसरा यह कि क्षति का मौक़े पर आंकलन नहीं होता और न ही ज़रूरतमंदों को तत्काल कोई सहायता दी जाती है."

ऐसा न होने से अब गांवों में ग़ुस्सा भी पनप रहा है.

पिछली चार मई को बुंडू थाना क्षेत्र अंतर्गत हुमटा गांव के रविलोचन मुंडा को पटक कर मार डालने और तीन लोगों को घायल किए जाने की घटना के बाद ग्रामीणों ने शव के साथ रांची-टाटा राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिया था.

मृतक के परिजनों को सरकारी सहायता के अनुरूप दो लाख रुपये दिए जाने हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें 50 हज़ार ही दिए गए हैं.

हुमटा गांव में ही 29 मई को ग़ुस्साए ग्रामीणों ने वन विभाग के कर्मचारियों को चार घंटे तक घेरे रखा था.

रेंज ऑफ़िसर वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि पांच जून को बंगाल से हाथी भगाओ दल को बुलाया गया था.

पांच दिन यहां रहकर वह दल लौट गया है. वह कहते हैं अब हाथियों के सिल्ली इलाक़े में जाने की संभावना है. वहां से वे दूसरी ओर भी जा सकते हैं.

उत्पात से होने वाली क्षति की भरपाई की बाबत वह बताते हैं कि इसके लिए आवेदन लिए जा रहे हैं.

वनपालों और वनकर्मियों को प्रभावित गांवों में जाकर क्षति का आंकलन करने को कहा गया है.

झारखंड राज्य गठन के बाद से 2013 तक राज्य भर में जंगली जानवरों द्वारा फ़सल, पशु, मकान अनाज क्षति के 88 हजार 557 मामले वन विभाग ने दर्ज किए हैं. जंगली जानवरों के हमले से पंद्रह सौ से ज्यादा लोग घायल हुए हैं.

900 से अधिक लोगों की जानें गई हैं. बतौर मुआवज़ा 21 करोड़ रुपये बांटे गए हैं.

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